उत्तर प्रदेश के पावन ब्रजमंडल में स्थित वृंदावन केवल एक शहर नहीं, बल्कि अनंत भक्ति, प्रेम और आनंद की वह आध्यात्मिक राजधानी है जहाँ कण-कण में राधा-कृष्ण के प्रेम की महक बसती है। इस अलौकिक धाम में अनगिनत मंदिर हैं, परंतु इन सबकी केंद्रबिंदु और भक्तों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है - श्री बांके बिहारी मंदिर। 'बांके' का अर्थ है जो तीन जगहों से टेढ़ा (त्रिभंग मुद्रा में) हो और 'बिहारी' का अर्थ है आनंदविह्वल करने वाला। यहाँ भगवान श्री कृष्ण अपने बाल रूप में त्रिभंग मुद्रा में विराजमान हैं, जिनके एक झलक पाने के लिए देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम श्री बांके बिहारी मंदिर के इतिहास, अद्भुत वास्तुकला, रहस्यमयी परंपराओं, दर्शन के नियमों और संपूर्ण यात्रा वृत्तांत पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
मंदिर का परिचय एवं पौराणिक इतिहास
श्री बांके बिहारी मंदिर का इतिहास महान संगीतज्ञ और संत स्वामी हरिदास जी से जुड़ा हुआ है। स्वामी हरिदास जी महाप्रभु श्री चैतन्य महाप्रभु के समकालीन और अकबर के दरबार के महान संगीतकार तानसेन के गुरु थे। स्वामी हरिदास जी निधिवन की कुंज गलियों में बैठकर तल्लीनता से अपनी संगीतमय वाणी में भगवान की स्तुति करते थे। उनकी अनन्य भक्ति और संगीत से प्रसन्न होकर बांके बिहारी जी (जो कि स्वयं युगल सरकार का स्वरूप हैं) प्रकट हुए थे।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, स्वामी हरिदास जी के आराध्य 'कुंज बिहारी' ने उनकी भक्ति से अभिभूत होकर उनके सामने अपनी त्रिभंग मुद्रा वाली छवि प्रकट की। स्वामी जी की इच्छा थी कि यह विग्रह हमेशा उनके पास रहे, इसलिए उनके अनुरोध पर यह दिव्य विग्रह प्रकट हुआ। प्रारंभ में इस विग्रह की पूजा निधिवन में गुप्त रूप से की जाती थी। बाद में संवत् 1921 (सन् 1864 ईस्वी) के आसपास स्वामी हरिदास जी के वंशजों और गोस्वामियों द्वारा इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया और विग्रह को वर्तमान मंदिर में स्थापित किया गया।
बांके बिहारी जी के प्रकट होने की कथा अत्यंत रोचक है। कहा जाता है कि एक बार स्वामी हरिदास जी के एक शिष्य ने उनकी कुटिया में अत्यंत तेज़ दिव्य प्रकाश देखा। जब स्वामी जी ने अपनी आँखें खोलीं, तो उन्होंने देखा कि उनके सामने साक्षात बांके बिहारी जी खड़े हैं। उस समय अत्यधिक तेज प्रकाश के कारण भक्तों की आँखें चौंधिया गईं, जिसके निवारण के लिए मंदिर में 'झुकी हुई पर्दा प्रथा' या बार-बार पर्दा डालने-हटाने की अनूठी परंपरा शुरू की गई, जो आज भी कायम है।
मंदिर की स्थापत्य कला एवं गर्भगृह संरचना
श्री बांके बिहारी मंदिर की वास्तुकला राजस्थानी और पारंपरिक नागर शैली का एक उत्कृष्ट मिश्रण है। मंदिर के निर्माण में उत्कृष्ट नक्काशीदार पत्थरों और संगमरमर का प्रयोग किया गया है। मंदिर का प्रांगण विशाल और हवादार है, जहाँ एक साथ हजारों भक्त खड़े होकर भगवान के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर के चारों ओर सुंदर जालियां, खंभे और मेहराब बने हुए हैं जो प्राचीन भारतीय शिल्प कला की जीवंत मिसाल हैं।
मंदिर का गर्भगृह अन्य मंदिरों की तरह सामान्य नहीं है। यहाँ भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति किसी सिंहासन पर नहीं, बल्कि अत्यंत भव्य तरीके से फूलों और कपड़ों से सजी होती है। गर्भगृह के मुख्य द्वार पर हर कुछ सेकंड्स में पर्दा डाला और हटाया जाता है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि यदि कोई भक्त बांके बिहारी जी की आँखों में लगातार देखता रह जाए, तो भगवान उस भक्त के प्रेम में इतने सुधि-बुधि खो बैठते हैं कि वे मंदिर छोड़कर उस भक्त के साथ ही चल देते हैं। इसलिए, यहाँ 'नजर' और 'पर्दे' का विशेष विधान है।
मंदिर के आंतरिक भाग में चांदी के दरवाजों और स्वर्ण जड़ित कलाकृतियों का सुंदर काम किया गया है। गर्भगृह के पास ही भक्तों के बैठने और कीर्तन करने के लिए स्थान निर्धारित है, जहाँ हमेशा 'श्री हरिवंश' और 'राधे-राधे' की गूंज सुनाई देती है।
दर्शन, आरती एवं पूजा का समय
बांके बिहारी मंदिर में दर्शन के नियम अन्य मंदिरों से काफी भिन्न हैं। यहाँ भगवान को एक छोटे बच्चे की तरह माना जाता है, इसलिए उनके सोने, जागने और खाने-पीने के समय का विशेष ध्यान रखा जाता है। मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने का समय सर्दियों और गर्मियों में बदलता रहता है:
- गर्मियों का समय: सुबह 07:45 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 05:30 बजे से रात्रि 09:30 बजे तक।
- सर्दियों का समय: सुबह 08:45 बजे से दोपहर 01:00 बजे तक और शाम 04:30 बजे से रात्रि 08:30 बजे तक।
आरती की विशेषता: बांके बिहारी मंदिर में दिनभर में केवल एक बार विशेष 'श्रृंगार आरती' सुबह होती है और रात्रि में 'शयन आरती' होती है। इसके अलावा, वर्ष में केवल एक बार यानी 'श्री कृष्ण जन्माष्टमी' की मध्य रात्रि को ही 'मंगला आरती' (रात 2:00 बजे) होती है, जिसके दर्शन का सौभाग्य करोड़ों में से किसी एक भाग्यशाली को ही मिलता है।
प्रमुख त्यौहार एवं उत्सव
वृंदावन में हर दिन एक उत्सव है, लेकिन बांके बिहारी मंदिर के उत्सवों की छटा ही निराली है। यहाँ मनाए जाने वाले प्रमुख पर्व निम्नलिखित हैं:
- श्री कृष्ण जन्माष्टमी: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यहाँ का उल्लास देखने लायक होता है। मध्य रात्रि को भगवान के प्रकट होने पर पंचामृत अभिषेक और मंगला आरती होती है।
- रंगोत्सव (होली): बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली के बाद वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में रंगों का महासागर उमड़ पड़ता है। फाल्गुन मास में यहाँ टेसू के फूलों के रंग और गुलाल से होली खेली जाती है।
- झूलन उत्सव (सावन मास): सावन के महीने में भगवान बांके बिहारी स्वर्ण-रजत जड़ित भव्य झूले पर विराजमान होते हैं। लाखों भक्त उनके इस रूप के दर्शन के लिए आते हैं।
- अन्नकूट (गोवर्धन पूजा): दिवाली के अगले दिन छप्पन भोग का भव्य आयोजन किया जाता है और भगवान को अन्नकूट का प्रसाद अर्पित किया जाता है।
मंदिर तक कैसे पहुंचे
श्री बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित है और देश के प्रमुख शहरों से सड़क, रेल और वायु मार्ग द्वारा भली-भांति जुड़ा हुआ है:
- वायु मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा आगरा का खेरिया एयरपोर्ट (लगभग 65 किमी) और नई दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 150 किमी) है। हवाई अड्डे से टैक्सी या बस द्वारा आसानी से वृंदावन पहुंचा जा सकता है।
- रेल मार्ग (By Train): निकटतम मुख्य रेलवे स्टेशन 'मथुरा जंक्शन' (Mathura Junction) है, जो देश के सभी प्रमुख महानगरों (दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई) से जुड़ा है। मथुरा स्टेशन से ऑटो, ई-रिक्शा या कैब के जरिए बांके बिहारी मंदिर (लगभग 12 किमी) पहुंचा जा सकता है। वृंदावन रोड रेलवे स्टेशन भी पास है, लेकिन वहाँ एक्सप्रेस ट्रेनें कम रुकती हैं।
- सड़क मार्ग (By Road): राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 (NH-19) के माध्यम से दिल्ली-आगरा हाईवे से वृंदावन पहुँचा जा सकता है। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) और निजी बसें नियमित रूप से दिल्ली, मथुरा, आगरा और नोएडा से वृंदावन के लिए चलती हैं।
यात्रियों के लिए उपयोगी सुझाव
बांके बिहारी मंदिर की यात्रा को सुखद और सुगम बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:
- यात्रा का सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च (सर्दियों का मौसम) वृंदावन की यात्रा के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। इस दौरान मौसम सुहावना होता है।
- ड्रेस कोड: मंदिर में प्रवेश के लिए कोई सख्त ड्रेस कोड नहीं है, फिर भी शालीन और पारंपरिक भारतीय वस्त्र (धोती-कुर्ता, साड़ी, कुर्ता-पायजामा) पहनना उचित माना जाता है।
- आवास व्यवस्था: वृंदावन में बजट होटलों से लेकर लग्जरी रिसॉर्ट्स, आश्रम और धर्मशालाओं की प्रचुर उपलब्धता है। इस्कॉन मंदिर के पास और पागल बाबा मंदिर के आसपास ठहरने के बेहतरीन विकल्प मिलते हैं।
- सावधानियां: मंदिर के अंदर भारी भीड़ होती है, इसलिए अपने कीमती सामान, मोबाइल और पर्स का विशेष ध्यान रखें। बच्चों और बुजुर्गों का हाथ मजबूती से पकड़कर रखें। चप्पल-जूते मंदिर से दूर ही उतारकर आएं क्योंकि मंदिर के रास्तों पर नंगे पैर चलना पड़ता है।
आस-पास के अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल
बांके बिहारी मंदिर के दर्शन के साथ-साथ आप वृंदावन और मथुरा के इन पवित्र स्थलों के दर्शन भी अवश्य करें:
- निधिवन (Nidhivan): बांके बिहारी मंदिर के समीप स्थित यह वह रहस्यमयी वन है जहाँ आज भी प्रतिदिन रात्रि को भगवान श्री कृष्ण गोपियों के साथ रास रचाते हैं। यहाँ के पेड़ नीचे की ओर मुड़े हुए हैं और तुलसी के जोड़े जोड़े पौधे हैं।
- इस्कॉन मंदिर (ISKCON Temple): श्री कृष्ण बलराम मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर अपनी भव्यता, स्वच्छता और विदेशी भक्तों की हरिकीर्तन मंडली के लिए विश्वविख्यात है।
- प्रेम मंदिर (Prem Mandir): जगतगुरु कृपालु महाराज द्वारा निर्मित यह मंदिर सफेद संगमरमर की अद्भुत कारीगरी और रात्रि में रंग-बिरंगी रोशनी के लिए जाना जाता है।
- श्री राधा वल्लभ मंदिर: हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित यह प्राचीन और अत्यंत पवित्र मंदिर है।
- गोविन्द देव मंदिर: राजा मानसिंह द्वारा निर्मित यह ऐतिहासिक मंदिर अपनी स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है।