सनातन हिंदू संस्कृति में समय को केवल एक भौतिक मापक नहीं, अपितु साक्षात् भगवान कालस्वरूप महाकाल का दिव्य रूप माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं—"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो" (मैं ही लोकों का संहार करने वाला महाकाल हूँ)। वैदिक पंचांग भारतीय खगोल विज्ञान (Astronomy) और पराविद्या (Astrology) का वह अद्वितीय समन्वय है, जो हजारों वर्षों से सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की सूक्ष्म गतियों की अचूक गणना करता आ रहा है।
१. पंचांग शब्द का अर्थ और इसके पांच दिव्य अंग
'पंचांग' शब्द संस्कृत के दो शब्दों—'पंच' (पाँच) और 'अंग' (अवयव) से मिलकर बना है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर के पाँच मुख्य अंग होते हैं, उसी प्रकार काल-पुरुष के पांच प्रमुख अंग हैं:
- १. तिथि (Tithi): सूर्य और चंद्रमा के बीच के १२ अंश (Degrees) के कोणीय अंतर को एक तिथि कहा जाता है। एक चंद्र मास में ३० तिथियां होती हैं (१५ शुक्ल पक्ष और १५ कृष्ण पक्ष)। तिथि व्यक्ति के मानसिक संकल्प और ऊर्जा को नियंत्रित करती है।
- २. वार (Vara): एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक का समय 'वार' या दिन कहलाता है। सातों वारों के स्वामी क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि हैं। वार शरीर के स्वास्थ्य और जीवन शक्ति को प्रभावित करता है।
- ३. नक्षत्र (Nakshatra): क्रांतिवृत्त (Ecliptic) के ३६० अंशों को २७ बराबर भागों में बांटा गया है। प्रत्येक भाग १३ अंश २० कला का होता है, जिसे नक्षत्र कहते हैं। नक्षत्र मनुष्य के अवचेतन मन और प्रारब्ध को दिशा देता है।
- ४. योग (Yoga): सूर्य और चंद्रमा के स्पष्ट भोगांशों के योग को १३ अंश २० कला से भाग देने पर २७ प्रकार के योग प्राप्त होते हैं। योग का प्रभाव जीवन के संबंधों और मानसिक शांति पर पड़ता है।
- ५. करण (Karana): एक तिथि के आधे भाग (६ अंश) को करण कहते हैं। एक माह में ६० करण होते हैं। करण व्यक्ति की कार्यकुशलता, व्यापार और कर्मफल को निर्धारित करता है।
२. द्रिक गणितीय सूर्य-सिद्धांत का खगोलीय आधार
भक्तिलोक पंचांग आधुनिक नासा (NASA) एफिमरिस और प्राचीन सूर्य-सिद्धांत के द्रिक-प्रत्यक्ष खगोलीय सूत्रों पर आधारित है। इसमें स्थानीय अक्षांश (Latitude) और देशांतर (Longitude) के आधार पर प्रत्येक नगर के लिए सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और ग्रहों के स्पष्ट गोचर की सेकंड-दर-सेकंड गणना की जाती है।
३. राहुकाल और शुभ मुहूर्त में भेद
दिन के आठवें भाग को राहुकाल कहा जाता है। खगोल शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य की किरणों में कॉस्मिक किरणों का असंतुलन होता है, उस समय नवीन कार्यों की शुरुआत में असफलता की संभावना बढ़ जाती है। वहीं अभिजित मुहूर्त को समस्त दोषों का निवारक माना गया है, जिसमें किया गया कार्य सदा सफल होता है।
यह पंचांग वैदिक पंचांग मंडल द्वारा उपलब्ध प्रामाणिक ज्योतिषीय संहिताओं, धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु एवं द्रिक खगोलीय गणनाओं के आधार पर दैनिक रूप से सत्यापित किया जाता है। स्थानीय सूर्योदय के अनुसार सूक्ष्म अंतर स्वाभाविक है।