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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · 24 श्लोक

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)

सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) प्रवृत्तियों का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति देने वाली है और आसुरी संपत्ति बंधन का कारण।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. अध्याय संक्षिप्त परिचय (Introduction)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन अध्याय का शीर्षक "दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)" है। यह अध्याय कर्म, भक्ति और ज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों का एक उत्कृष्ट समन्वय है।

अध्याय संदेश

सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) प्रवृत्तियों का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति देने वाली है और आसुरी संपत्ति बंधन का कारण।

२. अध्याय के पावन श्लोक (Gita Shlokas)

प्रत्येक श्लोक को उसके मूल देवनागरी पाठ और हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद के साथ नीचे सूचीबद्ध किया गया है।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || २१||


हिंदी अनुवाद: “यह तीन प्रकार का नरक का द्वार आत्मा का नाश करने वाला है – काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।”

English Translation: There are three gates leading to this hell—lust, anger and greed. Every sane man should give these up, for they lead to the degradation of the soul.

एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: | आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् || २२||


हिंदी अनुवाद: “हे कौन्तेय! जो मनुष्य इन तीन अन्धकार के द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और तत्पश्चात परम गति को प्राप्त होता है।”

English Translation: One who is freed from these three gates of darkness, O son of Kunti, practices what is good for him and thus attains the supreme goal.

य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: | न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || २३||


हिंदी अनुवाद: “जो शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।”

English Translation: He who discards scriptural injunctions and acts according to his own whims attains neither perfection, nor happiness, nor the supreme goal.

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ | ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || २४||


हिंदी अनुवाद: “इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही तेरा प्रमाण है। शास्त्रविधि द्वारा कहे हुए कर्म को जानकर ही तू यहाँ (इस लोक में) करने योग्य है।”

English Translation: Therefore, let the scriptures be your authority in determining what should be done and what should not be done. You should perform actions in this world knowing what has been enjoined by the scriptures.

श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।