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भगवान शिव कृपा · भगवान शिव (अघोर रूप) Mantra

अघोरोद्धार सिद्ध मंत्र: अर्थ, भय मुक्ति और गुप्त साधना विधि

भगवान शिव के अघोरोद्धार सिद्ध मंत्र की संपूर्ण जानकारी, अर्थ, गुप्त साधना विधि, भय मुक्ति और चमत्कारी लाभ जानें। Bhaktilok.in पर विस्तृत गाइड।

इष्ट देव भगवान शिव (अघोर रूप)
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय मध्य रात्रि (निशा काल) या प्रदोष काल
अनुशंसित माला रुद्राक्ष माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ अघोरेभ्यो अथघोरेभ्यो घोर घोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः॥
सरल हिंदी भावार्थ:

हे भगवान रुद्र! जो अघोर (शांत और सौम्य) हैं, जो अति अघोर (प्रलयकारी) हैं, और जो उन दोनों के बीच के घोर-घोरतर स्वरूप हैं, तथा जो सर्वत्र और सबके रूप में विराजमान हैं, उन सभी रूपों को मेरा बारम्बार नमस्कार है।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन धर्म और विशेष रूप से शैव आगम तथा तांत्रिक परंपराओं में भगवान शिव के पंचमुख स्वरूप का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। शिव के पांच मुख हैं - सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशाना। इनमें से तीसरा मुख 'अघोर' दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करता है और इसे भगवान रुद्र का संहारक तथा साथ ही परम कल्याणकारी स्वरूप माना जाता है। 'अघोरोद्धार सिद्ध मंत्र' वस्तुतः रुद्राष्टाध्यायी और विभिन्न उपनिषदों में वर्णित भगवान शिव के उस अघोर रूप का आह्वान है, जो साधक के जीवन के सबसे कठिन और भयानक अंधकार को प्रकाश में बदल देता है।

इस महान मंत्र के ऋषि भगवान दत्तात्रेय या घोर ऋषि माने जाते हैं। इसके छंद की बात करें तो यह विशिष्ट वैदिक और तांत्रिक लयबद्ध छंदों के अंतर्गत आता है। इस मंत्र के देवता स्वयं महाकाल भगवान शिव (रुद्र) हैं। इस मंत्र का मुख्य उद्देश्य मानव मन में छिपे अज्ञान, भय, संशय और मृत्यु के डर (मृत्युंजय भाव) का उद्दार करना है। अघोर का शाब्दिक अर्थ है- 'जो घोर न हो' अर्थात् जो सहज, सरल और पावन हो, लेकिन साधना जगत में इसका अर्थ उस असीम और अज्ञेय शक्ति से है जो हर प्रकार की भीषण परिस्थिति को अपने नियंत्रण में ले सकती है।

यहाँ मूल संस्कृत मंत्र देवनागरी लिपि में और उसकी सटीक अंग्रेजी फोनेटिक ट्रांसलिटेरेशन दी जा रही है ताकि उच्चारण की पूर्ण शुद्धता बनी रहे:

मूल मंत्र : ॐ अघोरेभ्यो अथघोरेभ्यो घोर घोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः॥

वैदिक मंत्रोच्चार में शुद्धता का अत्यधिक महत्व होता है। 'अघोरेभ्यो' का उच्चारण करते समय 'ओ' और 'धो' की ध्वनि स्पष्ट होनी चाहिए। 'घोरतरेभ्यः' में विसर्ग का उच्चारण हकार के रूप में स्पष्ट होना चाहिए। गलत उच्चारण से साधना का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता, अतः गुरु के सानिध्य में या ऑडियो के माध्यम से इसका अभ्यास करना उत्तम रहता है।

अघोरोद्धार सिद्ध मंत्र के प्रत्येक शब्द का गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है। आइए इसे पद-दर-पद समझते हैं:

  • ॐ: प्रणव मंत्र, संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और परमात्मा का निर्गुण रूप।
  • अघोरेभ्यो: जो अघोर हैं, अर्थात् जो सौम्य, शांत, और सरल हैं (शिव का प्रथम पहलू)।
  • अथघोरेभ्यो: जो उससे भी परे अघोर हैं, जो अकल्पनीय रूप से गहरे और रहस्यमयी हैं।
  • घोर: जो संसार के समस्त भीषण और कठिन संकटों को दूर करने वाले हैं।
  • घोरतरेभ्यः: जो घोर से भी अति घोर अर्थात् प्रलयकारी और दुर्जेय शक्तियों पर भी नियंत्रण रखते हैं।
  • सर्वेभ्यः: उन सभी रूपों और आयामों को।
  • सर्व शर्वेभ्यः: जो सब कुछ हैं और जो 'शर्व' (संहारकर्ता व कल्याणकारी दोनों) हैं।
  • नमस्ते अस्तु: हमारा बार-बार नमस्कार हो।
  • रुद्र रूपेभ्यः: भगवान रुद्र के उन समस्त रूपों को।

भावार्थ: इस मंत्र का सार यह है कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी शांत, सुंदर, भयानक, प्रलयकारी या अज्ञात है, वह सब कुछ शिव का ही स्वरूप है। जब साधक इन सभी रूपों को प्रणाम करता है, तो वह प्रकृति की हर शक्ति के साथ तन्मय हो जाता है। तब भय उसके पास नहीं फटकता, क्योंकि वह जान लेता है कि भय और निर्भयता दोनों ही उसी एक महाकाल की लीला हैं।

किसी भी उच्च कोटि के मंत्र की सिद्धि के लिए विनियोग और न्यास अनिवार्य अंग हैं। इनके बिना मंत्र की ऊर्जा को शरीर और मन में स्थापित नहीं किया जा सकता।

विनियोग

दाएं हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए जमीन पर छोड़ दें:

अस्य श्री अघोरोद्धार मन्त्रस्य घोर ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, अघोररुद्रो देवता, मम समस्तभयमुक्त्यर्थं जपे विनियोगः।

करन्यास एवं हृदयादि अंगन्यास

पवित्रता और एकाग्रता के साथ अपने अंगों का स्पर्श करते हुए न्यास करें:

  • ॐ अघोरेभ्यो अंगुष्ठाभ्यां नमः (अंगूठे)
  • अथघोरेभ्यो तर्जनीभ्यां नमः (तर्जनी)
  • घोर घोरतरेभ्यः मध्यमाभ्यां नमः (मध्यमा)
  • सर्वेभ्यः अनामिकाभ्यां नमः (अनामिका)
  • सर्व शर्वेभ्यो कनिष्ठिकाभ्यां नमः (कनिष्ठिका)
  • नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (हथेली)

ध्यान श्लोक

जप से पूर्व भगवान अघोरेश्वर का इस प्रकार मानसिक ध्यान करना चाहिए:

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं,
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभिती हस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात् स्तुतममरगणैव्याघ्रचर्म वसानं,
विश्वद्यायं विश्वाबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥

अर्थात: जो रजत (चांदी) के पर्वत के समान श्वेत हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, जो विभिन्न रत्नों से अलंकृत हैं, जिनके हाथों में परशु, मृग, वर और अभय मुद्रा है, जो प्रसन्न मुद्रा में पद्मासन पर बैठे हैं और देवताओं द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है, ऐसे व्याघ्र चर्म धारी, निखिल भय का नाश करने वाले पंचमुखी और त्रिनेत्रधारी भगवान शिव का हम ध्यान करते हैं।

अघोरोद्धार सिद्ध मंत्र की साधना अत्यधिक प्रभावी है, इसलिए इसके नियमों का कड़ाई से पालन करना आवश्यक है:

  • माला का चयन: इस मंत्र के जाप के लिए रुद्राक्ष की माला श्रेष्ठ मानी जाती है। यदि संभव हो तो काले हकीक या स्फटिक की माला का प्रयोग भी किया जा सकता है, बशर्ते वह अभिमंत्रित हो।
  • सर्वोत्तम समय: इस मंत्र की साधना के लिए मध्य रात्रि (निशा काल: रात्रि 12 बजे के आसपास) का समय या प्रदोष काल (संध्या बेला) सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा ब्रह्म मुहूर्त में भी इसका जाप किया जा सकता है।
  • दिशा: साधक को उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। शिव साधना में आसन कुशा का या काले कम्बल का होना चाहिए।
  • जाप संख्या: सामान्य शांति और भय मुक्ति के लिए प्रतिदिन 1 माला (108 बार) का जाप पर्याप्त है। किसी विशेष सिद्धि या संकट निवारण के लिए अनुष्ठान के रूप में प्रतिदिन 11 माला का जाप 11 या 21 दिनों तक किया जाता है।

अघोरोद्धार सिद्ध मंत्र के नियमित और अनुष्ठानिक जाप से साधक को अकल्पनीय लाभ प्राप्त होते हैं:

क्र.सं.लाभ का प्रकारविवरण
1भय एवं आतंक मुक्तिअज्ञात भय, भविष्य की चिंता, फोबिया, और मानसिक अवसाद जड़ से समाप्त होते हैं।
2शत्रु एवं बाधा निवारणगुप्त शत्रुओं, विरोधी ताकतों, और तंत्र-मंत्र बाधाओं से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
3अकाल मृत्यु निवारणयह मंत्र महामृत्युंजय मंत्र के समकक्ष ही साधक की अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा करता है।
4आत्मबल में वृद्धिमनुष्य के भीतर अद्भुत साहस, निर्भयता और आंतरिक ऊर्जा का संचार होता है।
5कुंडलिनी जागरणअघोर साधना मूलाधार और विशुद्ध चक्र को संतुलित करती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है।

तांत्रिक और उग्र शिव साधनाओं में अनुशासन का विशेष महत्व है:

  • सात्विकता: साधना काल में मांस, मदिरा, तामसिक भोजन और व्यसनों का पूर्ण परित्याग करें।
  • ब्रह्मचर्य: साधना अवधि के दौरान शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का सख्ती से पालन करें।
  • गुपचुप साधना: इस मंत्र की साधना को जितना गुप्त (गोपनीय) रखा जाए, उतनी ही जल्दी इसकी सिद्धि प्राप्त होती है। अपनी साधना के बारे में किसी से चर्चा न करें।
  • क्रोध पर नियंत्रण: अघोर साधना से साधक के भीतर ऊर्जा तीव्र होती है, अतः अपने क्रोध और वाणी पर संयम रखें।
  • गुरु मार्गदर्शन: यदि संभव हो तो किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही इस महामंत्र का अनुष्ठान करें।

प्रश्न: क्या महिलाएँ इस अघोरोद्धार मंत्र का जाप कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, शिव और शक्ति के सभी मंत्रों पर सभी का समान अधिकार है। महिलाएँ भी पूर्ण पवित्रता और नियमों का पालन करते हुए इस मंत्र का जाप कर सकती हैं।

प्रश्न: इस मंत्र के जाप से कितने दिनों में अनुभव होने लगते हैं?
उत्तर: यह साधक की एकाग्रता, श्रद्धा और मानसिक शुद्धि पर निर्भर करता है। सामान्यतः 21 से 41 दिनों के सतत जाप से सकारात्मक ऊर्जा और भय मुक्ति का अनुभव होने लगता है।

प्रश्न: क्या इसे घर पर किया जा सकता है या श्मशान जाना जरूरी है?
उत्तर: अघोर साधना का नाम सुनते ही लोग श्मशान की कल्पना करते हैं, परंतु 'अघोरोद्धार सिद्ध मंत्र' को घर के एकांत कमरे में, अपने पूजा स्थल पर या किसी शिव मंदिर में आसानी से किया जा सकता है। श्मशान साधना केवल उच्च स्तर के अघोरियों के लिए होती है।

प्रश्न: यदि जाप के दौरान मन विचलित हो तो क्या करें?
उत्तर: मन का भटकना स्वाभाविक है। ऐसे में अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित करें और मानसिक रूप से भगवान शिव के स्वरूप का स्मरण करते हुए मंत्र जारी रखें। धीरे-धीरे एकाग्रता स्वतः बढ़ जाएगी।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
अज्ञात भय, मानसिक अवसाद, भूत-प्रेत बाधा, अकाल मृत्यु के भय और शत्रुओं का नाश।
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य, सात्विक आहार और पवित्रता का विशेष ध्यान रखें।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप मध्य रात्रि (निशा काल) या प्रदोष काल में रुद्राक्ष माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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