पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री शिकारी देवी मंदिर, मंडी (हिमाचल प्रदेश)

0 दर्शनार्थी
मंडी, हिमाचल प्रदेश
प्रकाशित: 04 Nov 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
माँ शिकारी देवी
दर्शन समय सारिणी
सुबह 06:00 बजे से शाम 06:00 बजे तक (मौसम के अनुसार)
नित्य आरती समय
प्रातः आरती: 07:00 AM | संध्या आरती: 06:00 PM
स्थान / नगर
मंडी, हिमाचल प्रदेश
आराध्य देव
माँ शिकारी देवी
दर्शन समय
सुबह 06:00 बजे से शाम 06:00 बजे तक (मौसम के अनुसार)
आरती समय
प्रातः आरती: 07:00 AM | संध्या आरती: 06:00 PM
स्थान / धाम
शिकारी देवी मंदिर, शिकारी देवी मार्ग, जंजैहली, मंडी, हिमाचल प्रदेश - 175047
अक्षर आकार:
पठन थीम:

श्री शिकारी देवी मंदिर: एक दिव्य रहस्य

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थित शिकारी देवी मंदिर समुद्र तल से 3359 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान न केवल अपनी धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है, बल्कि यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और रहस्यों के कारण भी भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान की थी। कहा जाता है कि पांडवों ने यहाँ देवी की कठोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप माँ दुर्गा ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें विजयी होने का आशीर्वाद दिया। इस मंदिर को 'शिकारी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि पांडव यहाँ शिकार के लिए आते थे और देवी से प्रार्थना करते थे।

मंदिर का अद्भुत रहस्य

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंदिर 'बिना छत' का है। सदियों से लोग इसे छत से ढकने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन हर बार निर्माण कार्य विफल हो जाता है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि भारी बर्फबारी के दौरान भी माँ की मूर्ति पर कभी बर्फ नहीं टिकती, जबकि मंदिर के चारों ओर कई फीट बर्फ जमा हो जाती है।

वास्तुकला और गर्भ गृह

मंदिर की वास्तुकला पारंपरिक पहाड़ी शैली (काठ-कुणी) में है। यहाँ देवी की कोई पूर्ण मूर्ति नहीं है, बल्कि एक पत्थर की पिंडी के रूप में माँ शिकारी देवी विराजमान हैं। मंदिर का परिसर अत्यंत शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर है।

यात्रा और पहुंच

शिकारी देवी तक पहुंचने के लिए मंडी से जंजैहली तक सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। जंजैहली से मंदिर तक लगभग 15-16 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, जिसमें से अंतिम कुछ किलोमीटर की चढ़ाई पैदल (ट्रैकिंग) करनी पड़ती है। निकटतम रेलवे स्टेशन चंडीगढ़ या कालका है, और निकटतम हवाई अड्डा भुंतर (कुल्लू) है।

महत्वपूर्ण निर्देश

यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे अपने साथ गर्म कपड़े, पर्याप्त पानी और प्राथमिक चिकित्सा किट रखें। मंदिर के आसपास ठहरने के लिए वन विभाग के विश्राम गृह और जंजैहली में निजी होटल उपलब्ध हैं।

शिखंडी धार की दिव्य शक्ति: शिकारी देवी मंदिर का रहस्य और आध्यात्मिक महत्व

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में जंजैहली घाटी के शीर्ष पर स्थित श्री शिकारी देवी मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह प्रकृति और आध्यात्मिकता के अनूठे संगम का प्रतीक भी है। समुद्र तल से लगभग 3359 मीटर (11,020 फीट) की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर अपनी एक विशिष्ट विशेषता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है—इस मंदिर की कोई छत नहीं है। सदियों से यह माना जाता है कि यहाँ की अधिष्ठात्री देवी, माँ शिकारी, खुले आकाश के नीचे रहना पसंद करती हैं। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, कई बार मंदिर पर छत बनाने का प्रयास किया गया, लेकिन हर बार प्राकृतिक आपदाओं या दैवीय संकेतों के कारण छत टिक नहीं पाई। आज भी यह मंदिर बिना किसी छत के शान से खड़ा है, जो भक्तों के लिए अटूट श्रद्धा का केंद्र है।

इस मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार सर्दियों के दौरान देखने को मिलता है। जब पूरी जंजैहली घाटी और शिकारी धार का क्षेत्र 5 से 10 फीट गहरी बर्फ की चादर से ढक जाता है, तब भी मंदिर के गर्भगृह के भीतर स्थापित माता की मूर्ति पर बर्फ की एक बूंद भी नहीं टिकती। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसे समझना कठिन है, क्योंकि मंदिर के चारों ओर बर्फ के ऊंचे ढेर लगे होते हैं, लेकिन मुख्य वेदी हमेशा सूखी और साफ रहती है। श्रद्धालु इसे माँ शिकारी देवी का साक्षात चमत्कार मानते हैं। यहाँ की शांति और शुद्ध वायु भक्तों को एक अलग ही लोक में ले जाती है, जहाँ केवल मंत्रोच्चार और ठंडी हवाओं की गूँज सुनाई देती है।

"शिकारी देवी का यह पावन धाम 'छोटा काशी' कहे जाने वाले मंडी जिले का मुकुटमणि है। यहाँ की शक्ति का अनुभव केवल वही कर सकता है जो इन दुर्गम पहाड़ियों को पार कर माँ के चरणों में शीश नवाता है।"

मंदिर की वास्तुकला अत्यंत सरल है, जो पत्थर के स्लैबों से बनी है। यह प्राचीन 'पैगोडा' शैली या उत्तर भारतीय शिखर शैली से भिन्न, एक खुले चबूतरे के समान है। यहाँ माँ दुर्गा के 'शिकारी' रूप की पूजा की जाती है। माना जाता है कि प्राचीन काल में शिकारी यहाँ शिकार करने आते थे और सफलता के लिए माँ से प्रार्थना करते थे, जिसके कारण माता का नाम 'शिकारी देवी' पड़ा। आज यह स्थान वन्यजीव अभयारण्य (Shikari Devi Wildlife Sanctuary) के अंतर्गत आता है, जहाँ कस्तूरी मृग, हिमालयन थार और विभिन्न दुर्लभ पक्षी पाए जाते हैं, जो इस स्थान की पवित्रता और प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ाते हैं।

पौराणिक इतिहास और पांडवों से जुड़ा प्राचीन संबंध

श्री शिकारी देवी मंदिर का इतिहास महाभारत काल से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रचलित कथाओं के अनुसार, जब पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान हिमालय की कंदराओं में भटक रहे थे, तब उन्होंने इस ऊंचे शिखर पर विश्राम किया था। अपनी विजय और शक्ति की प्राप्ति के लिए अर्जुन ने यहाँ माँ दुर्गा की कठोर तपस्या की थी। पांडवों की भक्ति से प्रसन्न होकर माता प्रकट हुईं और उन्हें कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया। कहा जाता है कि पांडवों ने ही यहाँ पत्थर की मूर्तियों की स्थापना की थी और इस स्थान को एक पवित्र शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित किया था।

मार्कंडेय ऋषि और शिकारी देवी का प्रसंग

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मार्कंडेय ऋषि ने भी इस स्थान पर वर्षों तक घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आदि शक्ति ने उन्हें दर्शन दिए और इसी स्थान पर वास करने का वचन दिया। मंदिर के पास ही एक छोटा सा स्थान है जिसे 'ऋषि मार्कंडेय की तपोस्थली' माना जाता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु न केवल माता के दर्शन करते हैं, बल्कि उन प्राचीन ऊर्जाओं को भी महसूस करते हैं जो हजारों वर्षों से इन पहाड़ियों में रची-बसी हैं। यहाँ की मूर्तियाँ काले पत्थर की बनी हैं और अत्यंत प्राचीन प्रतीत होती हैं, जो इस स्थान की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करती हैं।

स्थानीय गद्दी और गुज्जर समुदायों के बीच भी माँ शिकारी देवी के प्रति अगाध श्रद्धा है। वे माता को अपनी रक्षक मानते हैं। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि जब भी चरवाहे अपनी भेड़-बकरियों के साथ इन ऊंचे चरागाहों की ओर बढ़ते हैं, तो वे सबसे पहले माँ शिकारी का आशीर्वाद लेते हैं। मंदिर के आसपास का क्षेत्र 'बुग्याल' (मखमली घास के मैदान) से घिरा है, जो गर्मियों में स्वर्ग के समान प्रतीत होता है। यहाँ की यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन का एक मार्ग है।

संपूर्ण यात्रा मार्ग: मंडी से शिकारी देवी तक का सफर

शिकारी देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए मुख्य आधार शिविर 'जंजैहली' (Janjehli) है, जो मंडी से लगभग 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जंजैहली स्वयं एक बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल है। यहाँ से मंदिर की दूरी लगभग 16 किलोमीटर है। यात्रा का रोमांच तब शुरू होता है जब आप जंजैहली से आगे 'रायगढ़' (Raigad) की ओर बढ़ते हैं। रायगढ़ तक पक्की सड़क उपलब्ध है, लेकिन इसके बाद का रास्ता काफी खड़ी चढ़ाई वाला और चुनौतीपूर्ण है।

गंतव्य (From - To) दूरी (लगभग) यात्रा का साधन मुख्य आकर्षण
मंडी से जंजैहली 85 कि.मी. बस / टैक्सी बखली नदी, देवदार के जंगल
जंजैहली से रायगढ़ 10 कि.मी. जीप / निजी वाहन खड़ी चढ़ाई, सुंदर घाटियाँ
रायगढ़ से शिकारी देवी 6 कि.मी. पैदल ट्रेक / सीढ़ियाँ बुग्याल, वन्यजीव, हिमालय दर्शन
करसोग से शिकारी देवी 22 कि.मी. ट्रेकिंग मार्ग घने जंगल, प्राचीन मार्ग

ट्रेकिंग और मार्ग की चुनौतियाँ

रायगढ़ से मंदिर तक की 6 किलोमीटर की चढ़ाई अब सीढ़ियों के माध्यम से सुगम बना दी गई है, जिसमें लगभग 500 से अधिक सीढ़ियाँ हैं। हालांकि, उच्च ऊंचाई के कारण हवा का दबाव कम होने लगता है, इसलिए यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे धीरे-धीरे चढ़ें। ट्रेक के दौरान आपको हिमालय की पीर पंजाल और धौलाधार श्रेणियों के विहंगम दृश्य दिखाई देते हैं। यदि आप साहसिक प्रेमी हैं, तो आप करसोग (Karsog) की ओर से भी शिकारी देवी पहुँच सकते हैं, जो एक लंबा लेकिन अत्यंत सुंदर ट्रेकिंग रूट है।

सर्दियों के महीनों (दिसंबर से मार्च) में यह मार्ग भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाता है। इस दौरान केवल अनुभवी पर्वतारोही ही यहाँ जाने का साहस करते हैं। सामान्य तीर्थयात्रियों के लिए सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर के बीच का होता है। मानसून के दौरान यहाँ भूस्खलन का खतरा रहता है, इसलिए यात्रा से पहले मौसम की जानकारी लेना अनिवार्य है।

दर्शन समय, आरती और महत्वपूर्ण नियम

शिकारी देवी मंदिर के द्वार भक्तों के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुले रहते हैं। चूंकि यह एक उच्च पर्वतीय क्षेत्र है और यहाँ बिजली की स्थायी व्यवस्था सीमित है, इसलिए सूर्यास्त के बाद मंदिर परिसर में रुकना सुरक्षित नहीं माना जाता। माता की पहली आरती सूर्योदय के समय होती है, जब सूर्य की पहली किरणें सीधे गर्भगृह को स्पर्श करती हैं। शाम की आरती सूर्यास्त से ठीक पहले की जाती है, जिसके बाद भक्त नीचे जंजैहली या रायगढ़ की ओर प्रस्थान कर देते हैं।

  • दर्शन का समय: प्रातः 6:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक (मौसम के अनुसार परिवर्तन संभव)।
  • मुख्य पर्व: चैत्र और अश्विन नवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है।
  • भोग और प्रसाद: भक्त माता को हलवा, सूखे मेवे और स्थानीय फल अर्पित करते हैं। यहाँ नारियल चढ़ाने की भी परंपरा है।
  • वेशभूषा: मंदिर की पवित्रता बनाए रखने के लिए शालीन वस्त्र पहनें। चूंकि यहाँ ठंड बहुत होती है, इसलिए भारी ऊनी कपड़े साथ रखें।

श्रद्धालुओं के लिए विशेष निर्देश और सावधानियां

शिकारी देवी की यात्रा शारीरिक रूप से थका देने वाली हो सकती है। यहाँ ऑक्सीजन का स्तर सामान्य से कम होता है, इसलिए हृदय रोगियों और सांस की समस्या वाले व्यक्तियों को डॉक्टर की सलाह के बिना ऊपर नहीं जाना चाहिए। मंदिर परिसर में कूड़ा फैलाना सख्त मना है क्योंकि यह एक संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र है। प्लास्टिक की बोतलों और पैकेटों को वापस अपने साथ लाएं। मंदिर के पास कुछ छोटी दुकानें हैं जहाँ चाय और मैग्गी मिल सकती है, लेकिन मुख्य भोजन के लिए आपको जंजैहली पर ही निर्भर रहना होगा।

मंदिर के पास ठहरने के लिए वन विभाग का एक विश्राम गृह (Forest Rest House) और कुछ सराय उपलब्ध हैं, लेकिन इनकी बुकिंग पहले से करानी पड़ती है। अधिकांश यात्री जंजैहली में रुकना पसंद करते हैं जहाँ होमस्टे और बजट होटल आसानी से मिल जाते हैं। जंजैहली के स्थानीय लोग बहुत ही मिलनसार हैं और वे आपको मंदिर के इतिहास के बारे में कई रोचक लोककथाएं सुना सकते हैं।

आसपास के दर्शनीय स्थल और आध्यात्मिक केंद्र

शिकारी देवी की यात्रा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। इसके आसपास कई ऐसे स्थान हैं जो आपकी यात्रा को यादगार बना सकते हैं। जंजैहली घाटी को 'हिमाचल का अनछुआ स्वर्ग' कहा जाता है। यहाँ से आप 'कमरुनाग मंदिर' की ओर भी जा सकते हैं, जो अपनी रहस्यमयी झील के लिए प्रसिद्ध है। कमरुनाग और शिकारी देवी के बीच का ट्रेक उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो प्रकृति के बीच समय बिताना चाहते हैं।

जंजैहली और करसोग घाटी का सौंदर्य

जंजैहली से कुछ ही दूरी पर 'मगरू महादेव' का प्राचीन मंदिर है, जो अपनी काष्ठ कला (Wood Carving) के लिए जाना जाता है। इसके अलावा, करसोग घाटी में स्थित 'ममलेश्वर महादेव' मंदिर, जहाँ पांडवों द्वारा स्थापित एक विशाल शिवलिंग और 200 ग्राम वजनी गेहूं का दाना (जो महाभारत काल का माना जाता है) स्थित है, भी देखने योग्य है। ये सभी स्थान एक ही आध्यात्मिक सर्किट का हिस्सा हैं जो मंडी जिले की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

शिकारी देवी की यात्रा का समापन जंजैहली की शांत वादियों में बैठकर किया जा सकता है। यहाँ की हरियाली और शुद्ध वातावरण आपके मन को शांति प्रदान करता है। यदि आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं, तो शिकारी धार से दिखने वाला सूर्यास्त और सूर्योदय आपके कैमरे के लिए बेहतरीन शॉट हो सकते हैं। यहाँ की पहाड़ियों पर उगने वाले औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियाँ भी इस क्षेत्र को विशेष बनाती हैं।

"माँ शिकारी देवी के दर्शन मात्र से ही व्यक्ति के अहंकार का नाश होता है और उसे प्रकृति की विराटता का आभास होता है। यह स्थान सिद्धियों का केंद्र है।"

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

दर्शनार्थियों के अनुभव व समीक्षाएँ (0)

मंदिर दर्शन की अपनी आध्यात्मिक अनुभूति साझा करें

मंदिर विवरण कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!