माँ छिन्नमस्तिका अष्टोत्तर शतनामावली पौराणिक परिचय एवं आध्यात्मिक रहस्य
सनातन धर्म की शाक्त परंपरा में महाविद्याओं का अत्यंत विशिष्ट और रहस्यमयी स्थान है। भगवान शिव की शक्ति के दसों स्वरूपों में माता छिन्नमस्तिका को छठा स्थान प्राप्त है। भगवती छिन्नमस्तिका का यह दिव्य स्वरूप साधक को आत्म-बलिदान, मोह के बंधन से मुक्ति, चेतना के सर्वोच्च शिखर और कुण्डलिनी जागरण का मार्ग दिखाता है। पुराणों और तंत्र ग्रंथों जैसे 'रुद्रयामल' और 'बृहतनीलतंत्र' में माता छिन्नमस्तिका के अलौकिक गुणों का विस्तार से वर्णन मिलता है। उनके इस रूप में वे अपना ही मस्तक काटकर अपने हाथों में धारण किए हुए हैं और उनके गले से रक्त की तीन धाराएं बह रही हैं, जिन्हें उनकी दो सहचरी जया और विजया तथा स्वयं माता पान कर रही हैं। यह रूप देखने में भले ही उग्र प्रतीत हो, किंतु आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह परम ज्ञान, अहंकार के नाश और परोपकार की पराकाष्ठा का प्रतीक है।
माता छिन्नमस्तिका की उपासना करने से साधक के जीवन में आ रही समस्त बाधाएं, शत्रु बाधा, भय, रोग और मानसिक संताप नष्ट हो जाते हैं। माता के 108 पावन नाम यानी 'छिन्नमस्ता अष्टोत्तर शतनामावली' का जप करने से साधक को अणिमादि आठ सिद्धियों, भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। इन 108 नामों में मां के विभिन्न गुणों, स्वरूपों और उनके ब्रह्मांडीय रूपों का गहरा दर्शन छिपा हुआ है। प्रत्येक नाम अपने आप में एक शक्तिशाली मंत्र है, जिसका विधिवत उच्चारण करने से शरीर के चक्र जागृत होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस आलेख में हम माता छिन्नमस्तिका के संपूर्ण 108 पावन नामों को उनके शुद्ध संस्कृत रूप और सरल हिंदी भावार्थ के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे साधक सुगमता से इनका पाठ और जप कर सकें।
विनियोग, ध्यान एवं नामावली जप संकल्प
किसी भी देवी-देवता के स्तोत्र या नामावली का पाठ करने से पूर्व विन्यास, विनियोग और ध्यान करना अनिवार्य माना गया है। इससे पाठ की ऊर्जा और एकाग्रता में वृद्धि होती है। माता छिन्नमस्तिका के अष्टोत्तर शतनामावली जप का प्रामाणिक विनियोग इस प्रकार है:
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीछिन्नमस्तादशाधिकशतनामस्तोत्रमन्त्रस्य भैरव ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, छिन्नमस्ता देवता, धर्मार्थकाममोक्षसिद्धये जपे विनियोगः।
ध्यानम्-
प्रत्युत्पन्नगलां प्रलम्बदशनां मुण्डस्रजा भूषितां
दिव्यां पीनपयोधरां च विलसत्खड्गं करैर्विभ्रतीम्।
प्रत्यक्तास्यसुधामृतं पिवति यैः संसेव्यमाना परैः
वन्दे त्रीणि विलोचनां भगवतीं छिन्नप्रभां मस्तिकाम्॥
माँ छिन्नमस्तिका के सम्पूर्ण 108 पावन नाम
नीचे तालिका में माता छिन्नमस्तिका के सभी 108 पावन नाम शुद्ध संस्कृत मंत्र रूप (ॐ ... नमः) और उनके सरल हिंदी अर्थ के साथ दिए गए हैं:
| क्र.सं. | दिव्य नाम (संस्कृत मंत्र रूप) | प्रमुख भावार्थ (सरल हिंदी अर्थ) |
|---|---|---|
| १ | ॐ छिन्नमस्तायै नमः | जिनका मस्तक कटा हुआ है |
| २ | ॐ महाविद्यायै नमः | जो समस्त विद्याओं में श्रेष्ठ महाविद्या हैं |
| ३ | ॐ महाविद्यास्वरूपिण्यै नमः | जो स्वयं विद्या का स्वरूप हैं |
| ४ | ॐ घोरायै नमः | जो दुष्टों के लिए अत्यंत भयानक हैं |
| ५ | ॐ घोररूपायै नमः | जो भयंकर स्वरूप को धारण करने वाली हैं |
| ६ | ॐ घोरदंष्ट्रायै नमः | जिनकी दाढ़ें भयंकर हैं |
| ७ | ॐ सुलोचनायै नमः | जो सुंदर नेत्रों वाली हैं |
| ८ | ॐ मुण्डमालावृतायै नमः | जो मुण्डों की माला धारण करती हैं |
| ९ | ॐ मुण्डहस्तायै नमः | जो हाथ में कटा हुआ मस्तक धारण करती हैं |
| १० | ॐ खड्गहस्तायै नमः | जो हाथ में खड्ग (तलवार) धारण करती हैं |
| ११ | ॐ महारक्तायै नमः | जो महाप्रलय की रक्त धारा जैसी हैं |
| १२ | ॐ रक्तधारायै नमः | जिनके शरीर से रक्त की धारा बहती है |
| १३ | ॐ रक्तपानपरायणायै नमः | जो रक्त का पान करने में मग्न हैं |
| १४ | ॐ पिपासिन्यै नमः | जो परम चेतना की पिपासा से युक्त हैं |
| १५ | ॐ महामायान्यै नमः | जो संपूर्ण जगत को मोहित करने वाली महामाया हैं |
| १६ | ॐ महाशक्त्यै नमः | जो समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं |
| १७ | ॐ महोदव्यै नमः | जो महान तेज और समुद्र सी अगाध हैं |
| १८ | ॐ योगिन्यै नमः | जो योगियों द्वारा पूजनीय योग शक्ति हैं |
| १९ | ॐ योगरूपिण्यै नमः | जो योग का जीवंत रूप हैं |
| २० | ॐ योगसिद्धिप्रदायै नमः | जो योग की सिद्धियां प्रदान करने वाली हैं |
| २१ | ॐ मोक्षप्रदायै नमः | जो भवसागर से मुक्ति (मोक्ष) देती हैं |
| २२ | ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदायै नमः | जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं |
| २३ | ॐ भक्तवत्सलायै नमः | जो अपने भक्तों पर वात्सल्य रखती हैं |
| २४ | ॐ भक्तार्तिनाशिन्यै नमः | जो भक्तों के दुखों का नाश करती हैं |
| २५ | ॐ दुष्टप्रमथिन्यै नमः | जो दुष्टों का दमन करने वाली हैं |
| २६ | ॐ दैत्यनाशिन्यै नमः | जो दैत्य और असुरों का नाश करती हैं |
| २७ | ॐ दानवघ्न्यै नमः | जो दानवों का संहार करती हैं |
| २८ | ॐ कालरात्र्यै नमः | जो प्रलय काल की रात्रि के समान हैं |
| २९ | ॐ महाकाल्यै नमः | जो काल पर भी विजय पाने वाली महाकाली हैं |
| ३० | ॐ कालिकादयै नमः | जो कालिका आदि रूपों में पूज्य हैं |
| ३१ | ॐ कल्पवृक्षस्वरूपिण्यै नमः | जो भक्तों की इच्छा पूरी करने वाले कल्पवृक्ष जैसी हैं |
| ३२ | ॐ कामरूपिण्यै नमः | जो इच्छानुसार रूप धारण करने वाली हैं |
| ३३ | ॐ कामबीजप्रदायै नमः | जो काम बीज मंत्र प्रदान करती हैं |
| ३४ | ॐ कामेश्वर्यै नमः | जो कामदेव और संसार की अधीश्वर हैं |
| ३५ | ॐ कामकलारूपायै नमः | जो कामकला का स्वरूप हैं |
| ३६ | ॐ कामदात्र्यै नमः | जो सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं |
| ३७ | ॐ त्रिपुरसुन्दर्यै नमः | जो तीनों लोकों में सुंदर हैं |
| ३८ | ॐ त्रिगुणात्मिकायै नमः | जो सत, रज और तम तीनों गुणों से युक्त हैं |
| ३९ | ॐ त्रिशूलधारिण्यै नमः | जो त्रिशूल धारण करती हैं |
| ४० | ॐ त्रिनेत्रायै नमः | जो तीन नेत्रों वाली हैं |
| ४१ | ॐ त्रिलोकपालिन्यै नमः | जो तीनों लोकों का पालन करती हैं |
| ४२ | ॐ त्रिपुरार्यै नमः | जो त्रिपुरासुर का वध करने वाले शिव की शक्ति हैं |
| ४३ | ॐ त्रिपुरघ्न्यै नमः | जो त्रिपुर का नाश करने वाली हैं |
| ४४ | ॐ ब्रह्मरूपिण्यै नमः | जो ब्रह्म का स्वरूप हैं |
| ४५ | ॐ ब्रह्मस्वरूपायै नमः | जो ब्रह्मांड में व्याप्त हैं |
| ४६ | ॐ ब्रह्माण्डव्यापिण्यै नमः | जो संपूर्ण ब्रह्मांड में फैली हैं |
| ४७ | ॐ ब्रह्मविद्यायै नमः | जो ब्रह्म ज्ञान प्रदान करती हैं |
| ४८ | ॐ ब्रह्मेश्यै नमः | जो ब्रह्मा की भी ईश्वरी हैं |
| ४९ | ॐ विष्णुप्रियायै नमः | जो भगवान विष्णु को प्रिय हैं |
| ५० | ॐ विष्णुमाथायै नमः | जो विष्णु शक्ति का रूप हैं |
| ५१ | ॐ वैष्णव्यै नमः | जो वैष्णवी शक्ति हैं |
| ५२ | ॐ रुद्ररूपिण्यै नमः | जो रुद्र (शिव) का स्वरूप हैं |
| ५३ | ॐ रुद्राण्ये नमः | जो रुद्र की अर्धांगिनी रुद्राणी हैं |
| ५४ | ॐ शिवप्रियायै नमः | जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं |
| ५५ | ॐ शिवदूत्यै नमः | जो शिव की दूत रूप में कार्य करती हैं |
| ५६ | ॐ शिवपत्नीक्रे नमः | जो शिव की पत्नी हैं |
| ५७ | ॐ शिवायै नमः | जो कल्याणकारी शिवा हैं |
| ५८ | ॐ शान्तायै नमः | जो परम शांत स्वरूप हैं |
| ५९ | ॐ शान्तिस्वरूपिण्यै नमः | जो शांति का मूर्त रूप हैं |
| ६० | ॐ शान्तिप्रदायै नमः | जो भक्तों को शांति प्रदान करती हैं |
| ६१ | ॐ बुद्धिरूपिण्यै नमः | जो बुद्धि का स्वरूप हैं |
| ६२ | ॐ बुद्धिप्रदायै नमः | जो सद्बुद्धि देती हैं |
| ६३ | ॐ ज्ञानप्रदायै नमः | जो दिव्य ज्ञान देती हैं |
| ६४ | ॐ ज्ञानगम्यायै नमः | जो केवल ज्ञान से प्राप्त होती हैं |
| ६५ | ॐ विज्ञानरूपिण्यै नमः | जो विज्ञान और चेतना का स्वरूप हैं |
| ६६ | ॐ विष्णुरूपायै नमः | जो विष्णु का रूप हैं |
| ६७ | ॐ सत्यायै नमः | जो परम सत्य हैं |
| ६८ | ॐ सत्यपरायणायै नमः | जो सत्य में तत्पर हैं |
| ६९ | ॐ सत्यधर्मिण्यै नमः | जो सत्य धर्म का पालन करती हैं |
| ७० | ॐ सत्यानन्दस्वरूपिण्यै नमः | जो सच्चिदानंद स्वरूप हैं |
| ७१ | ॐ आनन्दमस्त्यै नमः | जो आनंदमयी हैं |
| ७२ | ॐ नित्यायै नमः | जो शाश्वत और नित्य हैं |
| ७३ | ॐ सत्यनित्यायै नमः | जो हमेशा सत्य रहने वाली हैं |
| ७४ | ॐ निरंजनायै नमः | जो सभी दोषों और विकारों से परे निरंजन हैं |
| ७५ | ॐ निराकारायै नमः | जो निराकार ब्रह्म स्वरूपा हैं |
| ७६ | ॐ साकारायै नमः | जो भक्तों के लिए साकार रूप लेती हैं |
| ७७ | ॐ सर्वेश्वर्यै नमः | जो सबकी ईश्वरी हैं |
| ७८ | ॐ सर्वव्यापिण्यै नमः | जो सब जगह व्याप्त हैं |
| ७९ | ॐ सर्वभूतस्थायै नमः | जो सभी प्राणियों में स्थित हैं |
| ८० | ॐ सर्वशक्तिमत्त्यै नमः | जो सभी शक्तियों से संपन्न हैं |
| ८१ | ॐ सर्वमंगलकारिण्यै नमः | जो सबका मंगल करने वाली हैं |
| ८२ | ॐ सर्वदुःखहरिण्यै नमः | जो सभी दुखों को हरने वाली हैं |
| ८३ | ॐ सर्वव्याधिविनाशिन्यै नमः | जो सभी रोगों का नाश करती हैं |
| ८४ | ॐ सर्वरक्षाकारिण्यै नमः | जो सबकी रक्षा करती हैं |
| ८५ | ॐ सर्वसिद्धिप्रदायै नमः | जो सभी प्रकार की सिद्धियां देती हैं |
| ८६ | ॐ सर्वकामप्रदायै नमः | जो सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं |
| ८७ | ॐ महामायायै नमः | जो परम माया शक्ति हैं |
| ८८ | ॐ महातेजसे नमः | जो महातेजस्वी हैं |
| ८९ | ॐ महाद्युतये नमः | जो महान कांति वाली हैं |
| ९० | ॐ महाघोरायै नमः | जो महाघोर रूप वाली हैं |
| ९१ | ॐ महामृत्यविनाशिन्यै नमः | जो महामृत्यु और भय को नाश करने वाली हैं |
| ९२ | ॐ मृत्यञ्जयायै नमः | जो मृत्यु पर विजय पाने वाली हैं |
| ९३ | ॐ कालजयिन्यै नमः | जो काल को जीतने वाली हैं |
| ९४ | ॐ भयहारिण्यै नमः | जो सभी प्रकार के भय दूर करती हैं |
| ९५ | ॐ संकटनाशिन्यै नमः | जो संकटों का नाश करती हैं |
| ९६ | ॐ आपत्तिहारिण्यै नमः | जो आपत्तियों को हर लेती हैं |
| ९७ | ॐ दुर्गतिनाशिन्यै नमः | जो बुरी गति और नर्क से बचाती हैं |
| ९८ | ॐ भवतारिण्यै नमः | जो भवसागर से पार लगाती हैं |
| ९९ | ॐ संसारमोचिन्यै नमः | जो संसार के बंधनों से मुक्त करती हैं |
| १०० | ॐ मुक्तिदायिन्यै नमः | जो मुक्ति प्रदान करती हैं |
| १०१ | ॐ योगिन्यै नमः | जो योग शक्ति हैं |
| १०२ | ॐ सिद्धयै नमः | जो स्वयं सिद्धि स्वरूपा हैं |
| १०३ | ॐ बुद्धयै नमः | जो बुद्धि रूप हैं |
| १०४ | ॐ लक्ष्म्यै नमः | जो महालक्ष्मी स्वरूप हैं |
| १०५ | ॐ सरस्वत्यै नमः | जो विद्यादात्री सरस्वती हैं |
| १०६ | ॐ कालिकाख्येयै नमः | जो कालिका नाम से विख्यात हैं |
| १०७ | ॐ छिन्नमस्तिकाभगवत्यै नमः | जो भगवती छिन्नमस्तिका हैं |
| १०८ | ॐ महाच्छिन्नमस्तायै नमः | जो महाछिन्नमस्ता के रूप में पूज्य हैं |
| क्रम संख्या | माँ छिन्नमस्तिका का पावन नाम | आध्यात्मिक अर्थ व प्रभाव |
|---|---|---|
| 1 | ॐ छिन्नमस्तायै नमः | कटी हुई मुण्ड वाली, जो अहंकार का नाश करती हैं। |
| 2 | ॐ महाविद्यायै नमः | सर्वोच्च ज्ञान और विद्या प्रदान करने वाली। |
| 3 | ॐ घोररूपायै नमः | अत्यंत भयंकर किंतु कल्याणकारी स्वरूप वाली। |
| 4 | ॐ वरदायै नमः | भक्तों को मनोवांछित वर देने वाली। |
| 5 | ॐ मोक्षदायिन्यै नमः | संसार के बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली। |
शतनामावली पाठ की शास्त्रीय विधि, नियम और अनुष्ठान की दिशा
माँ छिन्नमस्तिका के अष्टोत्तर शतनामावली का जप करने के लिए कठोर नियमों और अनुशासन की आवश्यकता होती है क्योंकि यह महाविद्या प्रत्यक्ष रूप से प्रचंड ऊर्जा से संबंधित है। इस साधना को करने से पूर्व साधक को पवित्रता, संयम और पूर्ण समर्पण का भाव अपने भीतर धारण करना चाहिए। जप के लिए सबसे उत्तम समय मध्य रात्रि या प्रदोष काल का माना जाता है, हालांकि नियमित रूप से सूर्योदय के समय भी इसका पाठ किया जा सकता है। पूजा स्थल पर लाल रंग के आसन का प्रयोग करना सर्वश्रेष्ठ होता है क्योंकि यह रंग माँ के प्रिय रक्त वर्ण और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
साधना कक्ष को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें और वहाँ एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ छिन्नमस्तिका के चित्र या विग्रह की स्थापना करें। इसके पश्चात षोडशोपचार या पंचोपचार विधि से माँ का पूजन करें, जिसमें लाल पुष्प, अक्षत, रोली, धूप, दीप और गुग्गुल का नैवेद्य अर्पित किया जाए। जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला या रक्त चंदन की माला का उपयोग करना चाहिए। पाठ शुरू करने से पहले भगवान गणेश और अपने गुरु का स्मरण अवश्य करें ताकि साधना में किसी प्रकार की बाधा न आए। प्रत्येक नाम के आरंभ में 'ॐ' और अंत में 'नमः' का उच्चारण करते हुए पूरी श्रद्धा के साथ एक-एक नाम का मानसिक या वाचिक जप करना चाहिए।
अनुष्ठान के दौरान ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन करना और सात्विक आहार ग्रहण करना अत्यंत आवश्यक है। इस साधना को गुप्त रूप से करना चाहिए, अर्थात् अपने जप और अनुष्ठान की बातों को सार्वजनिक करने से इसकी ऊर्जा क्षीण हो सकती है। जो साधक विधि-विधान से इन एक सौ आठ नामों का नित्य प्रति पाठ करता है, उसके जीवन में किसी भी प्रकार की आकस्मिक विपत्ति, तंत्र-बाधा या शत्रुओं का भय नहीं रहता। माँ छिन्नमस्तिका की कृपा से उसकी वाणी में तीव्र प्रभाव उत्पन्न होता है और उसके सभी रुके हुए कार्य अनायास ही पूर्ण होने लगते हैं।
माँ छिन्नमस्तिका शतनामावली की फलश्रुति और अलौकिक अनुभूतियाँ
किसी भी स्तोत्र या शतनामावली की पूर्णता उसकी फलश्रुति में निहित होती है, जो यह बताती है कि इस पवित्र पाठ को करने से साधक को किस प्रकार के लोक और परलोक संबंधी फलों की प्राप्ति होती है। माँ छिन्नमस्तिका की यह शतनामावली केवल भौतिक सुखों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भोग और मोक्ष दोनों एक साथ प्रदान करने वाली है। फलश्रुति के अनुसार, जो व्यक्ति नियमित रूप से इस अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ करता है, उसे कभी भी धन, धान्य, यश और ऐश्वर्य की कमी का सामना नहीं करना पड़ता। देवी की कृपा से उसके समस्त पाप और पूर्व जन्मों के नकारात्मक कर्म नष्ट हो जाते हैं।
"इदं तु शतनामावली दिव्यं छिन्नमस्ताप्रसाददम्। पठेद्विप्रः शुची नित्यं सर्वान् कामानवाप्नुयात्॥ मृत्युभयं न तस्य स्यात् न च शत्रुजये भयम्। महाघोरान्तरे चापि विजये तस्य सर्वतः॥"
इस फलश्रुति का मर्म यह है कि जो साधक पवित्रता के साथ इस दिव्य शतनामावली का पाठ करता है, वह जीवन में जिस भी कामना को लेकर आगे बढ़ता है, उसे अवश्य ही पूर्णता प्राप्त होती है। उसे मृत्यु का भय और अकाल मृत्यु का संकट छू भी नहीं सकता। अदालती मामलों, मुकदमों, और गुप्त शत्रुओं द्वारा रचे गए षड्यंत्रों में उसे शत-प्रतिशत विजय मिलती है। समाज में उसका मान-सम्मान और तेजस्विता इस प्रकार बढ़ जाती है जैसे तपते हुए सूर्य की किरणें अंधकार को चीरकर चारों ओर प्रकाश फैला देती हैं।
अंततः, इस साधना का सबसे बड़ा फल आत्मकल्याण और आत्मसाक्षात्कार है। जब साधक के मन से संसार के प्रति आसक्ति और मोह समाप्त होने लगते हैं, तब वह माँ छिन्नमस्तिका के उस परम निर्गुण और सगुण स्वरूप का दर्शन अपने हृदय में करने लगता है जहाँ द्वैत का कोई स्थान नहीं रहता। यह शतनामावली साधक के भीतर एक ऐसी जागृति पैदा करती है जो उसे साधारण मनुष्य से ऊपर उठाकर एक सिद्ध और ऊर्जावान योगी बना देती है। अतः प्रत्येक आस्तिक और तांत्रिक साधना में रुचि रखने वाले साधक को अपने जीवन में कम से कम एक बार इस पावन शतनामावली का पूर्ण विधि-विधान से अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए।
संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री
यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।
दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें
प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें