Chhath Puja Geet मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा लिरिक्स (Uga He Suraj Dev Bhor Bhinasarava Lyrics in Hindi) - Chhath Puja Geet

छठ पूजा के पावन गीत 'उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा' के लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। सूर्य देव की महिमा और भक्ति से ओत-प्रोत इस लोकगीत का आनंद लें।

छठ पूजा गीत / Chhath Puja Geet

Chhath Puja Geet

लोक आस्था के महान पर्व छठ महापर्व का नाम लेते ही जुबां पर सबसे पहले भगवान भास्कर (सूर्य देव) की महिमा और उनके स्वागत में गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत आ जाते हैं। 'उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा' छठ पूजा के सबसे लोकप्रिय, प्राणवान और पवित्र गीतों में से एक है। यह केवल एक भजन या गीत नहीं है, बल्कि यह एक व्रती की अपने आराध्य सूर्य नारायण के प्रति अनन्य भक्ति, प्रगाढ़ विश्वास और उस आतुर प्रतीक्षा का जीवंत दस्तावेज है, जब वह पूरी रात्रि कठिन उपवास और जागरण के बाद सूर्योदय की पहली किरण के दर्शन की अभिलाषा रखती है। भोजपुरी और मैथिली अंचल की लोक संस्कृति में रचे-बसे इस गीत के हर एक शब्द में त्याग, तपस्या, प्रकृति प्रेम और परम शक्ति के प्रति कृतज्ञता का भाव झलकता है। छठ पूजा के अन्य लोकप्रिय गीतों और लिरिक्स के साथ इस पावन शृंखला में सूर्य उपासना का यह गीत साधक के अंतर्मन को एक अलौकिक दिव्यता से भर देता है।


सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा ॥

उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा,
अरघिया के बेर हो...
अरघिया के बेर हो..
अवतारी छठी मैया केर महिमा,
अमिय बरसेले हो...

काँचहि बाँस के बहंगिया,
बहंगिया लचकत जाइ..
हँइके बहंगिया घाट पहुँचावब,
बहि जात नीर हो...

सुना हे सूरज देव अरज हमार,
दरस दियो ना हो..
तोर चरणन में हम सिर नवाइब,
पूरब आस हमार हो...

घटवा पे उमड़ल बा भारी भीड़,
दर्शन के प्यासल मनवा मीर..
उगा हे सूरज देव सुरुज भगवान,
कहे भक्त तोहार गावान हो...

सकल चराचर जग के स्वामी,
तुम अंतर्यामी त्रिभुवननामी..
छठी घाटे सजेला दरबार,
बरसे कृपा अपार हो...

उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा,
अरघिया के बेर हो..
अवतारी छठी मैया केर महिमा,
अमिय बरसेले हो...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

'उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा' गीत का शाब्दिक और आंतरिक अर्थ बहुत ही गहरा है। व्रती माताएं और बहनें अत्यंत भावुक होकर सूर्य देव से विनती करती हैं कि हे सूर्य देव! अब सुबह की भोर हो चुकी है, रात का अंधकार छट रहा है और यह समय आपको अर्घ्य देने का है, इसलिए अब आप अपनी किरणों के साथ प्रकट हों। इस गीत में काँच के बांस की बहंगी का जिक्र है, जो छठ पर्व की पारंपरिक कला और ग्रामीण संस्कृति का प्रतीक है। व्रती कठिन साधना के बाद उस बहंगी को उठाकर नदी या तालाब के घाट तक ले जाती हैं, जहां जल में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है।

गीत का भावार्थ यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां (अंधकार) क्यों न आएं, अंततः सूर्य (ज्ञान, ऊर्जा और प्रकाश) का उदय अवश्य होता है। छठी मैया और सूर्य देव की महिमा का गुणगान करते हुए भक्त यह निवेदन करता है कि हे जगत के स्वामी! हमारे द्वारा लाए गए अर्घ्य को स्वीकार करें और हमारे जीवन को सुख, समृद्धि, आरोग्यता और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण कर दें।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह पारंपरिक लोकगीत सनातन संस्कृति में प्रकृति, जल, अग्नि और सूर्य उपासना के अनूठे समन्वय को दर्शाता है। छठ महापर्व भारतीय संस्कृति का वह पर्व है जहां उगते के साथ-साथ डूबते सूर्य की भी पूजा की जाती है, जो यह संदेश देती है कि प्रकृति के हर रूप का सम्मान करना चाहिए। इस भजन के श्रवण मात्र से मन में सात्विकता, पवित्रता और एकाग्रता का संचार होता है। भगवान सूर्य देव की स्तुति के बिना छठ पर्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ महापर्व के दौरान नदी घाट पर, सूर्योदय के समय, तथा घरों में पूजा-अर्चना के वक्त गाया जाता है। इसके अतिरिक्त, प्रातःकाल ब्रह्म बेला में जब सूर्य नमस्कार या सूर्य अर्घ्य दिया जाता है, तब भी इस गीत को श्रद्धापूर्वक सुना और गुनगुनाया जा सकता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस गीत के मुख्य आराध्य प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य नारायण और प्रकृति की देवी छठी मैया (माता षष्ठी) हैं। छठी मैया को भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली तथा आयु-स्वास्थ्य प्रदान करने वाली देवी माना गया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह गीत किसी एक आधुनिक रचनाकार की रचना नहीं है, बल्कि यह सदियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोक-मानस में यह गीत पीढ़ियों से रचा-बस गया है, जिसे लोकगीत की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन ठेठ भोजपुरी, मैथिली और अंगिका की लोक-बोली में रचित है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल, मधुर, हृदयग्राही और संगीतमय है। लोक शब्दों जैसे 'भोर भिनसरवा', 'अरघिया', 'बहंगिया', 'नीर' का प्रयोग इसके सौंदर्य को और अधिक द्विगुणित कर देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन सिखाता है कि बिना कठोर अनुशासन, संयम, शुचिता और अटूट श्रद्धा के जीवन के किसी भी बड़े लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। छठ व्रत का कठिन 36 घंटे का निर्जला उपवास और यह गीत हमें धैर्य, नियमबद्धता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल अर्थ संदर्भ / प्रसंग
भोर भिनसरवा सुबह का तड़का / प्रभात सूर्य उदय होने का समय
अरघिया के बेर अर्घ्य देने का समय सूर्य को जल अर्पित करने का क्षण
बहंगिया बांस की बनी टोकरी जिसे कंधे पर रखते हैं पूजा की सामग्री ले जाने का साधन
अमिय बरसेले अमृत की वर्षा होना दिव्य कृपा और शीतलता का अनुभव

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा, अरघिया के बेर हो..."
इस पंक्ति में व्रती सूर्य देव से प्रार्थना करती हैं कि हे प्रभु! अब प्रातःकाल हो चुका है और आपको अर्घ्य देने का अति पवित्र समय आ गया है, कृपया अपनी किरणों के साथ दर्शन दें।

"काँचहि बाँस के बहंगिया, बहंगिया लचकत जाइ..."
यहाँ कच्चे बांस से बनी बहंगी का वर्णन है, जिसमें पवित्र प्रसाद और फल रखे गए हैं, और जिसे व्रती महिलाएं श्रद्धापूर्वक उठाकर घाट की ओर ले जा रही हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

ॐ सूर्याय नमः

हिर्भासं सहस्रंशू तेजो राष्ट्रं च वर्धय। अर्घ्यं गृहाण जगद्दीप प्रभातं कुरु मे सुखे॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम उगा हे सूरज देव भोर भिनसरवा (Uga He Suraj Dev)
आराध्य देव भगवान सूर्य देव एवं छठी मैया
रचनाकार / परंपरा पारंपरिक लोकगीत (लोक संस्कृति)
भाषा भोजपुरी / मैथिली
मुख्य थीम छठ महापर्व, सूर्य उपासना, प्रकृति वंदना
अवसर छठ पूजा (कार्तिक शुक्ल षष्ठी)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह गीत मुख्य रूप से छठ महापर्व के दौरान, विशेषकर सुबह के अर्घ्य के समय नदी या तालाब के घाटों पर और घरों में व्रती महिलाओं द्वारा गाया जाता है।

इस गीत के मुख्य आराध्य प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य नारायण और प्रकृति की देवी छठी मैया (माता षष्ठी) हैं।

भोर भिनसरवा का अर्थ सुबह का तड़का, भोर का समय या जब रात समाप्त होकर सूर्योदय होने वाला होता है, वह बेला है।

सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है जो समस्त जीवन को ऊर्जा, स्वास्थ्य, प्रकाश और आयु प्रदान करते हैं। छठ पूजा में आरोग्यता और कल्याण के लिए इन्हें अर्घ्य दिया जाता है।

हाँ, यह अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक लोकगीत ठेठ भोजपुरी और मैथिली लोक-बोली में रचित है जो मन को मोह लेता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री परंपराओं, लोक संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर तैयार की गई है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत पाठकों की प्रामाणिक जानकारी और भक्ति भाव को ध्यान में रखते हुए इस गीत के बोल और अर्थ को प्रस्तुत किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ

लोक संस्कृति, भारतीय व्रत परंपराएं, लोकगीत संकलन तथा पारंपरिक सूर्योपासना पद्धतियां।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 26 Oct 2026

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