पौराणिक परिचय, उत्पत्ति एवं आध्यात्मिक महत्व
सनातन धर्म में देवाधिदेव भगवान शिव समस्त ब्रह्मांड के आदि और अंत, संहारकर्ता तथा परम कल्याणकारी देवता के रूप में पूजे जाते हैं। भगवान शिव की स्तुति के लिए अनेकों स्तोत्र, मंत्र और सूक्त उपलब्ध हैं, परंतु गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'श्री रुद्राष्टकम' (Namamishamishana Nirvanarupam) का स्थान अद्वितीय और अत्यंत सर्वोच्च है। यह स्तोत्र गोस्वामी तुलसीदास जी की अमर कृति 'रामचरितमानस' के उत्तरकाण्ड में भगवान शिव की महिमा का गान करते हुए प्रकट हुआ है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न संप्रदायों और शिव भक्तों के बीच यह स्तोत्र आधि-व्याधि, भय, शोक और कर्म बंधनों से मुक्ति दिलाने वाला महामंत्र माना जाता है।
इस स्तोत्र की रचना का मुख्य उद्देश्य भगवान रुद्र के निराकार, साकार, निर्गुण और सगुण दोनों रूपों की एक साथ अराधना करना है। जब भक्त 'नमामीशमीशान निर्वाणरूपं' का उच्चारण करता है, तो उसका मन बाह्य प्रपंचों से हटकर सीधे उस परम चिदाकाश रूपी ब्रह्म में लीन हो जाता है जो सभी वेदों का मूल और मोक्ष का द्वार है। सनातन परंपरा के अनुसार, सावन मास, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत और सोमवार के पावन दिनों में श्री रुद्राष्टकम का पाठ करने से साधक को भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र मनुष्य के जीवन से अहंकार, मोह, काम, क्रोध और समस्त मानसिक संतापों का नाश कर आंतरिक शांति और भक्ति की स्थापना करता है।
रुद्राष्टकम के प्रत्येक श्लोक में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों—जैसे महाकाल, त्रिशूलधारी, नीलकंठ, चन्द्रशेखर और गंगाधर—की अत्यंत मनोहारी व्याख्या की गई है। इसके पाठ मात्र से रुद्राभिषेक का साक्षात पुण्य फल प्राप्त होता है। शिव पुराण और अन्य शैव आगम ग्रंथों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि जो मनुष्य सच्चे भाव से रुद्राष्टकम का पाठ करता है, उसे मृत्यु के भय से मुक्ति मिल जाती है और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र केवल एक काव्य रचना नहीं है, बल्कि यह वेदांत का सार और अद्वैत दर्शन का जीवंत रूप है जो साधक को 'शिवोऽहम्' की अनुभूति कराता है।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी प्रामाणिक वैदिक या पौराणिक स्तोत्र के पाठ से पूर्व विनियोग और ध्यान करने का विधान है ताकि मंत्र की ऊर्जा सही दिशा में प्रवाहित हो सके। श्री रुद्राष्टकम के पाठ से पूर्व एकाग्रचित्त होकर मानसिक रूप से भगवान शिव का ध्यान करना आवश्यक माना गया है।
ध्यानम्: ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पाोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराशीतिहस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैव्याघ्रचर्माम्बरं विश्वं बीजं निखिलभयं हरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥ इस ध्यान मंत्र का स्मरण करते हुए साधक को भगवान शिव के शांत, कल्याणकारी और करुणामयी स्वरूप की मानसिक छवि अपने हृदय में स्थापित करनी चाहिए। इसके पश्चात ही मूल स्तोत्र का पाठ प्रारंभ करना चाहिए।
सम्पूर्ण मूल स्तोत्रम् पाठ (शुद्ध संस्कृत श्लोक)
श्लोक 1:
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥
श्लोक 2:
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा गतीतं गोतीतमीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोहम्॥
श्लोक 3:
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा लसद्भाल बालेंदु कंठे भुजंगा॥
श्लोक 4:
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीश चर्माम्बरं मालमयं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥
श्लोक 5:
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥
श्लोक 6:
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संमोहपഹാपहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
श्लोक 7:
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥
श्लोक 8:
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोहं सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्।
जन्मजं दुःख तत्प्यातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥
फलश्रुति:
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। యే పఠन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
श्लोकवार सरल हिंदी भावार्थ एवं दार्शनिक व्याख्या
श्री रुद्राष्टकम का प्रत्येक श्लोक वेदों और उपनिषदों के महावाक्यों की याद दिलाता है। प्रथम श्लोक में तुलसीदास जी कहते हैं कि हे ईशान! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप मोक्षस्वरूप हैं, सर्वव्यापक ब्रह्म हैं, वेदों के सच्चे स्वरूप हैं, निर्गुण, निर्विकल्प, इच्छाओं से रहित और चिदाकाश (ज्ञानस्वरूप आकाश) में निवास करने वाले हैं। मैं ऐसे परम प्रभु का भजन करता हूँ। यह श्लोक अद्वैत वेदांत के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है जहाँ जीवात्मा और परमात्मा का भेद समाप्त हो जाता है।
द्वितीय श्लोक में भगवान के महाकाल और विकराल रूप का वर्णन है। वे निराकार हैं, ॐकार के मूल हैं, तीनों गुणों से परे तुरीयावस्था में स्थित हैं, वाणी और इंद्रियों की पहुँच से बाहर हैं। वे महाकाल के भी काल हैं, अत्यंत कृपालु हैं और संसार सागर से पार लगाने वाले हैं। तृतीय और चतुर्थ श्लोक में भगवान शिव के भौतिक सगुण स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन है। उनका शरीर हिमालय के समान श्वेत और गौर वर्ण का है, उनके मस्तक पर कलकल करती हुई गंगा जी सुशोभित हैं, ललाट पर बाल चंद्रमा और गले में सर्पों की माला है। उनके कानू में हिलते हुए कुण्डल और विशाल नेत्र उनकी करुणा और दिव्यता को दर्शाते हैं।
पंचम और षष्ठ श्लोक में भगवान रुद्र के प्रचंड, प्रकृष्ट, प्रगल्भ और सूर्य के समान कोटि प्रकाश वाले रूप का स्मरण किया गया है। वे भवानी के पति हैं और केवल सच्चे भाव से प्राप्त होते हैं। वे मन्मथ (कामदेव) के शत्रु हैं और सज्जनों को निरंतर आनंद प्रदान करने वाले हैं। सप्तम और अष्टम श्लोक में तुलसीदास जी शरणागति की पराकाष्ठा दिखाते हुए कहते हैं कि जब तक मनुष्य उमानाथ (शिव) के चरणकमलों का भजन नहीं करता, तब तक उसे इस लोक या परलोक में कहीं भी सुख, शांति और संतापों से मुक्ति नहीं मिल सकती। अंत में भक्त अत्यंत विनम्रता से कहता है कि हे शंभु! मैं योग, जप या पूजा की विधि नहीं जानता, मैं तो केवल सर्वदा आपको प्रणाम करता हूँ। जन्म-मरण के दुखों से संतप्त इस दीन की रक्षा कीजिए।
पाठ विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां
श्री रुद्राष्टकम का पाठ करने के लिए कुछ विशेष नियमों और विधियों का पालन करना आवश्यक है ताकि साधना का पूर्ण और सकारात्मक फल प्राप्त हो सके। पाठ करने की सम्पूर्ण विधि निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझी जा सकती है:
- शुभ समय एवं दिवस: इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्याकाल में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। विशेष रूप से प्रदोष काल, सोमवार, महाशिवरात्रि और सावन मास के प्रत्येक दिन इसका पाठ महापुण्यकारी होता है।
- स्थान एवं आसन: पूजा घर को स्वच्छ कर कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। सामने भगवान शिव की मूर्ति, चित्र या शिवलिंग स्थापित होना चाहिए।
- पूजन सामग्री: भगवान शिव को जल, कच्चा दूध, बेलपत्र, धतूरा, आ आक के फूल, चंदन, अक्षत और धूप-दीप अर्पित करें। रुद्राष्टकम पाठ के समय घी का एक दीपक प्रज्वलित अवश्य रखें।
- नियम एवं अनुशासन: पाठ के दौरान मन को शांत रखें, शुद्ध उच्चारण का ध्यान दें और पूर्ण श्रद्धा एवं समर्पण भाव बनाए रखें। सात्विक आहार और विचारों का पालन करना इस साधना के लिए अनिवार्य है।
सम्पूर्ण फलश्रुति, धार्मिक लाभ एवं प्रभाव
रुद्राष्टक के अंत में स्पष्ट रूप से फलश्रुति दी गई है कि 'रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। యే పఠन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।' अर्थात, ब्राह्मण (तुलसीदास जी) द्वारा भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए कहे गए इस रुद्राष्टकम का जो मनुष्य भक्तिभाव के साथ पाठ करते हैं, उन पर भगवान शंकर अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं। इस दिव्य स्तोत्र के नित्य पाठ से जीवन में अनेक प्रकार के चमत्कारी और सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह स्तोत्र मनुष्य के भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी शत्रुओं का नाश करता है। मानसिक रूप से तनाव, अवसाद, अज्ञात भय और अनिश्चितता से घिरे व्यक्तियों के लिए रुद्राष्टकम का पाठ एक अचूक मानसिक औषधि का कार्य करता है। ज्योतिष शास्त्र में जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष, राहु-केतु की पीड़ा या शनि की साढ़ेसाती-ढैया चल रही हो, उन्हें भगवान शिव की इस स्तुति से अत्यधिक राहत मिलती है। यह कर्म बंधनों को क्षीण करता है और साधक को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें