१. षष्ठ ज्योतिर्लिंग श्री भीमाशंकर: तीर्थ परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व
भारत के पश्चिमी घाट की विहंगम सह्याद्रि पर्वतमाला के सघन, सदाबहार और बादलों से आच्छादित वनों में महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले (खेड़ तालुका) में स्थित श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर (Shri Bhimashankar Jyotirlinga Temple, Pune) सनातन धर्म के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में षष्ठ और परम कल्याणकारी तीर्थ है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में साक्षात् महर्षि वेदव्यास जी इसका मंगलगान करते हुए कहते हैं: 'डाकिन्यां भीमशंकरम्'—अर्थात डाकिनी क्षेत्र के सघन वनों में भगवान भीमाशंकर साक्षात् विराजमान हैं।
भीमाशंकर तीर्थ की सबसे पावन प्राकृतिक विशेषता यह है कि यह महाराष्ट्र की जीवनदायिनी भीमा नदी (जो आगे चलकर पंढरपुर में 'चंद्रभागा' के नाम से विख्यात होती है) का पावन उद्गम स्थल है। सह्याद्रि की हरी-भरी पर्वत चोटियों, रहस्यमयी घाटियों और झरने के मधुर नाद के बीच स्थित यह मंदिर आध्यात्मिक शांति, प्राकृतिक सौंदर्य और जैव-विविधता का एक अद्भुत संगम है।
यह संपूर्ण क्षेत्र 'भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य' (Bhimashankar Wildlife Sanctuary) के अंतर्गत आता है, जो महाराष्ट्र के राज्य पशु 'शेकरू' (Indian Giant Flying Squirrel - विशाल गिलहरी) का प्राकृतिक वास स्थल है। भगवान भीमाशंकर का ज्योतिर्लिंग अत्यंत शीतल और स्वयंभू पाषाण के रूप में गर्भगृह में स्थापित है, जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य के जीवन के समस्त भय, शत्रु बाधा और संचित पाप समूल नष्ट हो जाते हैं।
२. पौराणिक कथा एवं स्थल पुराण (Sthala Purana)
शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय २० व २१) में भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य का अत्यंत पावन आख्यान मिलता है:
॥ भीमासुर का संहार एवं भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य ॥
प्राचीन काल में रावण के भाई कुंभकर्ण और कर्कटी नामक राक्षसी से 'भीम' (भीमासुर) नामक एक महाबली असुर का जन्म हुआ। जब भीम बड़ा हुआ, तो उसने अपनी माता से अपने पिता के विषय में पूछा। माता ने बताया कि तुम्हारे पिता कुंभकर्ण का वध भगवान श्री राम ने कर दिया था। यह सुनकर भीम अत्यंत क्रुद्ध हुआ और उसने भगवान विष्णु से बदला लेने का संकल्प किया। उसने सूर्य पर्वत पर जाकर एक सहस्र वर्ष तक ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और असीम बल का वरदान प्राप्त कर लिया।
वरदान के मद में चूर होकर भीमासुर ने तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया। उसने कामरूप देश (असम) के परम शिवभक्त राजा सुदक्षिण (कामरूपेश्वर) को पराजित कर कारागार में डाल दिया। राजा सुदक्षिण कारागार में भी मिट्टी का पार्थिव शिवलिंग बनाकर अहर्निश 'ॐ नमः शिवाय' का जप करते रहे। जब भीमासुर ने देखा कि राजा केवल शिव की पूजा में लीन है, तो उसने क्रोध में आकर अपनी तलवार से उस पार्थिव शिवलिंग को काटना चाहा।
जैसे ही भीमासुर की तलवार शिवलिंग से टकराई, उसी क्षण उस शिवलिंग से साक्षात् देवाधिदेव पिनाकपाणि भगवान शिव अत्यंत जाज्वल्यमान त्रिशूलधारी रूप में प्रकट हो गए। भगवान शिव ने अपनी एकमात्र 'हुंकार' से भीमासुर के खड्ग को काट दिया और अपने त्रिशूल से उस दुष्ट असुर को क्षण भर में भस्म कर दिया। महर्षियों और देवताओं की स्तुति पर भगवान शिव ने वचन दिया कि वे इस क्षेत्र में सदा-सदा के लिए 'भीमाशंकर' के नाम से निवास करेंगे। युद्ध के पश्चात भगवान शिव के अंगों से जो पसीने की धारा बही, वही पावन 'भीमा नदी' के रूप में प्रवाहित हुई।
३. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मंदिर निर्माण कालक्रम
भीमाशंकर मंदिर का ऐतिहासिक कालक्रम लगभग एक सहस्राब्दी प्राचीन है। महाराष्ट्र के संतों, पेशवाओं और मराठा शासकों ने इसका भव्य विस्तार किया:
| कालखंड / वर्ष | शासक / ऐतिहासिक व्यक्तित्व | ऐतिहासिक योगदान |
|---|---|---|
| १३वीं शताब्दी ईस्वी | यादव राजवंश के कालखंड | प्रारंभिक हेमाडपंथी पाषाण मंदिर और गर्भगृह का निर्माण। |
| १८वीं शताब्दी (१७३०-१७८०) | मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्री नाना फडणवीस | मंदिर के भव्य सभा मंडप, विशाल शिखर और परकोटे का उत्कृष्ट विस्तार। |
| ईस्वी सन् १७३९ | चिमाजी अप्पा (बाजीराव पेशवा के भ्राता) | वसई की विजय के पश्चात पुर्तगालियों से प्राप्त विशालकाय ऐतिहासिक घंटा (Portuguese Bell) मंदिर को अर्पित किया। |
| १९वीं शताब्दी | इंदौर के होल्कर राजवंश | मंदिर के पास धर्मशालाओं और तीर्थयात्री घाटों का जीर्णोद्धार। |
| १९८५ | महाराष्ट्र शासन | समग्र वन क्षेत्र को भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया। |
पुर्तगाली ऐतिहासिक घंटा (Chimaji Appa's Bell): मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लोहे और कांसे से बना एक बहुत बड़ा भारी घंटा टंगा हुआ है, जिस पर १७२९ का वर्ष और रोमन लिपि में क्रॉस का चिन्ह अंकित है। पेशवा बाजीराव प्रथम के पराक्रमी भाई चिमाजी अप्पा ने १७३९ में वसई के किले में पुर्तगालियों को पराजित करने के पश्चात इस ऐतिहासिक घंटे को विजय-प्रतीक के रूप में भीमाशंकर महादेव को समर्पित किया था।
४. मंदिर की वास्तुकला एवं हेमाडपंथी नागर शैली
भीमाशंकर मंदिर महाराष्ट्र की पारंपरिक 'नागर एवं हेमाडपंथी स्थापत्य शैली' (Nagara-Hemadpanthi Style) का अद्वितीय संगम है:
- १. कृष्ण पाषाण (Black Basalt Stone) नक्काशी: संपूर्ण मंदिर का निर्माण सह्याद्रि के कठोर काले बेसाल्ट पत्थरों से हुआ है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, अप्सराओं, सिंहमुखों, और रामायण-महाभारत के प्रसंगों की अत्यंत बारीक नक्काशी की गई है।
- २. गर्भगृह एवं स्वयंभू ज्योतिर्लिंग: मंदिर का गर्भगृह भूतल से कुछ फीट नीचे स्थित है। गर्भगृह के मध्य में एक चौड़ी चांदी की वेदी के बीच स्वयंभू शिवलिंग स्थित है। शिवलिंग के ऊपर एक सूक्ष्म दरार है। मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान शिव के त्रिशूल से भीमासुर का संहार हुआ था। इस दरार से निरंतर जल रिसता रहता है।
- ३. सभा मंडप एवं काष्ठ कला: नाना फडणवीस द्वारा निर्मित विशाल सभा मंडप में सुंदर नक्काशीदार लकड़ी और पत्थर के खंभे हैं, जिन पर छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठा कालीन स्थापत्य की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
- ४. शनि मंदिर एवं अमृत कुंड: मुख्य मंदिर प्रांगण में एक प्राचीन शनि मंदिर और 'अमृत कुंड' नामक जलकुंड स्थित है, जिसका जल अत्यंत शीतल और औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है।
५. दर्शन समय, दैनिक आरती एवं पूजा-अनुष्ठान क्रम
भीमाशंकर मंदिर में वर्ष भर प्रातः ०४:३० बजे से रात्रि ०९:३० बजे तक दर्शन-पूजन संपन्न होता है:
प्रातः काकड़ आरती एवं महापूजा
०४:३० AM - ०५:३० AM
मंदिर द्वार उद्घाटन, काकड़ आरती, पंचामृत अभिषेक एवं प्रथम दर्शन।
मध्याह्न महाभोग आरती
१२:०० PM - १२:३० PM
राजभोग नैवेद्य अर्पण, शंख-घड़ियाल नाद एवं मध्याह्न आरती।
संध्या महाआरती एवं शयन आरती
०७:३० PM - ०९:३० PM
संध्या दीपदान आरती, एकान्त सेवा एवं रात्रि शयन आरती।
॥ भीमाशंकर की प्राचीन 'देवराई' (पवित्र उपवन) एवं जनजातीय संरक्षण ॥
भीमाशंकर मंदिर के चारों ओर फैले प्राचीन घने वनों को महाराष्ट्र की स्थानीय भाषा में 'देवराई' (Sacred Grove) कहा जाता है। स्थानीय महादेव कोली जनजाति और ग्रामीणों की यह अटूट परंपरा रही है कि भगवान शिव को समर्पित इन जंगलों से एक पत्ता या लकड़ी का टुकड़ा काटना भी महापाप माना जाता है। इसी आध्यात्मिक संरक्षण के कारण यहाँ सहस्रों वर्षों से अनेक दुर्लभ और विलुप्तप्राय औषधीय वनस्पतियां, विशाल वटवृक्ष और जड़ी-बूटियां सुरक्षित हैं।
यह पवित्र उपवन रात्रि के समय 'बायोल्यूमिनसेंट कवक' (Bioluminescent Fungi) के कारण अंधेरे में हरी रोशनी से चमक उठता है, जिसे स्थानीय लोग 'शिवजी की दिव्य माया' और प्रकाश मानते हैं। पर्यावरणविदों के लिए यह क्षेत्र विश्व की सबसे समृद्ध जैव-विविधता का जीवंत उदाहरण है।
स्पर्श दर्शन एवं अभिषेक नियम: सामान्य दिनों में दोपहर २:३० बजे तक श्रद्धालु गर्भगृह में जाकर ज्योतिर्लिंग पर जल और पुष्प अर्पित कर सकते हैं। महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार पर अत्यधिक भीड़ होने के कारण केवल बाहर से 'मुख दर्शन' (Mukh Darshan) की अनुमति दी जाती है।
६. प्रमुख उत्सव, सावन सोमवार एवं यात्रा मुहूर्त (Festivals & Best Time)
सह्याद्रि की पहाड़ियों में स्थित भीमाशंकर तीर्थ में प्रमुख पर्व बड़े हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं:
१. महाशिवरात्रि महापर्व (फाल्गुन मास)
महाशिवरात्रि पर पाँच दिनों का विशाल मेला लगता है। मंदिर अहोरात्र खुला रहता है। महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक से लाखों श्रद्धालु पैदल और वाहनों से दर्शन हेतु आते हैं।
२. पवित्र श्रावण मास एवं सावन सोमवार
श्रावण मास में मंदिर घने बादलों और कोहरे में डूब जाता है। प्रत्येक सोमवार को भगवान भीमाशंकर की पालकी यात्रा निकलती है और विशेष रुद्राभिषेक संपन्न कराए जाते हैं।
३. कार्तिक पूर्णिमा एवं त्रिपुरारी पूर्णिमा
कार्तिक पूर्णिमा पर त्रिपुरारी उत्सव मनाया जाता है। मंदिर प्रांगण में सहस्र दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, जिससे संपूर्ण मंदिर दिव्य ज्योति से जगमगा उठता है।
४. यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम (Best Season)
प्राकृतिक सौंदर्य और झरने देखने हेतु अगस्त से नवंबर (मानसून और शरद ऋतु) का समय सर्वोत्तम है। मौसम सुहावना रहने के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सर्वाधिक आरामदायक माना जाता है।
७. यात्रा मार्गदर्शिका: कैसे पहुँचें? (How to Reach Bhimashankar)
भीमाशंकर पुणे और मुंबई दोनों प्रमुख महानगरों से सड़क मार्ग द्वारा भलीभांति जुड़ा है:
- हवाई मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा पुणे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (PNQ - लगभग १०५ किमी) है। इसके अतिरिक्त छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, मुंबई (BOM - लगभग २२० किमी) है। पुणे से टैक्सी अथवा सीधी बस द्वारा मात्र ३.५ घंटे में पहुंचा जा सकता है।
- रेल मार्ग (By Train): निकटतम प्रमुख रेलवे जंक्शन पुणे जंक्शन (PUNE - लगभग ११० किमी) है। मुंबई की ओर से आने वाले यात्रियों हेतु कर्जत रेलवे स्टेशन (लगभग १६० किमी सड़क मार्ग से) उपयुक्त है। पुणे रेलवे स्टेशन से भीमाशंकर के लिए दिन भर राज्य परिवहन बसें चलती हैं।
- सड़क मार्ग (By Road): पुणे के शिवाजीनगर बस स्टैंड से भीमाशंकर हेतु महाराष्ट्र राज्य परिवहन निगम (MSRTC) की 'एसटी बसें' प्रत्येक घंटे उपलब्ध हैं। मुंबई से ठाणे, कल्याण, मंचर होते हुए सड़क मार्ग (NH-60) अत्यंत सुगम और सुरम्य है।
८. तीर्थयात्रियों के लिए आवास, नियम एवं सावधानियां
भीमाशंकर वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:
- १. सीढ़ियों का मार्ग: मुख्य बस स्टैंड और पार्किंग स्थल से मंदिर तक पहुँचने हेतु लगभग २५० से ३०० पक्की सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। वृद्धों और दिव्यांगों हेतु पालकी (डोली) की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है।
- २. आवास व्यवस्था: भीमाशंकर में महाराष्ट्र पर्यटन (MTDC) का रिसॉर्ट, मंदिर देवस्थान संस्थान के गेस्ट हाउस, और मंचर व राजगुरुनगर में कई निजी होटल उपलब्ध हैं। सावन और शिवरात्रि पर आवास की पूर्व बुकिंग आवश्यक है।
- ३. वन्यजीव अभयारण्य नियम: यह क्षेत्र आरक्षित वन है, अतः प्लास्टिक फेंकना, जंगलों में आग जलाना, तेज संगीत बजाना और शराब का सेवन पूर्णतः प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है। मार्ग में बंदरों से अपने चश्मे, मोबाइल और प्रसाद की रक्षा करें।
९. भीमाशंकर के प्रमुख दर्शनीय एवं प्राकृतिक स्थल (Nearby Attractions)
भीमाशंकर तीर्थ यात्रा में निम्नलिखित पावन एवं मनोहारी स्थलों का भ्रमण अवश्य करें:
- गुप्त भीमाशंकर (Gupt Bhimashankar): मुख्य मंदिर से २ किमी दूर घने जंगल में स्थित प्राकृतिक स्थल, जहाँ भीमा नदी की मूल गुप्त जलधारा एक शिवलिंग के ऊपर गिरती है।
- भीमा नदी उद्गम कुंड: मंदिर के समीप स्थित वह पावन कुंड जहाँ से भीमा नदी का प्राकट्य माना जाता है।
- हनुमान झील (Hanuman Lake): एक सुंदर प्राकृतिक शांत झील जहाँ अनेक प्रवासी पक्षी और हिरण जल पीने आते हैं।
- नागफणी पॉइंट (Nagphani Viewpoint): सह्याद्रि का सर्वोच्च पर्वत शिखर जो नाग के फन के समान दिखाई देता है। यहाँ से पश्चिमी घाट और कोंकण घाटी का ३६० डिग्री विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
- बॉम्बे पॉइंट (Bombay Point): सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य देखने हेतु प्रसिद्ध स्थल।
- साक्षी गणपति: मंदिर से थोड़ी दूर स्थित गणपति मंदिर जहाँ भीमाशंकर दर्शन की साक्षी भरी जाती है।