१. श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग: तीर्थ परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व
भारतवर्ष के पश्चिमी भाग में महाराष्ट्र राज्य के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) जिले के वेरुळ गांव में यूनेस्को विश्व धरोहर एलोरा की गुफाओं (Ellora Caves) के समीप स्थित श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर (Shri Grishneshwar Jyotirlinga Temple, Ellora) सनातन धर्म के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में द्वादश (अंतिम) और शिव-कृपा का परम विश्राम स्थल है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में महर्षि वेदव्यास जी इसका अंतिम मंगलाचरण करते हुए उद्घोष करते हैं: 'घुश्मेशं च शिवालये'—अर्थात पावन शिवालय क्षेत्र में साक्षात् भगवान घुश्मेश्वर (घृष्णेश्वर) विराजमान हैं।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के परम वात्सल्य, असीम करुणा और भक्त-वत्सल स्वरूप का साक्षात् प्रतीक है। 'घृष्ण' शब्द का अर्थ है—'घर्षण से उत्पन्न करुणा और स्नेह'। यहाँ भगवान शिव ने अपनी एक अनन्य महिला भक्त 'घुश्मा' (कुसुमा) की निश्छल भक्ति और धैर्य से प्रसन्न होकर उसके मृत पुत्र को पुनः जीवित कर दिया था और सदा-सदा के लिए उसके नाम पर 'घुश्मेश्वर' या 'घृष्णेश्वर' के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे।
द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा की पूर्णाहुति श्री घृष्णेश्वर दर्शन से ही मानी जाती है। जो साधक सोमनाथ से प्रारंभ कर घृष्णेश्वर तक के सभी बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करता है, उसका यह सांसारिक जन्म-मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है। लाल बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित यह मंदिर स्थापत्य कला और शांति का एक दिव्य केंद्र है।
२. पौराणिक कथा एवं स्थल पुराण (Sthala Purana)
शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय ३२ व ३३) में घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य का अत्यंत कारुणिक और हृदयस्पर्शी इतिहास मिलता है:
॥ शिवभक्त घुश्मा का अटूट विश्वास, मृत पुत्र का पुनर्जीवन एवं ज्योतिर्लिंग प्राकट्य ॥
प्राचीन काल में देवगिरि (दौलताबाद) के समीप 'सुधर्मा' नामक एक तपस्वी ब्राह्मण अपनी पत्नी 'सुदेहा' के साथ रहते थे। वे अत्यंत धनी और सदाचारी थे, परंतु उनके कोई संतान नहीं थी। संतान न होने से दुखी होकर सुदेहा ने अपने पति का दूसरा विवाह अपनी छोटी सगी बहन 'घुश्मा' (कुसुमा) से करा दिया। घुश्मा देवाधिदेव भगवान शिव की परम अनन्य भक्त थी। वह प्रतिदिन मिट्टी के १०१ पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधि-विधान से उनका पूजन करती थी और फिर पास के पावन सरोवर (शिवालय सरोवर) में उनका विसर्जन कर देती थी।
भगवान शिव की कृपा से घुश्मा ने एक अत्यंत रूपवान और गुणवान पुत्र को जन्म दिया। बालक धीरे-धीरे बड़ा हुआ और उसका विवाह भी हो गया। यह देखकर बड़ी बहन सुदेहा के मन में ईर्ष्या की भयानक ज्वाला धधक उठी। उसने सोचा कि 'इस घर में सब कुछ घुश्मा का हो गया और मेरा कोई मान नहीं रहा।' ईर्ष्या के वशीभूत होकर सुदेहा ने एक रात सोते समय घुश्मा के उस इकलौते युवा पुत्र की छुरा घोंपकर निर्मम हत्या कर दी और उसके शव को उसी सरोवर में फेंक दिया जहाँ घुश्मा प्रतिदिन शिवलिंग विसर्जित करती थी।
प्रातःकाल जब पुत्रवधू ने रक्त से भीगा बिस्तर देखा, तो घर में हाहाकार मच गया। सुधर्मा और पुत्रवधू छाती पीट-पीटकर रोने लगे। परंतु घुश्मा तनिक भी विचलित नहीं हुई। उसने अपने नित्य शिव-पूजन का क्रम नहीं तोड़ा। उसने शांत भाव से १०१ पार्थिव शिवलिंग बनाए, उनकी पूजा की और प्रतिदिन की भांति उन्हें विसर्जित करने सरोवर तट पर गई। जैसे ही उसने अंतिम शिवलिंग का विसर्जन कर पीछे मुड़कर देखा, उसी क्षण उसका मृत पुत्र सरोवर से मुस्कुराता हुआ बाहर निकल आया! उसी समय साक्षात् देवाधिदेव महादेव त्रिशूलधारी रूप में प्रकट हो गए और सुदेहा के वध हेतु त्रिशूल उठाया। परंतु दयामयी घुश्मा ने शिव के चरण पकड़ लिए और अपनी दुष्ट बहन को क्षमा करने की प्रार्थना की। घुश्मा ने भगवान से प्रार्थना की: "हे देवाधिदेव! आप सदा के लिए इस सरोवर तट पर अपने भक्त-वत्सल रूप में विराजमान रहें ताकि जो भी प्राणी यहाँ आपके दर्शन करे, उसके समस्त पाप, संताप और कुल-कलंक नष्ट हो जाएं।" देवाधिदेव ने प्रसन्न होकर तथास्तु कहा और वे वहीं 'घुश्मेश्वर' (घृष्णेश्वर) ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गए।
३. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मंदिर निर्माण कालक्रम
घृष्णेश्वर मंदिर का ऐतिहासिक सफर मराठा साम्राज्य के गौरव से जुड़ा हुआ है:
| कालखंड / वर्ष | शासक / ऐतिहासिक व्यक्तित्व | धार्मिक व स्थापत्य योगदान |
|---|---|---|
| १३वीं-१४वीं शताब्दी | यादव राजवंश के पतन के बाद सल्तनत आक्रमण | अलाउद्दीन खिलजी और दिल्ली सल्तनत के हमलों में मंदिर को भारी क्षति पहुंची। |
| १६वीं शताब्दी (१५९९) | मालोजी राजे भोसले (छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा) | वेरुळ के पाटिल मालोजी भोसले ने एक विशाल खजाना मिलने पर मंदिर और शिवालय कुंड का जीर्णोद्धार कराया। |
| १८वीं शताब्दी (१७६९) | पुण्यश्लोका लोकमाता महारानी अहिल्याबाई होल्कर | लाल पाषाण से वर्तमान पांच मंजिला भव्य मंदिर का संपूर्ण पुनर्निर्माण कराया। |
| १९८३ | यूनेस्को (UNESCO) | समीपवर्ती एलोरा गुफाओं को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। |
महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ, काशी विश्वनाथ और ओंकारेश्वर की भांति घृष्णेश्वर मंदिर का भी पुनर्निर्माण लाल रंग के ज्वालामुखीय बेसाल्ट पत्थरों से कराया, जो आज भी अपने स्थापत्य सौंदर्य से सबको आकर्षित करता है।
४. मंदिर की वास्तुकला एवं पांच मंजिला लाल पाषाण शिखर
श्री घृष्णेश्वर मंदिर मराठा एवं दक्षिण-भारतीय नागर स्थापत्य शैली का अद्वितीय संगम है:
- १. लाल बेसाल्ट पाषाण (Red Basalt Stone): संपूर्ण मंदिर लाल रंग के ज्वालामुखीय पत्थरों से निर्मित है। मंदिर का गर्भगृह ४४.४ फीट x २७.२ फीट क्षेत्र में फैला हुआ है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर भगवान विष्णु के दशावतार, शिव लीलाओं, हाथियों और पौराणिक दृश्यों की अत्यंत बारीक नक्काशी की गई है।
- २. पांच मंजिला शिखर (Five-Tiered Shikhara): मंदिर का मुख्य शिखर पांच मंजिलों में ऊपर उठता है और इसके शीर्ष पर स्वर्ण-कलश और पीतल की भव्य धर्मध्वजा स्थापित है। शिखर पर महीन मूर्तिकला और छोटे-छोटे मंडप उकेरे गए हैं।
- ३. पूर्वमुखी गर्भगृह एवं स्वयंभू ज्योतिर्लिंग: गर्भगृह में जाने हेतु कुछ सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। गर्भगृह के मध्य में एक चौड़ी वेदी में स्वयंभू घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। लिंग का मुख पूर्व दिशा की ओर है।
- ४. सभा मंडप एवं नंदी: सभा मंडप में नक्काशीदार पाषाण स्तंभ हैं। मंडप के मध्य में काले पाषाण से निर्मित विशाल नंदी महाराज भगवान शिव के सम्मुख विराजमान हैं।
- ५. शिवालय सरोवर (Shivalaya Theertham): मंदिर से थोड़ी दूर स्थित वह ऐतिहासिक पावन सरोवर जहाँ घुश्मा पार्थिव शिवलिंगों का विसर्जन करती थी और जहाँ उसका मृत पुत्र पुनः जीवित हुआ था। इसका पुनर्निर्माण मालोजी भोसले और अहिल्याबाई द्वारा कराया गया था।
५. दर्शन समय, दैनिक आरती एवं गर्भगृह प्रवेश नियम
श्री घृष्णेश्वर मंदिर में वर्ष भर प्रातः ०५:३० बजे से रात्रि ०९:३० बजे तक दर्शन संपन्न होते हैं:
प्रातः मंगलारती एवं महापूजा
०५:३० AM - ०६:०० AM
मंदिर द्वार उद्घाटन, पंचामृत अभिषेक एवं मंगलारती।
मध्याह्न भोग आरती
०१:०० PM - ०१:३० PM
राजभोग अर्पण, शंखनाद एवं मध्याह्न महाआरती।
संध्या महाआरती एवं शयन आरती
०७:३० PM - ०९:३० PM
दिव्य दीपदान आरती एवं रात्रि शयन सेवा।
पुरुषों हेतु विशेष गर्भगृह नियम (Dress Code for Men): घृष्णेश्वर मंदिर की एक अत्यंत प्राचीन और कठोर मर्यादा है कि गर्भगृह में प्रवेश कर ज्योतिर्लिंग का स्पर्श और अभिषेक करने हेतु पुरुषों को अपनी कमर से ऊपर के समस्त वस्त्र (कमीज, बनियान, टी-शर्ट) उतारने पड़ते हैं और केवल धोती पहनकर नंगे बदन ही प्रवेश की अनुमति होती है। चमड़े की वस्तुएं (बेल्ट, पर्स) पूर्णतः वर्जित हैं। महिलाओं हेतु साड़ी या शालीन पारंपरिक वस्त्र अनिवार्य हैं।
६. प्रमुख उत्सव, महाशिवरात्रि एवं यात्रा मुहूर्त (Festivals)
घृष्णेश्वर तीर्थ में प्रमुख पर्व बड़े हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं:
१. महाशिवरात्रि महापर्व
फाल्गुन मास में महाशिवरात्रि पर पाँच दिवसीय विशाल मेला लगता है। मंदिर अहोरात्र खुला रहता है। लाखों श्रद्धालु शिवालय सरोवर में स्नान कर भगवान घृष्णेश्वर का दर्शन करते हैं।
२. श्रावण मास के सोमवार
श्रावण मास में प्रतिदिन विशेष सहस्त्रधारा अभिषेक और संध्या समय भगवान का नयनाभिराम फूलों का श्रृंगार किया जाता है।
३. त्रिपुरारी पूर्णिमा
कार्तिक पूर्णिमा पर मंदिर प्रांगण और शिवालय सरोवर पर दीपदान उत्सव मनाया जाता है।
४. यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम
महाराष्ट्र के इस क्षेत्र में अक्टूबर से मार्च का समय मौसम की दृष्टि से सर्वाधिक अनुकूल रहता है। मानसून (जुलाई-सितंबर) में एलोरा की पहाड़ियां हरी-भरी हो जाती हैं और झरने बहने लगते हैं।
५. द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा की पावन पूर्णाहुति
सनातन परंपरा में सोमनाथ से प्रारंभ होकर काशी, केदारनाथ, रामेश्वरम आदि ग्यारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के उपरांत घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग में द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ करने और शिवालय सरोवर में आचमन करने से ही संपूर्ण यात्रा निर्विघ्न संपन्न और मोक्षफलदायी मानी जाती है।
७. यात्रा मार्गदर्शिका: कैसे पहुँचें? (How to Reach Grishneshwar)
घृष्णेश्वर मंदिर छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) शहर से मात्र ३० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है:
- हवाई मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा छत्रपति संभाजीनगर हवाई अड्डा (IXU - लगभग ३५ किमी) है। यहाँ से दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु हेतु नियमित उड़ानें उपलब्ध हैं। हवाई अड्डे से टैक्सी द्वारा मात्र ४५ मिनट में पहुँचा जा सकता है।
- रेल मार्ग (By Train): निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन छत्रपति संभाजीनगर रेलवे स्टेशन (लगभग ३० किमी) है। इसके अतिरिक्त मुंबई-दिल्ली मुख्य रेल लाइन पर स्थित मनमाड जंक्शन (MMR - लगभग ७५ किमी) है। दोनों स्टेशनों से एलोरा-घृष्णेश्वर हेतु निरंतर बसें और टैक्सियां चलती हैं।
- सड़क मार्ग (By Road): घृष्णेश्वर छत्रपति संभाजीनगर (३० किमी), शिर्डी (१०५ किमी), पुणे (२५५ किमी) और नासिक (१७५ किमी) से उत्तम राष्ट्रीय राजमार्गों द्वारा जुड़ा है। संभाजीनगर के सेंट्रल बस स्टैंड से प्रत्येक १५ मिनट में एलोरा हेतु बसें उपलब्ध हैं।
८. तीर्थयात्रियों के लिए आवास, नियम एवं सावधानियां
घृष्णेश्वर आने वाले श्रद्धालुओं हेतु निम्नलिखित व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं:
- १. एलोरा गुफाओं के साथ संयुक्त यात्रा: अधिकांश श्रद्धालु विश्वप्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं (विशेष रूप से गुफा संख्या १६ - अखंड पाषाण से तराशा गया कैलाश मंदिर) और घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन एक साथ करते हैं, क्योंकि दोनों के बीच की दूरी मात्र १ किलोमीटर है।
- २. आवास व्यवस्था: वेरुळ गांव में महाराष्ट्र पर्यटन (MTDC) का रिसॉर्ट 'होटल कैलास', मंदिर ट्रस्ट की धर्मशालाएं, और छत्रपति संभाजीनगर शहर में सभी श्रेणियों के उत्तम होटल उपलब्ध हैं।
- ३. मोबाइल एवं कैमरा: मुख्य मंदिर के बाहर प्रांगण में फोटोग्राफी की जा सकती है, परंतु गर्भगृह में मोबाइल और कैमरा का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है।
९. घृष्णेश्वर के प्रमुख दर्शनीय एवं ऐतिहासिक स्थल (Nearby Attractions)
घृष्णेश्वर यात्रा के दौरान निम्नलिखित विश्वस्तरीय स्थलों का भ्रमण अवश्य करें:
- एलोरा की गुफाएं एवं कैलाश मंदिर (Ellora Caves): मंदिर से मात्र १ किमी दूर स्थित ३४ प्राचीन गुफाएं (हिंदू, बौद्ध, जैन)। गुफा संख्या १६ का 'कैलाश मंदिर' संपूर्ण विश्व में एकल चट्टान को ऊपर से नीचे तराशकर बनाया गया सबसे विस्मयकारी पाषाण मंदिर है।
- दौलताबाद किला (देवगिरि दुर्ग): घृष्णेश्वर से १५ किमी दूर स्थित भारत का सबसे अभेद्य और अजेय ऐतिहासिक किला।
- शिर्डी साईं बाबा मंदिर: घृष्णेश्वर से लगभग १०५ किमी (२ घंटे की दूरी) पर स्थित विश्व प्रसिद्ध साईं धाम।
- भद्रा मारुति मंदिर (खुल्दाबाद): मंदिर से ५ किमी दूर स्थित दक्षिण भारत का एकमात्र मंदिर जहाँ भगवान हनुमान जी 'शयन मुद्रा' (सोते हुए) में विराजमान हैं।
- बीबी का मकबरा एवं पंचक्की (संभाजीनगर): ताजमहल की प्रतिकृति और ऐतिहासिक जल-चक्की।