भगवान विट्ठल अष्टोत्तर शतनामावली पौराणिक परिचय एवं आध्यात्मिक रहस्य
सनातन धर्म और वारकरी संप्रदाय में भगवान विट्ठल (जिन्हें पांडुरंग या विठोबा भी कहा जाता है) की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। महाराष्ट्र के पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के तट पर विराजमान भगवान विट्ठल ईट पर खड़े होकर अपने भक्तों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ही अपने भक्त पुण्डलिक की माता-पिता की सेवा से प्रसन्न होकर विट्ठल रूप में प्रकट हुए थे। भगवान विट्ठल की यह अष्टोत्तर शतनामावली उनके अनंत गुणों, रूपों और कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करती है। इस शतनामावली का नित्य पाठ करने से साधक के जीवन में भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और शांति का संचार होता है। वारकरी संप्रदाय के संतों जैसे संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव और संत एकनाथ ने इसी विट्ठल नाम की महिमा को घर-घर तक पहुँचाया। भगवान विट्ठल के 108 नामों का स्मरण करना मानव जन्म को सफल बनाने का एक सर्वोत्तम साधन माना गया है।
विट्ठल भक्ति का मर्म
वारकरी संप्रदाय में 'रामकृष्ण हरी' का महामंत्र जपते हुए विट्ठल चरणों में ध्यान लगाने से भवसागर तर जाता है। विट्ठल नाम का अर्थ ही है जो ज्ञान (विट्) और थल (स्थान) का आधार हो या जो ईट पर खड़े होकर भक्तवत्सलता का परिचय देते हैं।
विनियोग, ध्यान एवं नामावली जप संकल्प
किसी भी अष्टोत्तर शतनामावली या स्तोत्र के पाठ से पूर्व मानसिक पवित्रता और संकल्प अत्यंत आवश्यक है। भगवान विट्ठल के स्मरण के साथ विनियोग और ध्यान करने से जप का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
ध्यानम्:
कस्तुरी तिलक ललाट पटे, वक्षः कौस्तुभ शोभितं,
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले, वेणुं करे कंकणं।
सर्वांगे हरिचंदनं परितृप्तं, कंठे च मुक्तामणिं,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपालकृष्णो विभुः ॥
भगवान विट्ठल के सम्पूर्ण 108 पावन नाम
नीचे भगवान विट्ठल (पांडुरंग) के 108 दिव्य नाम उनके संस्कृत मंत्र रूप (ॐ...नमः) और सरल हिंदी अर्थ के साथ दिए गए हैं:
| क्र.सं. | दिव्य नाम (मंत्र रूप) | प्रमुख भावार्थ (सरल हिंदी अर्थ) | |
|---|---|---|---|
| 1 | ॐ विठ्ठलाय नमः | विट्ठल अर्थात जो परम ज्ञान और ईट पर आसीन हैं | |
| 2 | ॐ पाण्डुरंगाय नमः | जिनका वर्ण श्वेत या गौर आभायुक्त है | |
| 3 | ॐ कृष्णाय नमः | जो स्वयं पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण हैं | |
| 4 | ॐ विष्णुवे नमः | जो संपूर्ण जगत के पालनहार विष्णु हैं | |
| 5 | ॐ मधुसूदनाय नमः | मधु नामक राक्षस का वध करने वाले | |
| 6 | ॐ केशवाय नमः | सुंदर केश वाले या केशी का वध करने वाले | |
| 7 | ॐ माधवाय नमः | माता लक्ष्मी के पति या मधु कुल में उत्पन्न | |
| 8 | ॐ हृषिकेशाय नमः | इंद्रियों के स्वामी | |
| 9 | ॐ पद्मनाभाय नमः | जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है | |
| 10 | ॐ गोविंदाय नमः | गायों और पृथ्वी को प्रसन्न करने वाले | |
| 11 | ॐ अच्युताय नमः | जो कभी अपने पद से च्युत नहीं होते | |
| 12 | ॐ अनन्ताय नमः | जिनका कोई अंत नहीं है | |
| 13 | ॐ वासुदेवाय नमः | वसुदेव के पुत्र और सर्वव्यापी | |
| 14 | ॐ त्रिविक्रमाय नमः | तीन पगों में तीनों लोकों को नापने वाले | |
| 15 | ॐ श्रीलक्षणाय नमः | शुभ लक्षणों से युक्त | |
| 16 | ॐ दामोदराय नमः | जिनका उधर माता यशोदा द्वारा रस्सी से बंधा गया था | |
| 17 | ॐ नारायणाय नमः | समस्त जीवों के आश्रय | |
| 18 | ॐ पुरुषोत्तमाय नमः | पुरुषों में उत्तम | |
| 19 | ॐ वैकुण्ठनाथाय नमः | वैकुण्ठ धाम के स्वामी | |
| 20 | ॐ भक्तवत्सलाय नमः | भक्तों से प्रेम करने वाले | |
| 21 | ॐ पुण्डलिकप्रियाय नमः | भक्त पुण्डलिक को प्रिय | |
| 22 | ॐ भीमाशंकरप्रियाय नमः | भीमा नदी के तट पर निवास करने वाले | |
| 23 | ॐ चंद्रभागातिथये नमः | चंद्रभागा नदी के तट के अतिथि | |
| 24 | ॐ विटस्थिताय नमः | ईट पर खड़े रहने वाले | |
| 25 | ॐ कटिहस्ताय नमः | कमर पर दोनों हाथ रखे हुए | |
| 26 | ॐ शंखचक्रधराय नमः | शंख और चक्र धारण करने वाले | |
| 27 | ॐ गदापद्मधराय नमः | गदा और पद्म धारण करने वाले | |
| 28 | ॐ किरीटकुण्डलशोभिताय नमः | मुकुट और कुंडल से सुशोभित | |
| 29 | ॐ वनमालिने नमः | वनों की माला पहनने वाले | |
| 30 | ॐ पीतवाससे नमः | पीतांबर वस्त्र धारण करने वाले | |
| 31 | ॐ श्रीकंठाय नमः | सुंदर कंठ वाले | |
| 32 | ॐ कौस्तुभमणिभूषिताय नमः | कौस्तुभ मणि से सुशोभित | |
| 33 | ॐ भक्तप्रियकराय नमः | भक्तों को प्रिय करने वाले | |
| 34 | ॐ दीनबंधवे नमः | दीनों और गरीबों के बंधु | |
| 35 | ॐ करुणासिंधवे नमः | दया के सागर | |
| 36 | ॐ भक्तार्तिनाशनाय नमः | भक्तों के दुखों का नाश करने वाले | |
| 37 | ॐ संसारमोचकाय नमः | संसार रूपी बंधन से मुक्त करने वाले | |
| 38 | ॐ भवसागरतारकाय नमः | भवसागर से पार लगाने वाले | |
| 39 | ॐ ज्ञानप्रदाय नमः | ज्ञान प्रदान करने वाले | |
| 40 | ॐ मुक्तिप्रदाय नमः | मोक्ष प्रदान करने वाले | |
| 41 | ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदायकाय नमः | भोग और मोक्ष दोनों देने वाले | |
| 42 | ॐ योगिने नमः | योगियों के ध्येय | |
| 43 | ॐ योगेश्वराय नमः | योगियों के ईश्वर | |
| 44 | ॐ योगनिधिने नमः | योग के खजाने | |
| 45 | ॐ परमत्मने नमः | परम आत्मा | |
| 46 | ॐ परात्पराय नमः | परा से भी परे सर्वोच्च सत्ता | |
| 47 | ॐ जगन्नाथाय नमः | संसार के नाथ | |
| 48 | ॐ जगद्गुरवे नमः | संसार के गुरु | |
| 49 | ॐ जगत्पात्राय नमः | समस्त जगत के आधार | |
| 50 | ॐ जगत्साक्षिणे नमः | संसार के साक्षी | |
| 51 | ॐ सर्वभूतात्मने नमः | सब भूतों की आत्मा | |
| 52 | ॐ सर्वेश्वराय नमः | सबके ईश्वर | |
| 53 | ॐ सर्वज्ञाय नमः | सब कुछ जानने वाले | |
| 54 | ॐ सर्वव्यापिने नमः | सब जगह व्याप्त | |
| 55 | ॐ सर्वमंगलाय नमः | सबका कल्याण करने वाले | |
| 56 | ॐ शरण्यप्रियाय नमः | शरण में आए हुओं को प्रिय | |
| 57 | ॐ आर्तिहरताय नमः | पीड़ा हरने वाले | |
| 58 | ॐ संकटमोचकाय नमः | संकटों से छुड़ाने वाले | |
| 59 | ॐ दुष्टनिर्दलनाय नमः | दुष्टों का नाश करने वाले | |
| 60 | ॐ साधुपालकाय नमः | सज्जनों की रक्षा करने वाले | |
| 61 | ॐ धर्मसंस्थापकाय नमः | धर्म की स्थापना करने वाले | |
| 62 | ॐ सत्यसंधाय नमः | सत्य प्रतिज्ञा वाले | |
| 63 | ॐ सत्यप्रियाय नमः | सत्य प्रिय | |
| 64 | ॐ धर्मप्रियाय नमः | धर्म प्रिय | |
| 65 | ॐ भक्तवाञ्छाकल्पद्रुमाय नमः | भक्तों की इच्छा पूरी करने वाले कल्पवृक्ष | |
| 66 | ॐ कामधेनुस्वरूपाय नमः | कामधेनु के समान फल देने वाले | |
| 67 | ॐ चिंतामणिप्रभवे नमः | चिंतामणि के समान प्रभाव वाले | |
| 68 | ॐ शान्ताय नमः | शांत स्वरूप | |
| 69 | ॐ दान्ताय नमः | इंद्रियों को वश में रखने वाले | |
| 70 | ॐ क्षमाशीलाय नमः | क्षमा के भंडार | |
| 71 | ॐ करुणानिधये नमः | दया के खजाने | |
| 72 | ॐ तेजस्विने नमः | तेजपुंज | |
| 73 | ॐ वर्चस्विने नमः | दीप्तिमान | |
| 74 | ॐ यशस्विने नमः | यश प्राप्त | |
| 75 | ॐ सर्वलोकमंगलाय नमः | सभी लोकों का मंगल करने वाले | |
| 76 | ॐ सर्वरोगनिवारकाय नमः | सभी रोगों का निवारण करने वाले | |
| 77 | ॐ आयुःप्रदाय नमः | लंबी आयु देने वाले | |
| 78 | ॐ धनप्रदाय नमः | धन और ऐश्वर्य देने वाले | |
| 79 | ॐ ऐश्वर्यप्रदायकाय नमः | परम ऐश्वर्य दाता | |
| 80 | ॐ पुत्रपौत्रप्रदाय नमः | वंश वृद्धि करने वाले | |
| 81 | ॐ विद्याप्रदाय नमः | विद्या और बुद्धि देने वाले | |
| 82 | ॐ बुद्धिवर्धकाय नमः | बुद्धि को बढ़ाने वाले | |
| 83 | ॐ स्मृतिप्रदाय नमः | स्मरण शक्ति देने वाले | |
| 84 | ॐ कीर्तिप्रदाय नमः | कीर्ति फैलाने वाले | |
| 85 | ॐ बलप्रदाय नमः | शारीरिक और आत्मिक बल देने वाले | |
| 86 | ॐ उत्साहवर्धकाय नमः | उत्साह बढ़ाने वाले | |
| 87 | ॐ निर्भयप्रदाय नमः | भय दूर करने वाले | |
| 88 | ॐ शोकनिवारकाय नमः | शोक का निवारण करने वाले | |
| 89 | ॐ भयहरताय नमः | भय हरने वाले | |
| 90 | ॐ दुःस्वप्ननाशनाय नमः | बुरे सपनों का नाश करने वाले | |
| 91 | ॐ पापनाशनाय नमः | पापों का नाश करने वाले | |
| 92 | ॐ पुण्यरक्षकाय नमः | पुण्य की रक्षा करने वाले | |
| 93 | ॐ पवित्राय नमः | परम पवित्र | |
| 94 | ॐ मंगलाय नमः | मंगलस्वरूप | |
| 95 | ॐ शुभाय नमः | शुभकारी | |
| 96 | ॐ अच्युतप्रियाय नमः | अच्युत को प्रिय | |
| 97 | ॐ गरुड़ध्वजाय नमः | गरुड़ जिनका चिह्न है | |
| 98 | ॐ शेषशायिने नमः | शेषनाग पर शयन करने वाले | |
| 99 | ॐ क्षीरसागरवासिने नमः | क्षीरसागर में निवास करने वाले | |
| 100 | ॐ रमानाथाय नमः | माता लक्ष्मी के नाथ | |
| 101 | ॐ कमलोदराय नमः | कमल के समान पेट वाले | |
| 102 | ॐ वनमालाधराय नमः | वनमाला धारण करने वाले | |
| 103 | ॐ मुरारये नमः | मुर राक्षस के शत्रु | |
| 104 | ॐ कंसनाशाय नमः | कंस का वध करने वाले | |
| 105 | ॐ कालमर्धनाय नमः | काल का मर्दन करने वाले | |
| 106 | ॐ भक्तवल्लभाय नमः | भक्तों के वल्लभ | |
| 107 | ॐ पाण्डुरंगविठ्ठलाय नमः | पांडुरंग रूपी विट्ठल | |
| 108 | ॐ श्रीविठ्ठलस्वामिने नमः | समस्त जगत के स्वामी श्री विट्ठल |
| क्रम संख्या | भगवान विट्ठल का पावन नाम | क्रम संख्या | भगवान विट्ठल का पावन नाम |
|---|---|---|---|
| १ | ॐ विठ्ठलाय नमः | ५५ | ॐ योगिने नमः |
| २ | ॐ पांडुरंगाय नमः | ५६ | ॐ योगप्रदाय नमः |
| ३ | ॐ पंढरीनाथाय नमः | ५७ | ॐ ब्रह्मणे नमः |
| ४ | ॐ भीमावरतीरस्थाय नमः | ५८ | ॐ परब्रह्मणे नमः |
| ५ | ॐ चंद्रभागा-तटस्थाय नमः | ५९ | ॐ सच्चिदानंदविग्रहाय नमः |
| ६ | ॐ पुंडरीकवरदाय नमः | ६० | ॐ भक्तवत्सलाय नमः |
| ७ | ॐ कृष्णाय नमः | ६१ | ॐ शरणागतवत्सलाय नमः |
| ८ | ॐ विष्णवे नमः | ६२ | ॐ करुणासिंधवे नमः |
| ९ | ॐ अच्युताय नमः | ६३ | ॐ दीनबंधवे नमः |
| १० | ॐ अनंताय नमः | ६४ | ॐ आर्तत्राणपरायणाय नमः |
| ११ | ॐ वासुदेवाय नमः | ६५ | ॐ करुणाकराय नमः |
| १२ | ॐ केशवाय नमः | ६६ | ॐ दयालवे नमः |
| १३ | ॐ माधवाय नमः | ६७ | ॐ सुलभभक्ताय नमः |
| १४ | ॐ गोविंदाय नमः | ६८ | ॐ दुर्लभदुरात्मने नमः |
| १५ | ॐ त्रिविक्रमाय नमः | ६९ | ॐ शांतये नमः |
| १६ | ॐ वामनाय नमः | ७० | ॐ दान्ताय नमः |
| १७ | ॐ श्रीधराय नमः | ७१ | ॐ जितेन्द्रियाय नमः |
| १८ | ॐ हृषिकेशाय नमः | ७२ | ॐ कामजित्रे नमः |
| १९ | ॐ पद्मनाभाय नमः | ७३ | ॐ क्रोधजित्रे नमः |
| २० | ॐ दामोदराय नमः | ७४ | ॐ लोभनाशाय नमः |
| २१ | ॐ संकर्षणाय नमः | ७५ | ॐ मोहहराय नमः |
| २२ | ॐ प्रद्युम्नाय नमः | ७६ | ॐ मदनाशाय नमः |
| २३ | ॐ अनिरुद्धाय नमः | ७७ | ॐ संसारतारकाय नमः |
| २४ | ॐ पुरुषोत्तमाय नमः | ७८ | ॐ भवभयनाशाय नमः |
| २५ | ॐ अधोक्षजाय नमः | ७९ | ॐ मृत्यंजय नमः |
| २६ | ॐ नारसिंहाय नमः | ८० | ॐ अभयप्रदाय नमः |
| २७ | ॐ राघवाय नमः | ८१ | ॐ वरप्रदाय नमः |
| २८ | ॐ रामय नमः | ८२ | ॐ सर्वेश्वराय नमः |
| २९ | ॐ बालकृष्णाय नमः | ८३ | ॐ महेश्वराय नमः |
| ३० | ॐ मुरारये नमः | ८४ | ॐ सर्वभूतात्मने नमः |
| ३१ | ॐ कंसमथनाय नमः | ८५ | ॐ विश्वात्मने नमः |
| ३२ | ॐ दैत्यनाशाय नमः | ८६ | ॐ विश्वरूपिणे नमः |
| ३३ | ॐ भक्तप्रियकाय नमः | ८७ | ॐ विश्वसंभवाय नमः |
| ३४ | ॐ पुंडरीकाक्षाय नमः | ८८ | ॐ जगन्नाथाय नमः |
| ३५ | ॐ गदाधराय नमः | ८९ | ॐ जगदीश्वराय नमः |
| ३६ | ॐ शंखपाणिने नमः | ९० | ॐ लोकनाथाय नमः |
| ३७ | ॐ चक्रहस्ताय नमः | ९१ | ॐ भुवनपालांगकाय नमः |
| ३८ | ॐ पद्महस्ताय नमः | ९२ | ॐ पुराणपुरुषाय नमः |
| ३९ | ॐ वनमालिने नमः | ९३ | ॐ नव्याय नमः |
| ४० | ॐ पीतवाससे नमः | ९४ | ॐ ज्ञानाय नमः |
| ४१ | ॐ श्रीकंठाय नमः | ९५ | ॐ विज्ञानमयाय नमः |
| ४२ | ॐ कौस्तुभश्रियै नमः | ९६ | ॐ आनंदमयाय नमः |
| ४३ | ॐ श्रीवत्सवक्षसे नमः | ९७ | ॐ सत्यरूपिणे नमः |
| ४४ | ॐ गरुडध्वजाय नमः | ९८ | ॐ धर्मरक्षकाय नमः |
| ४५ | ॐ शेषाशयाय नमः | ९९ | ॐ पापनाशाय नमः |
| ४६ | ॐ जगन्मूलाय नमः | १०० | ॐ पुनीतकीर्तये नमः |
| ४७ | ॐ जगत्पात्राय नमः | १०१ | ॐ नामप्रियाय नमः |
| ४८ | ॐ जगत्सृष्ट्रे नमः | १०२ | ॐ भक्तदासाय नमः |
| ४९ | ॐ जगत्पालकाय नमः | १०३ | ॐ ईंटस्थितपदद्वयाय नमः |
| ५0 | ॐ जगत्हर्त्रे नमः | १०४ | ॐ कटिहस्तमूर्तये नमः |
| ५१ | ॐ मायामयाय नमः | १०५ | ॐ समचरणाय नमः |
| ५२ | ॐ योगिने नमः | १०६ | ॐ मुकुंदाय नमः |
| ५३ | ॐ योगेश्वराय नमः | १०७ | ॐ विमुक्तये नमः |
| ५४ | ॐ योगनिधये नमः | १०८ | ॐ श्रीपांडुरंगविट्ठलाय नमः |
अष्टोत्तर शतनामावली का यह क्रम भगवान विट्ठल के बाल्यकाल से लेकर उनके परम ब्रह्म स्वरूप तक की संपूर्ण यात्रा को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। इन नामों में 'ईंटस्थितपदद्वयाय' और 'कटिहस्तमूर्तये' जैसे नाम सीधे तौर पर उनकी उस अद्वितीय मूर्ति का वर्णन करते हैं, जिसमें वे अपनी कमर पर दोनों हाथ धरे ईंट पर खड़े हैं। यह मुद्रा इस बात का प्रतीक है कि भगवान अपने भक्तों की पुकार सुनने के लिए हमेशा तत्पर हैं और जो भी उनकी शरण में आता है, वे उसे अपनी पनाह में ले लेते हैं। इन नामों का सस्वर पाठ करने से साधक को मानसिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर असीम शांति की प्राप्ति होती है.
नाम जप की विधि, नियम और विशेष फलश्रुति
"कलौ नाम च नाम च नामैव मम जीवनम्। विट्ठल नामस्मरेत् यस्तु तस्य मुक्तिः करे स्थिता॥"
भगवान विट्ठल की इस अष्टोत्तर शतनामावली का जप करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि साधना का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपने घर के पूजा गृह में भगवान विट्ठल और रखुमाई (रुक्मिणी) की प्रतिमा या चित्र के समक्ष घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें। आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। तुलसी की माला या स्फटिक की माला का उपयोग नाम जप के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। जप करते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण का भाव होना चाहिए, क्योंकि भगवान बाहरी दिखावे से अधिक भक्त के आंतरिक भाव को महत्व देते हैं।
इस शतनामावली के पाठ और जप की फलश्रुति का वर्णन विभिन्न संतों और पुराणों में मिलता है। जो भक्त पूर्ण नियम और निष्ठा के साथ इस अष्टोत्तर शतनामावली का प्रतिदिन पाठ करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, भय, मानसिक अशांति और अज्ञान का अंधकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। पांडुरंग की कृपा से उसके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। स्वास्थ्य लाभ, लंबी आयु, और यश की प्राप्ति के लिए यह जप अचूक औषधि के समान कार्य करता है। विशेषकर एकादशी तिथि, आषाढ़ी एकादशी, और कार्तिकी एकादशी के पावन अवसरों पर इस शतनामावली का अनुष्ठान करने से कई गुना अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है.
अंततः, भगवान विट्ठल के 108 पावन नामों का यह जप साधक को भवसागर से पार लगाने वाली नौका के समान है। यह केवल मोक्ष का साधन नहीं है, बल्कि जीवन को जीने की एक दिव्य कला भी सिखाता है। जब मनुष्य अपने हर श्वास के साथ विट्ठल नाम का स्मरण करने लगता है, तो उसका अंतःकरण मंदिर बन जाता है और उसे हर जगह पांडुरंग के ही दर्शन होने लगते हैं। आइए, हम सब भी अपने जीवन को धन्य बनाने के लिए इस पावन अष्टोत्तर शतनामावली को अपने नित्य नियम का हिस्सा बनाएं और भगवान विट्ठल के चरणों में अपनी अनन्य भक्ति अर्पित करें। जय जय राम कृष्ण हरि!
संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री
यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।
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