पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

मध्यमहेश्वर मंदिर, रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)

71 दर्शनार्थी
गोविंदघाट/ऊखीमठ, उत्तराखंड
प्रकाशित: 30 Sep 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
भगवान शिव (नाभि लिंग)
दर्शन समय सारिणी
सुबह 06:00 बजे से रात्रि 08:00 बजे तक (मई से अक्टूबर)
नित्य आरती समय
मंगला आरती: 06:00 AM | भोग आरती: 12:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM
स्थान / नगर
गोविंदघाट/ऊखीमठ, उत्तराखंड
आराध्य देव
भगवान शिव (नाभि लिंग)
दर्शन समय
सुबह 06:00 बजे से रात्रि 08:00 बजे तक (मई से अक्टूबर)
आरती समय
मंगला आरती: 06:00 AM | भोग आरती: 12:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM
स्थान / धाम
मध्यमहेश्वर मंदिर, मनसूना गांव के पास, रुद्रप्रयाग जिला, उत्तराखंड - 246469
अक्षर आकार:
पठन थीम:

मध्यमहेश्वर मंदिर: एक परिचय

मध्यमहेश्वर मंदिर, जिसे 'मद्महेश्वर' के नाम से भी जाना जाता है, उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित पंच केदार में से चौथा मंदिर है। यह मंदिर भगवान शिव के 'नाभि' (navel) रूप की पूजा के लिए समर्पित है। समुद्र तल से 3,497 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर अपनी वास्तुकला और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।

पौराणिक पृष्ठभूमि और इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध के बाद पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते थे। भगवान शिव पांडवों से नाराज थे और उन्होंने छिपने के लिए बैल का रूप धारण किया। जब पांडवों ने उन्हें पहचाना, तो वे भूमि में विलीन हो गए। भगवान शिव के शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें 'पंच केदार' कहा जाता है। मध्यमहेश्वर में भगवान शिव की नाभि प्रकट हुई थी।

पंच केदार की महिमा अपरंपार है, जहाँ भगवान शिव के विभिन्न अंगों की पूजा की जाती है। मध्यमहेश्वर में नाभि-लिंग के दर्शन से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वास्तुकला और गर्भगृह

मंदिर का निर्माण वास्तुकला की पारंपरिक 'नगरा' शैली में किया गया है। गर्भगृह में भगवान शिव का नाभि-लिंग स्थापित है, जो पत्थर के रूप में है। मंदिर के चारों ओर ऊंचे पर्वत और हरे-भरे घास के मैदान (बुग्याल) इसे एक अलौकिक स्वरूप प्रदान करते हैं। मंदिर के पास ही दो अन्य छोटे मंदिर हैं, जो माता पार्वती और भगवान अर्धनारीश्वर को समर्पित हैं।

यात्रा और ट्रेकिंग गाइड

विवरण जानकारी
प्रारंभिक बिंदु ऊखीमठ
मुख्य ट्रेक रांसी गांव से
दूरी 16-18 किलोमीटर

प्रमुख त्यौहार

मंदिर के कपाट मई के महीने में खुलते हैं और अक्टूबर/नवंबर में बंद हो जाते हैं। महाशिवरात्रि और श्रावण मास के दौरान यहाँ विशेष पूजा और अभिषेक का आयोजन किया जाता है।

सुविधाएं और ठहरने की व्यवस्था

मंदिर परिसर के पास मंदिर समिति द्वारा संचालित धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे अपने साथ पर्याप्त गर्म कपड़े और आवश्यक दवाएं रखें। रांसी गांव में होमस्टे की सुविधा भी उपलब्ध है।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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