भक्ति काव्य व भजन गुरुवार विशेष (भगवान श्री हरि विष्णु व गुरुदेव)

माँ तारा उग्रतारा का सिद्ध रक्षा कवच पाठ एवं रहस्य

माँ तारा (उग्रतारा) का सिद्ध रक्षा कवच पाठ, अंगन्यास, ध्यान, भवसागर तारण और मोक्ष प्राप्ति के उपाय जानें। सम्पूर्ण विधि सहित.

माँ तारा उग्रतारा पौराणिक परिचय एवं आध्यात्मिक रहस्य

सनातन धर्म की दस महाविद्याओं में माँ तारा द्वितीय शक्ति के रूप में पूजित हैं। इन्हें उग्रतारा, नीलसरस्वती और भवसागर तारणरी के नाम से भी जाना जाता है। तन्त्र शास्त्र के प्रणेता स्वयं भगवान शिव हैं और बृहन्नील तन्त्र, रुद्रयामल तथा कालिका पुराण में माँ तारा के अलौकिक स्वरूप का विस्तृत वर्णन मिलता है। माँ तारा का यह सिद्ध रक्षा कवच साधक के जीवन के समस्त भय, संकट, बाधा, और शत्रुओं के कुचक्रों का नाश करने वाला एक अचूक आध्यात्मिक अस्त्र है। सनातन संस्कृति में जहाँ एक ओर माँ लक्ष्मी ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, वहीं माँ तारा साधक को अज्ञान के गहन अंधकार से निकालकर मोक्ष और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। महर्षि वशिष्ठ, लम्पक ऋषि और आचार्य नागार्जुन जैसे महान सिद्धों ने तारा साधना के बल पर ही अलौकिक सिद्धियों को प्राप्त किया था। उग्रतारा का यह रक्षा कवच केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा ऊर्जा आवरण है जो साधक के चारों ओर दिव्य सुरक्षाचक्र का निर्माण करता है। कलियुग में जहाँ चारों ओर अशांति, भय, रोग और मानसिक संताप व्याप्त हैं, वहाँ माँ तारा का यह कवच प्राणीमात्र के लिए साक्षात कल्पवृक्ष के समान है। जो मनुष्य श्रद्धा और विश्वास के साथ इस कवच का पाठ करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विजय श्री प्राप्त होती है।

तारा शब्द का मूल अर्थ ही है 'तारने वाली'। जो इस भवसागर रूपी अगाध जलराशि से अपने भक्तों को सुरक्षित पार लगा दे, वही तारा है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकला था, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को पी लिया था। विष के प्रभाव से शिवजी अचेत होने लगे और उनके कंठ में भयंकर जलन होने लगी। तब आदिशक्ति माता तारा ने मातृत्व रूप धारण कर भगवान शिव को अपने वक्ष से लगाकर स्तनपान कराया, जिससे विष का प्रभाव शांत हुआ और शिवजी नीलहृदय बने। इसी कारण माँ तारा को उग्र और दयामयी दोनों रूपों में पूजा जाता है। यह रक्षा कवच साधक के सूक्ष्म शरीर (Aura) को शुद्ध करता है और नकारात्मक ऊर्जा, तान्त्रिक प्रयोग, तथा बुरी नजर से पूरी रक्षा करता है। इस स्तोत्र के प्रत्येक अक्षर में बीज मंत्रों की प्रचंड शक्ति समाहित है, जो कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने में सहायक होती है। साधक जब अंगन्यास और ध्यान के साथ इस कवच का पाठ करता है, तो उसके शरीर का प्रत्येक अंग दिव्य देवताओं और देवियों द्वारा सुरक्षित हो जाता है।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

ॐ अस्य श्री तारा रक्षा कवच स्तोत्रमंत्रस्य घोरअक्षोभ्य ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्री उग्रतारा देवता, हूँ बीजं, स्वाहा शक्तिः, ह्रीं कीलकम्, मम सर्वारिष्ट शान्तये, सर्वशत्रुक्षयाय, भवसागर तारणाय च तारा रक्षा कवच जपे विनियोगः॥

विनियोग के पश्चात साधक को करन्यास और अंगन्यास करना चाहिए, जिससे शरीर के विभिन्न अंगों में प्राण ऊर्जा का संचार होता है। इसके बाद माँ तारा के ध्यान का विधिवत उच्चारण किया जाता है, जो इस प्रकार है:

प्रत्युलीढपदां घोरमुण्डमालाविभूषिताम्। खङ्गकर्त्तरीहस्तां च नीलवर्णाम्बुजेक्षणाम्॥
खर्परं च दधतीं च त्रिनेत्रां रक्तवाहिनीम्। उग्रतारां महामायां ध्यायेद्भवसमुद्धराम्॥

इस ध्यान मंत्र का अर्थ है कि जो माता प्रत्यालीढ पदमुद्रा में विराजमान हैं, जिनके गले में मुण्डमाला शोभित है, जो एक हाथ में खड्ग और दूसरे में कर्त्तरी (कैंची) तथा अन्य हाथों में खर्पर (कपाल) और नीलकमल धारण करती हैं, जो तीन नेत्रों से युक्त और नील वर्ण की हैं, ऐसी महामाया उग्रतारा का ध्यान करने से साधक इस भवसागर से अनायास ही तर जाता है। न्यास और ध्यान की यह प्रक्रिया साधक के अंतःकरण को शुद्ध करती है और उसे मंत्र जप के लिए पूर्णतः योग्य बनाती है।

सम्पूर्ण मूल स्तोत्रम् पाठ (शुद्ध संस्कृत श्लोक)

ॐ तारा पातु शिरो देशे ललाटं नीललोहितः।
चक्षुषी पातु मे तारा कर्णौ पातु सुरेश्वरी॥१॥

नासां पातु महामाया मुखं मे सर्ववंदिता।
जिह्वां पातु जगद्धात्री ग्रीवां पातु सुरापगा॥२॥

स्कन्धौ पातु महावीरा भुजौ पातु महेश्वरी।
करौ पातु करालक्षी हस्तौ पातु दिगम्बरी॥३॥

हृदयं पातु मे तारा उदरं पातु कामिनी।
नाभिं पातु महाघोरा कटी पातु महोदयी॥४॥

गुह्यं पातु महामाया जननं पातु चण्डिका।
ऊरू पातु महाबाहुर्जानुनी च भयंकरिणी॥५॥

जंघे पातु महामाता गुल्फौ पातु सुरप्रिया।
पादौ पातु महापादा सर्वाङ्गं पातु मे शिवा॥६॥

इति ते कथितं दिव्यं रक्षाकवचमुत्तमम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं तस्य मृत्युं जयत्यसौ॥७॥

रणे राजकुले घूरे विवादे शत्रुसंमदे।
कवचस्य प्रसादेन न किञ्चिद्द्भ्यते क्वचित्॥८॥

यह मूल रक्षा कवच स्तोत्र माँ तारा के विभिन्न अंगों द्वारा साधक के संपूर्ण शरीर की रक्षा का विधान प्रस्तुत करता है। प्रत्येक श्लोक में माता के विभिन्न रूपों का आह्वान किया गया है ताकि सिर से लेकर पादपर्यंत साधक का अंग-प्रत्यंग सुरक्षित रहे।

श्लोकवार सरल हिंदी भावार्थ एवं दार्शनिक व्याख्या

प्रथम श्लोक में कामना की गई है कि माँ तारा मेरे मस्तक की और नीललोहित रूप मेरा ललाट रक्षा करें। नेत्रों की रक्षा स्वयं तारा और कानों की रक्षा सुरेश्वरी करें। दार्शनिक दृष्टि से सिर और मस्तक हमारे विचारों और बुद्धि का केंद्र हैं। जब बुद्धि पर माँ तारा का नियंत्रण होता है, तो मनुष्य के विचार कुमार्ग से हटकर सत्योंमुखी हो जाते हैं। द्वितीय श्लोक में नासा, मुख, जिह्वा और ग्रीवा की रक्षा के लिए महामाया, जगद्धात्री और सुरापगा का स्मरण किया गया है। यह वाणी और श्वास पर नियंत्रण का प्रतीक है। तृतीय एवं चतुर्थ श्लोक में कंधों, भुजाओं, हाथों, हृदय, उदर, नाभि और कटिप्रदेश की रक्षा का विधान है। हृदय हमारे भावनाओं का केंद्र है जहाँ माँ तारा के वास से प्रेम, करुणा और निर्भयता का उदय होता है। पंचम एवं षष्ठ श्लोक में शरीर के गुप्त अंगों, ऊरु, जानु, जंघा, गुल्फ और चरणों की रक्षा का वर्णन है, जो साधक को भौतिक तथा आध्यात्मिक यात्रा में अडिग रखते हैं। सप्तम और अष्टम श्लोक इस कवच के महात्म्य को बताते हैं कि जो भी व्यक्ति नियमपूर्वक इस रक्षा कवच का पाठ करता है, वह रणक्षेत्र, राजकुल, विवाद और शत्रु संकट में कभी पराजित नहीं होता और मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेता है।

पाठ विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां

विशेष नियम: माँ तारा की साधना और रक्षा कवच का पाठ अत्यधिक उग्र और प्रभावी है, अतः इसे गुप्त रूप से करना चाहिए।

माँ तारा के इस रक्षा कवच का पाठ करने के लिए शुक्ल पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या या मंगलवार व शनिवार की रात्रि को अत्यंत शुभ माना गया है। साधक को लाल या नीले आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करना चाहिए। सामने माँ तारा का चित्र या विग्रह स्थापित कर कुमकुम, अक्षत, नीलकमल या लाल पुष्प अर्पित करें। घी का दीपक जलाकर रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला से मंत्र का जप करना चाहिए। पाठ शुरू करने से पहले शुचिता का पूर्ण ध्यान रखें। मांस, मदिरा और तामसिक वृत्तियों का त्याग कर ब्रह्मचर्य का पालन करना इस साधना के लिए अनिवार्य है। महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान यह पाठ वर्जित माना गया है। अनुष्ठान की अवधि में मन में किसी भी प्रकार का दुर्भाव या क्रोध नहीं लाना चाहिए, क्योंकि उग्र महाविद्या की साधना में मानसिक अनुशासन अत्यंत आवश्यक होता है।

सम्पूर्ण फलश्रुति, धार्मिक लाभ एवं प्रभाव

तारा रक्षा कवच के नियमित पाठ से साधक को अष्टसिद्धि और नौ निधियों की प्राप्ति होती है। इसके प्रभाव से भूत-प्रेत बाधा, तन्त्र-मन्त्र का असर, बुरी नजर और शत्रु भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। जो व्यक्ति व्यापार में घाटे या कर्ज के जाल में फंसे हैं, उनके लिए यह कवच संजीवनी का कार्य करता है। मानसिक अवसाद, भय, अनैतिक स्वप्न और अज्ञात आशंकाओं से ग्रस्त व्यक्तियों को इस पाठ से तुरंत मानसिक शांति मिलती है। यह स्तोत्र न केवल इस लोक में भौतिक सुख-समृद्धि प्रदान करता है, बल्कि परलोक में मोक्ष का मार्ग खोलकर जीव को भवसागर के चक्रव्यूह से मुक्त कर देता है। माता तारा की असीम करुणा अपने भक्तों पर सदैव बनी रहती है और जो सच्चे भाव से उनकी शरण में जाता है, उसका कभी नाश नहीं होता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न १: क्या गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग माँ तारा के रक्षा कवच का पाठ कर सकते हैं?

उत्तर: हाँ, गृहस्थ लोग पूरी श्रद्धा और सात्विक भाव से इस रक्षा कवच का पाठ कर सकते हैं। बस यह ध्यान रखें कि साधना में उग्रता के स्थान पर माता की करुणा और वात्सल्य भाव पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

माँ तारा के सिद्ध रक्षा कवच का प्रादुर्भाव और आध्यात्मिक रहस्य

सनातन शाक्त परंपरा में माँ उग्रतारा केवल संहार या भय की अधिष्ठात्री देवी नहीं हैं, बल्कि वे साधक के जीवन के समस्त संकटों को हरने वाली परम करुणामयी जननी हैं। महाचीन क्रम से प्रकट होने वाली यह महाविद्या नील सरस्वती और एकाजटा के नाम से भी विख्यात हैं। जब साधक संसार के प्रपंचों, अज्ञान के अंधकार और भवसागर की असीम पीड़ाओं से त्रस्त होकर शरण में आता है, तब भगवती तारा का यह सिद्ध रक्षा कवच उसके चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा चक्र बनाता है, जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति, व्याधि या अमंगल भेद नहीं सकता। इस रक्षा कवच का प्रत्येक अक्षर बीज मंत्रों की प्रचंड ऊर्जा से गूंजता है, जो साधक के भौतिक और सूक्ष्म शरीरों को एक साथ कवचबद्ध कर देता है।

इस अद्भुत रक्षा कवच के प्रयोग से पूर्व साधक को इसके आन्तरिक रहस्यों को समझना अति आवश्यक होता है। माँ तारा का यह कवच केवल शत्रुओं से रक्षा का साधन नहीं है, बल्कि यह आंतरिक शत्रुओं जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर का शमन करने वाला दिव्य अस्त्र है। जब कोई साधक पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ इस कवच का पाठ करता है, तो उसके आसपास के वातावरण में एक सकारात्मक और उच्च कोटि की आध्यात्मिक तरंगों का निर्माण होता है। यह कवच साधक की कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने में सहायक होता है क्योंकि इसके उच्चारण से विशुद्ध और आज्ञा चक्र पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जिससे ज्ञान और विवेक के नेत्र स्वतः खुलने लगते हैं।

पुराणों और तंत्र साहित्यों में इस रक्षा कवच को 'महामृत्युंजय' के समान ही प्राण-रक्षक और मोक्षदायक माना गया है। अकाल मृत्यु, दुर्घटना, ग्रह बाधा, और ऊपरी बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए माँ तारा के इस सिद्ध रक्षा कवच का कोई सानी नहीं है। भगवती तारा की यह असीम करुणा ही है कि वे अपने भक्तों को अपने उग्र रूप के पीछे छिपे वात्सल्य से सींचती हैं। जिस प्रकार एक माता अपने दुर्बल और भयभीत बालक को अपनी आंचल की छांव में छिपा लेती है, ठीक उसी प्रकार माँ तारा इस कवच का पाठ करने वाले साधक को अपनी जटाओं और नीले आकाश सदृश अंचल में सुरक्षित रखती हैं, जिससे ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति उसका अहित नहीं कर सकती।

अंगन्यास एवं ध्यान विधि का शास्त्रीय विधान

माँ तारा के सिद्ध रक्षा कवच को धारण करने या उसका पाठ करने से पूर्व अंगन्यास और करन्यास का विधान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। न्यास का अर्थ होता है अपने शरीर के विभिन्न अंगों में देवी के दिव्य स्वरूप और उनके मंत्रों की ऊर्जा का आरोपण करना। इस प्रक्रिया से साधक का स्थूल शरीर मन्त्रमय और दिव्य बन जाता है। दाहिने हाथ की अनामिका और अंगूठे के स्पर्श से हृदय, शिखा, और नेत्रों का न्यास करते हुए बीजाक्षरों का मानसिक उच्चारण किया जाता है। यह विधि साधक के शरीर में ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करती है और उसे बाहरी किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रखती है, जिससे जप और पाठ का पूर्ण प्रतिफल प्राप्त होता है।

ध्यान मंत्र: प्रत्युद्गतं च शवस्योपरि घोररूपिणीम्। लोलजिह्वां महाघोरां दंष्ट्राकरालवदनाम्।। नीलवर्णप्रभां देवीं मुण्डमालाभूषिताम्। खड्गकर्तरिहस्तां च वरदाभयपाणिनीम्।। ध्यायेत्तारामुपविष्टाम् शवारूढाम्सलज्जिताम्। भवसागरतारिण्यां महाभयविनाशिनीम्।।

ध्यान की इस अवस्था में साधक को माँ तारा के उस विशिष्ट स्वरूप की कल्पना करनी होती है, जो प्रलय के समय भी अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहती हैं। माँ तारा शव के ऊपर आसीन हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि वे मृत्यु और समय के भी परे हैं। उनके एक हाथ में खड्ग और दूसरे में कर्तरी (कैंची) है, जो अज्ञान और बंधनों को काटती है, तथा अन्य दो हाथों में वरद और अभय मुद्रा है जो साधक को निर्भयता प्रदान करती है। उनका नीला वर्ण आकाश और महाकाल का द्योतक है। इस ध्यान को स्थिर चित्त से करने पर साधक के भीतर अपूर्व साहस और मानसिक शांति का उदय होता है, और उसका मन संसार के तमाम विकारों से विरत होकर भगवती के चरणों में लीन हो जाता है।

अंगन्यास और ध्यान के उपरांत जब साधक रक्षा कवच के मूल मंत्रों का उच्चारण शुरू करता है, तो उसके शरीर का प्रत्येक रोमछिद्र जागृत हो जाता है। इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की जल्दबाजी या असावधानी नहीं बरतनी चाहिए। गुरु के सान्निध्य में या पूरी पवित्रता के साथ एकाग्रचित्त होकर किया गया यह अनुष्ठान साधक के जीवन के समस्त कष्टों को जड़ से उखाड़ फेंकने में सक्षम है। यह ध्यान और न्यास की संयुक्त साधना साधक को केवल इस लोक में ही नहीं, बल्कि परलोक में भी उत्तम गति प्रदान करती है और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है।

भवसागर तारण, मोक्ष प्राप्ति और परम रक्षा का अनुष्ठान

संसार को भवसागर कहा गया है, जिसमें जन्म और मरण के चक्र में फंसकर जीव निरंतर दुखों को भोगता रहता है। माँ तारा का यह सिद्ध रक्षा कवच उस भवसागर से पार उतारने वाली नौका के समान है। जो साधक नियमित रूप से इस कवच का पाठ करता है, वह संसार के बंधनों से धीरे-धीरे मुक्त होने लगता है। भगवती तारा की कृपा से उसके संचित कर्मों का क्षय होने लगता है और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में आने वाली समस्त बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। यह कवच साधक को भौतिक समृद्धि के साथ-साथ परम आध्यात्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग भी सहज सुलभ कराता है।

इस रक्षा कवच के अनुष्ठान और पाठ के नियम अत्यंत सरल किंतु कड़े अनुशासन की मांग करते हैं। साधक को चाहिए कि वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर नीले या श्वेत वस्त्र धारण करे। पूजा स्थल पर माँ तारा के चित्र या विग्रह के समक्ष शुद्ध घी का दीपक जलाकर इस कवच का पाठ करना चाहिए। निम्नलिखित सारणी में इस अनुष्ठान से जुड़ी मुख्य बातों को संक्षेप में दर्शाया गया है:

अनुष्ठान का अंग विवरण एवं नियम लाभ
समय एवं मुहूर्त ब्रह्म मुहूर्त या निशा काल (रात्रि का समय) शीघ्र मंत्र सिद्धि और एकाग्रता
आसन एवं दिशा कुश या ऊनी आसन, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख ऊर्जा का संरक्षण और स्थिरता
माला एवं जाप रुद्राक्ष या स्फटिक माला, नित्य न्यूनतम एक पाठ समस्त बाधाओं का शमन और रक्षा
नैवेद्य एवं भोग गुड़, खीर, या ताजे फल देवी की प्रसन्नता और कृपा प्राप्ति

इस प्रकार, माँ तारा (उग्रतारा) का यह सिद्ध रक्षा कवच केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह साक्षात भगवती की ऊर्जा का मूर्त रूप है। जो भी भक्त पूरी श्रद्धा, विश्वास और समर्पण भाव के साथ इस कवच को अपने जीवन का हिस्सा बनाता है, उसके जीवन से सारे भय, शोक और संताप हमेशा के लिए विदा हो जाते हैं। माँ तारा की असीम करुणा अपने हर उस बच्चे की रक्षा करती है जो शरण में आता है, और अंततः उसे भवसागर से तारकर अपने धाम में स्थान देती है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 29 Oct 2026

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