पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर, मदुरै, तमिलनाडु: इतिहास, हजार खंभों का मंडप, दर्शन समय एवं संपूर्ण यात्रा गाइड | Arulmigu Meenakshi Sundareswarar Temple Madurai: History, Architecture & Travel Guide

175 दर्शनार्थी
मदुरै, तमिलनाडु
प्रकाशित: 28 Sep 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर (शिव)
दर्शन समय सारिणी
प्रातः ०६:०० AM से अपराह्न १२:०० PM एवं संध्या ०२:०० PM से रात्रि ०८:०० PM
नित्य आरती समय
मंगला आरती: ०६:०० AM | बालभोग: ०७:३० AM | मध्याह्न भोग: १२:०० PM | संध्या महाआरती: ०६:३० PM | शयन: ०८:०० PM
स्थान / नगर
मदुरै, तमिलनाडु
आराध्य देव
माता मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर (शिव)
दर्शन समय
प्रातः ०६:०० AM से अपराह्न १२:०० PM एवं संध्या ०२:०० PM से रात्रि ०८:०० PM
आरती समय
मंगला आरती: ०६:०० AM | बालभोग: ०७:३० AM | मध्याह्न भोग: १२:०० PM | संध्या महाआरती: ०६:३० PM | शयन: ०८:०० PM
स्थान / धाम
मीनाक्षी अमन टेम्पल रोड, मदुरै मुख्य, मदुरै, तमिलनाडु 625001
अक्षर आकार:
पठन थीम:

१. श्री यमुनोत्री धाम: तीर्थ परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

भारतवर्ष के उत्तरी हिमालयी अंचल में देवभूमि उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से लगभग ३,२९१ मीटर (१०,७९७ फीट) की अलौकिक ऊंचाई पर गढ़वाल हिमालय की कालिंद पर्वत श्रृंखला में स्थित श्री यमुनोत्री धाम मंदिर (Shri Yamunotri Dham Temple, Uttarkashi) सनातन धर्म के पावन 'छोटा चार धाम' (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ) का प्रथम और अत्यंत पवित्र तीर्थ पड़ाव है। उत्तराखंड चार धाम यात्रा का शास्त्रीय शुभारंभ परंपरा के अनुसार पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हुए सर्वप्रथम यमुनोत्री धाम से ही किया जाता है।

पद्म पुराण तथा स्कन्द पुराण के केदार खंड में देवी यमुना और यमुनोत्री तीर्थ के आध्यात्मिक महात्म्य का उद्घोष करते हुए महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं:

॥ श्री यमुना स्तुति श्लोक ॥

"सूर्यपुत्री नमस्तुभ्यं यमस्वस्रे नमो नमः।
कलिन्दगिरिसम्भूते सर्वपापप्रणाशिनि॥"

भावार्थ: हे भगवान सूर्य की दिव्य पुत्री! हे मृत्यु के देवता धर्मराज यम की परम स्नेहमयी भगिनी! हे कालिंद पर्वत से प्रकट होने वाली पावन कलिंद-कन्या यमुना! आपको बारंबार नमस्कार है। आप अपने पावन जल के स्पर्श मात्र से भक्तों के समस्त पापों और भयों का समूल नाश करने वाली हैं।

सनातन धर्म में माँ यमुना को जीवनदायिनी, प्रेम की अधिष्ठात्री और यम-यातना से मुक्ति प्रदान करने वाली परम देवी माना गया है। भगवान श्री कृष्ण की परम प्रिया पटरानी 'कालिंदी' के रूप में यमुना जी ब्रज संस्कृति और भक्ति रस का प्राण हैं। यमुनोत्री धाम की सबसे विस्मयकारी विशेषता यहाँ स्थित प्राकृतिक खौलता हुआ गर्म जलकुंड 'सूर्य कुंड' (Surya Kunda) है, जहाँ बर्फ से ढके पर्वतों के बीच ८८ से ९० डिग्री सेल्सियस खौलता हुआ जल निरंतर प्रवाहित होता रहता है।

२. पौराणिक कथा एवं स्थल पुराण (Sthala Purana)

स्कन्द पुराण तथा महाभारत के वन पर्व में यमुनोत्री तीर्थ और असित मुनि की तपस्या का अत्यंत पावन आख्यान मिलता है:

॥ महर्षि असित की तपस्या एवं गंगा-यमुना की कृपा ॥

प्राचीन काल में महर्षि असित यमुनोत्री के इस दुर्गम हिमक्षेत्र में अपनी कुटिया बनाकर रहते थे। उनका नित्य नियम था कि वे प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पैदल यात्रा कर गंगा जी (गंगोत्री) और यमुना जी (यमुनोत्री) दोनों पवित्र नदियों में स्नान करते थे। सहस्रों वर्षों तक उनका यह कठोर नियम निर्बाध चलता रहा।

वृद्धावस्था आने पर महर्षि असित शारीरिक रूप से अत्यंत दुर्बल और अशक्त हो गए। वे कई दिनों तक चलने में असमर्थ हो गए और गंगोत्री जाकर गंगा स्नान करने में असमर्थ होने के कारण दुखी होकर रोने लगे। महर्षि के इस अनन्य भक्ति भाव को देखकर माँ गंगा अत्यंत द्रवित हो गईं।

उसी क्षण महर्षि असित की कुटिया के ठीक सामने यमुना तट पर चट्टान से एक अलौकिक शीतल जलधारा फूट पड़ी, जो साक्षात् माँ गंगा की धारा थी। माँ गंगा और यमुना दोनों ने एक साथ प्रकट होकर महर्षि को दर्शन दिए और कहा: "हे मुनिवर! आपकी अनन्य निष्ठा से प्रसन्न होकर हम दोनों यहीं आपके सम्मुख उपस्थित हैं।" आज भी यमुनोत्री में यमुना जी की धारा के पास ही माँ गंगा की वह सूक्ष्म धारा विद्यमान मानी जाती है।

॥ यमराज का वरदान एवं भाई दूज का आध्यात्मिक रहस्य ॥

पौराणिक मान्यता के अनुसार यमुना और यमराज दोनों भगवान सूर्य और देवी संजना (छाया) की संतान हैं। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई दूज) के दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर पधारे। यमुना जी ने अत्यंत प्रेम से अपने भाई का आतिथ्य किया और उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। यमराज ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। यमुना जी ने वरदान मांगा: "हे भ्राता! जो भी प्राणी आज के दिन यमुना के पावन जल में स्नान कर अपनी बहन के घर भोजन करेगा, उसे कभी यमदूतों का भय और अकाल मृत्यु का संताप न हो।" यमराज ने तथास्तु कहा। यही कारण है कि यमुनोत्री में स्नान करने से यम-यातना से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है।

३. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मंदिर निर्माण कालक्रम

यमुनोत्री मंदिर का ऐतिहासिक सफर हिमालयी प्राकृतिक आपदाओं और आस्था के पुनरुद्धार की अनूठी कहानी है:

कालखंड / वर्ष ऐतिहासिक घटनाक्रम शासक / योगदानकर्ता
प्राचीन काल महर्षि असित मुनि की तपोभूमि एवं प्रारंभिक पूजा। वैदिक ऋषि परंपरा एवं स्थानीय पहाड़ी ग्रामीण।
८वीं शताब्दी ईस्वी जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी का आगमन। यमुनोत्री को चार धाम यात्रा के प्रथम द्वार के रूप में मान्यता।
१९वीं शताब्दी (ईस्वी १८३९) प्रारंभिक काष्ठ व पाषाण मंदिर का निर्माण। टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह द्वारा मंदिर निर्माण।
१९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध भूकंप एवं हिमस्खलन से क्षति और भव्य पुनर्निर्माण। जयपुर की महारानी गुलेरिया द्वारा वर्तमान भव्य पाषाण मंदिर का पुनर्निर्माण।
वर्तमान समय यमुनोत्री मंदिर समिति एवं उत्तराखंड चार धाम देवस्थानम। जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक सुदृढ़ पैदल मार्ग, शेड और यात्री सुविधाओं का विस्तार।

यमुनोत्री मंदिर समुद्र तल से लगभग १०,८०० फीट की ऊंचाई पर एक तंग घाटी में स्थित है। यहाँ भीषण हिमपात और भूस्खलन के कारण मंदिर को कई बार नुकसान पहुंचा, परंतु श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा ने हर बार इसका पुनर्निर्माण कराया।

४. मंदिर की वास्तुकला, अलौकिक सूर्य कुंड एवं दिव्य शिला

श्री यमुनोत्री मंदिर पहाड़ी पाषाण और देवदार काष्ठ स्थापत्य शैली का एक अत्यंत सुंदर और मनमोहक देवालय है:

  • १. मुख्य मंदिर एवं काले संगमरमर का विग्रह: मंदिर का मुख्य शिखर पीले और लाल रंगों से सुसज्जित है। मंदिर के गर्भगृह में काले संगमरमर से निर्मित माँ यमुना की अत्यंत मनोहारी चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है। देवी के हाथों में कमल और जलपात्र सुशोभित हैं। उनके समीप ही माँ गंगा की श्वेत संगमरमर की प्रतिमा भी प्रतिष्ठित है।
  • २. चमत्कारी सूर्य कुंड (Surya Kund - Boiling Thermal Spring): मंदिर के प्रांगण में सबसे बड़ा प्राकृतिक आश्चर्य 'सूर्य कुंड' है। इस कुंड में भूमि के भीतर से लगभग ८८°C से ९०°C खौलता हुआ गर्म पानी निरंतर उबलता रहता है। तीर्थयात्री इस कुंड में मलमल के कपड़े की पोटली में कच्चे चावल और आलू बांधकर डालते हैं। मात्र ५ से ७ मिनट में चावल और आलू पूरी तरह उबलकर पक जाते हैं! श्रद्धालु इसे माँ यमुना के दिव्य प्रसाद के रूप में अपने घर ले जाते हैं। यह प्रसाद महीनों तक खराब नहीं होता।
  • ३. पावन दिव्य शिला (Divya Shila): सूर्य कुंड के ठीक समीप लाल रंग की एक विशाल पाषाण शिला स्थित है जिसे 'दिव्य शिला' कहा जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार माँ यमुना के दर्शन और पूजन से पूर्व इस दिव्य शिला का पूजन और वंदन करना अनिवार्य है। इस शिला की पूजा करने से यात्रा निर्विघ्न संपन्न होती है।
  • ४. तप्त कुंड स्नान (गौरी कुंड): सूर्य कुंड के अत्यंत खौलते पानी को नालियों के माध्यम से पास के 'गौरी कुंड' में लाया जाता है जहाँ ठंडे पानी के साथ मिलाकर इसे सामान्य स्नान योग्य बनाया जाता है। श्रद्धालु यहाँ स्नान कर अपनी सारी शारीरिक थकान और शीत को दूर करते हैं।
  • ५. चंपासर ग्लेशियर (यमुना का वास्तविक उद्गम): मंदिर से लगभग १ किलोमीटर ऊपर और समुद्र तल से ४,४२१ मीटर की दुर्गम ऊंचाई पर स्थित चंपासर ग्लेशियर (कालिंद पर्वत) यमुना नदी का वास्तविक भौतिक उद्गम स्थल है। अत्यधिक दुर्गम होने के कारण श्रद्धालु मंदिर स्थल पर ही यमुना जी की पूजा करते हैं।

५. कपाट उद्घाटन, दैनिक पूजा-आरती क्रम एवं शीतकालीन गद्दी

यमुनोत्री धाम के कपाट वर्ष में केवल छह माह (अक्षय तृतीया से भाई दूज तक) खुले रहते हैं:

प्रातः मंगला आरती

०६:०० AM - ०६:३० AM

मंदिर कपाट उद्घाटन, यमुना महाभिषेक एवं मंगलारती।

मध्याह्न भोग आरती

१२:०० PM - १२:३० PM

खीर एवं सूर्य कुंड में पके चावल का नैवेद्य अर्पण।

संध्या महाआरती

०६:३० PM - ०७:३० PM

कपूर दीपदान आरती, यमुना स्तुति एवं रात्रि शयन।

शीतकालीन प्रवास (खरसाली गांव): कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई दूज) के पावन पर्व पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यमुनोत्री धाम के कपाट शीतकाल हेतु बंद कर दिए जाते हैं। माँ यमुना की उत्सव मूर्ति (डोली) को गाजे-बाजे और पारंपरिक पहाड़ी वाद्ययंत्रों (ढोल-दमाऊ) के साथ जानकी चट्टी के पास स्थित उनके मायके 'खरसाली गांव' (Kharsali Village) लाया जाता है। शीतकाल के छह माह तक माँ यमुना खरसाली के प्राचीन लकड़ी के मंदिर में विराजमान रहती हैं, जहाँ देश भर के श्रद्धालु उनके दर्शन कर सकते हैं।

६. प्रमुख उत्सव, भाई दूज एवं यात्रा मुहूर्त

यमुनोत्री धाम में निम्नलिखित पर्व अत्यंत उल्लास से मनाए जाते हैं:

१. कपाट उद्घाटन उत्सव (अक्षय तृतीया)

वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को खरसाली से माँ यमुना की डोली यमुनोत्री धाम पहुंचती है और पूरे विधि-विधान से कपाट खोले जाते हैं। इसी दिन से उत्तराखंड चार धाम यात्रा विधिवत प्रारंभ होती है।

२. भाई दूज कपाट बंदी उत्सव (कार्तिक शुक्ल द्वितीया)

भाई दूज पर माँ यमुना की विदाई का भावुक दृश्य होता है। शनि देव (खरसाली में स्थित उनके भाई) की डोली अपनी बहन यमुना की अगवानी करने यमुनोत्री पहुंचती है।

३. यमुना छठ (चैत्र शुक्ल षष्ठी)

माँ यमुना के अवतरण दिवस पर विशेष महापूजा, पंचामृत अभिषेक और संकीर्तन का आयोजन किया जाता है।

४. यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम

यमुनोत्री यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम मई से जून और सितंबर से अक्टूबर रहता है। जुलाई-अगस्त में अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन के कारण यात्रा से बचना चाहिए।

७. यात्रा मार्गदर्शिका एवं जानकी चट्टी पैदल ट्रेक (How to Reach Yamunotri)

यमुनोत्री धाम पहुँचने हेतु अंतिम मोटर मार्ग 'जानकी चट्टी' तक है, जहाँ से आगे ६ किमी का पैदल ट्रेक करना पड़ता है:

  • हवाई मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून (DED - लगभग २१० किमी) है। सहस्रधारा हेलीपैड (देहरादून) से खरसाली हेलीपैड हेतु हेलीकॉप्टर सेवाएं उपलब्ध हैं, जहाँ से यमुनोत्री मात्र ६ किमी रह जाती है।
  • रेल मार्ग (By Train): निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन ऋषिकेश (लगभग २०० किमी) और हरिद्वार (लगभग २२५ किमी) है। देहरादून रेलवे स्टेशन लगभग १७५ किमी दूर है। स्टेशनों से जानकी चट्टी हेतु बसें और टैक्सियां मिलती हैं।
  • सड़क मार्ग (By Road): हरिद्वार/ऋषिकेश से मार्ग: ऋषिकेश → धरासू बैंड → बड़कोट → नौगांव → हनुमान चट्टी → जानकी चट्टी (लगभग २२० किमी)। बड़कोट मुख्य पड़ाव है जहाँ तीर्थयात्री रात्रि विश्राम करते हैं।
  • जानकी चट्टी से यमुनोत्री पैदल ट्रेक (६ किमी): जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक ६ किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है। यह मार्ग पूरी तरह पक्का, रेलिंग युक्त और टीन शेड से ढका हुआ है। जो श्रद्धालु पैदल चलने में असमर्थ हैं, उनके लिए घोड़े-खच्चर, पालकी (डोली), और कंडी (पिट्ठू) की अधिकृत सरकारी दरों पर पर्याप्त सुविधा उपलब्ध रहती है। पैदल चढ़ने में लगभग २.५ से ३.५ घंटे का समय लगता है।

८. तीर्थयात्रियों के लिए आवास, नियम एवं आवश्यक सावधानियां

यमुनोत्री यात्रा में शारीरिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है:

  • १. चार धाम पंजीकरण एवं स्वास्थ्य प्रमाण पत्र: उत्तराखंड सरकार के पोर्टल पर अनिवार्य बायोमेट्रिक पंजीकरण कराएं। उच्च रक्तचाप और हृदय रोगी चढ़ाई चढ़ते समय धीरे-धीरे चलें और पर्याप्त विश्राम लें।
  • २. ऊनी वस्त्र एवं रेनकोट: यमुनोत्री में मौसम कभी भी बदल सकता है। दोपहर में भी तापमान गिर जाता है। अतः थर्मल इनर, ऊनी टोपी, दस्ताने, मजबूत ट्रेकिंग जूते और रेनकोट साथ रखना अत्यंत आवश्यक है।
  • ३. आवास व्यवस्था: अधिकांश श्रद्धालु यमुनोत्री दर्शन के पश्चात उसी दिन दोपहर तक नीचे जानकी चट्टी या बड़कोट लौट आते हैं। जानकी चट्टी, खरसाली और बड़कोट में GMVN के पर्यटक आवास गृह, स्थानीय आश्रम और दर्जनों निजी होटल उपलब्ध हैं।

९. यमुनोत्री के प्रमुख दर्शनीय एवं तीर्थ स्थल (Nearby Attractions)

यमुनोत्री यात्रा के दौरान निम्नलिखित पावन स्थलों के दर्शन अवश्य करें:

  1. खरसाली गांव एवं प्राचीन शनि मंदिर (Kharsali Shani Temple): जानकी चट्टी से १ किमी दूर स्थित माँ यमुना का शीतकालीन आवास। यहाँ लकड़ी और पत्थरों से निर्मित बहुमंजिला प्राचीन शनि देव मंदिर है जो स्थापत्य का अद्भुत नमूना है।
  2. सप्तर्षि कुंड (Saptrishi Kund): यमुनोत्री से १० किमी आगे लगभग ४,४२१ मीटर की अत्यधिक दुर्गम ऊंचाई पर स्थित वह अलौकिक नीले जल का कुंड जहाँ सप्त ऋषियों ने तपस्या की थी।
  3. बंदरपूंछ पर्वत शिखर (Bandarpoonch Peak): यमुनोत्री के पीछे स्थित ६,३१६ मीटर ऊंचा श्वेत हिमाच्छादित पर्वत, जिसे हनुमान जी की पूंछ का विश्राम स्थल माना जाता है।
  4. हनुमान चट्टी (Hanuman Chatti): जानकी चट्टी से ८ किमी पहले स्थित हनुमान गंगा और यमुना नदी का पावन संगम।
  5. बड़कोट (Barkot): सेब के बगीचों और यमुना घाटी के विहंगम दृश्यों से परिपूर्ण सुंदर पर्वतीय नगर।

१०. प्रामाणिक प्रश्नोत्तरी (FAQ)

भूगर्भीय दृष्टि से सूर्य कुंड एक प्राकृतिक हाइड्रोथर्मल गीजर है जहाँ भूमिगत सल्फर और खनिजों के संपर्क से जल का तापमान ८८ से ९० डिग्री सेल्सियस (खौलता हुआ) बना रहता है। श्रद्धालु कपड़े की पोटली में कच्चे चावल डालकर इस कुंड में डुबोते हैं। अत्यधिक उबलते जल के कारण मात्र ५ से ७ मिनट में चावल पक जाते हैं, जिसे माँ यमुना का महाप्रसाद माना जाता है।

स्कन्द पुराण के अनुसार दिव्य शिला साक्षात् दिव्य शक्तियों और तपोबल की आधारशिला है। मान्यता है कि दिव्य शिला की विधिवत पूजा और मार्जन किए बिना माँ यमुना की पूजा पूर्ण फलदायी नहीं होती। यह शिला साधक के मन के चंचल विचारों को स्थिर कर आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है।

जानकी चट्टी से यमुनोत्री की दूरी ६ किलोमीटर है और यह मध्यम से कठिन श्रेणी की निरंतर चढ़ाई वाला मार्ग है। हालांकि अब पूरा मार्ग चौड़ा, पक्का और रेलिंग युक्त है। सामान्य गति से चलने पर ३ से ३.५ घंटे लगते हैं। बुजुर्गों और बच्चों के लिए घोड़े, पालकी (डोली) और पिट्ठू की सुगम व्यवस्था उपलब्ध रहती है।

शीतकाल (नवंबर से अप्रैल) में भारी बर्फबारी के कारण जब यमुनोत्री धाम के कपाट बंद रहते हैं, तब माँ यमुना की उत्सव मूर्ति जानकी चट्टी के समीप स्थित 'खरसाली गांव' के प्राचीन मंदिर में विराजमान रहती है। श्रद्धालु शीतकाल में खरसाली जाकर माँ यमुना और उनके भाई शनि देव के दर्शन कर सकते हैं।

सनातन परंपरा में किसी भी पावन तीर्थ की परिक्रमा सदैव पश्चिम से पूर्व की ओर (प्रदक्षिणा क्रम में) की जाती है। उत्तराखंड के चार धामों में यमुनोत्री सबसे पश्चिम में स्थित है। इसके अतिरिक्त माँ यमुना को सूर्यपुत्री और यम-भय का नाश करने वाली माना गया है, अतः यात्रा के प्रारंभ में ही यमुना स्नान कर साधक निर्भय होकर आगे की कठिन हिमालयी यात्रा पूर्ण करता है।
तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

दर्शनार्थियों के अनुभव व समीक्षाएँ (0)

मंदिर दर्शन की अपनी आध्यात्मिक अनुभूति साझा करें

मंदिर विवरण कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!