श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 24

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 30 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ | ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || २४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
तस्मात्
इसलिए
शास्त्रम्
शास्त्र
प्रमाणम्
प्रमाण
ते
तेरे लिए
कार्याकार्यव्यवस्थितौ
कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में
ज्ञात्वा
जानकर
शास्त्रविधानोक्तम्
शास्त्रविधि से कहे हुए
कर्म
कर्म
कर्तुम्
करने के लिए
इह
इस लोक में
अर्हसि
तू योग्य है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही तेरा प्रमाण है। शास्त्रविधि द्वारा कहे हुए कर्म को जानकर ही तू यहाँ (इस लोक में) करने योग्य है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का यह 16वां अध्याय, जिसे 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' के नाम से जाना जाता है, मानव जीवन के दो ध्रुवों—दैवी प्रवृत्तियों और आसुरी प्रवृत्तियों—का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। अध्याय के अंतिम श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश देते हैं। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए एक 'नैतिक दिशा-सूचक' (Moral Compass) है।

ब्रह्मांडीय दृष्टि से देखें तो सृष्टि एक निश्चित व्यवस्था (Cosmic Order/Rta) से बंधी है। जब मनुष्य अपनी मनमानी इच्छाओं और अहंकार के वशीभूत होकर कर्म करता है, तो वह इस व्यवस्था से कट जाता है, जिससे दुख और पतन का जन्म होता है। 'शास्त्र' शब्द का अर्थ केवल पुस्तक नहीं, बल्कि 'शासन' करने वाला—अर्थात वह दिव्य ज्ञान जो हमारे चित्त को अनुशासित करता है। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जब भी जीवन के चौराहे पर 'क्या करें' और 'क्या न करें' का द्वंद्व उत्पन्न हो, तब बुद्धि को तर्क के बजाय शास्त्रों के प्रकाश में रखना चाहिए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शास्त्र ही वह दर्पण है जिसमें हम अपने कर्मों की शुद्धि देख सकते हैं। यह श्लोक उन लोगों के लिए एक सुरक्षा कवच है जो भ्रमित हैं, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि धर्म का मार्ग व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं, बल्कि सार्वभौमिक सत्य के पालन का मार्ग है। इसका सांस्कृतिक महत्व यह है कि यह भारतीय परंपरा में 'प्रमाण' की महत्ता को स्थापित करता है, जहाँ गुरु-परंपरा और वेदों की आज्ञा को सर्वोपरि माना गया है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ |
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || २४||

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय 'तस्मात्' पर अनुनासिक ध्वनि का ध्यान रखें। 'शास्त्रं' शब्द का उच्चारण करते समय शकार (श) की स्पष्टता आवश्यक है। इसे शांत चित्त होकर, रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर, किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व या निर्णय लेने की दुविधा के समय तीन बार मनन करना चाहिए। यह श्लोक हमें 'धर्म-संशय' से मुक्ति दिलाने वाला महामंत्र है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तस्मात्इसलिएअहंकार और आसुरी प्रवृत्तियों के त्याग के पश्चात।
शास्त्रंशास्त्रवेदों और उपनिषदों का वह ज्ञान जो पथ प्रदर्शक है।
प्रमाणंप्रमाणनिर्णय लेने का एकमात्र आधार या कसौटी।
तेतुम्हारे लिएअर्जुन के माध्यम से समस्त मानव जाति के लिए।
कार्याकार्यक्या करना और क्या नहींकर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक।
व्यवस्थितौव्यवस्था मेंजीवन के अनुशासन और संतुलन को बनाए रखने में।
ज्ञात्वाजानकरशास्त्रों के मर्म को समझकर।
शास्त्रविधानोक्तंशास्त्रों द्वारा कथितविधि-विधान के अनुसार निर्धारित कर्म।
कर्मकार्यनिष्काम भाव से किया गया कर्तव्य।
कर्तुमिहार्हसिकरना ही उचित हैयही मनुष्य का परम धर्म है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में, जहाँ अर्जुन विषाद और मोह के गहरे सागर में डूबे हुए थे, भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन के गूढ़ रहस्यों का उपदेश दिया। 16वें अध्याय में भगवान ने दैवी और आसुरी संपदा का वर्णन किया है। यह अध्याय इस बात पर केंद्रित है कि मनुष्य का स्वभाव ही उसके कर्मों को निर्धारित करता है।

पौराणिक संदर्भ में, शास्त्र का अर्थ केवल वेदों तक सीमित नहीं है। इसमें स्मृतियाँ, पुराण और धर्मशास्त्र भी सम्मिलित हैं। जब अर्जुन ने पूछा कि जो लोग शास्त्रों को नहीं जानते लेकिन श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनका क्या होता है, तब भगवान ने 17वें अध्याय की भूमिका के रूप में इस श्लोक को रखा। यह श्लोक 'धर्म' की परिभाषा को स्पष्ट करता है। रामायण में भी हम देखते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने सदैव 'शास्त्र' और 'कुल-परंपरा' को प्रमाण माना। जब उन्हें वनवास मिला, तो उन्होंने अपने पिता के वचन को शास्त्र-सम्मत मानकर स्वीकार किया। यही वह आधार है जो एक साधारण मनुष्य को 'महापुरुष' बनाता है। महाभारत के युद्ध में भी, जब धर्मसंकट उपस्थित हुआ, तब भी पांडवों ने सदैव कृष्ण के वचनों को—जो स्वयं वेदों का सार हैं—प्रमाण मानकर कार्य किया। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन में जब भी हम 'स्वार्थ' और 'परमार्थ' के बीच खड़े हों, तो शास्त्र ही वह एकमात्र तटस्थ न्यायाधीश है जो हमें सही मार्ग दिखा सकता है। यह श्लोक केवल एक आज्ञा नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच है जो हमें अधर्म के दलदल में फंसने से बचाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • निर्णय लेने की क्षमता: नियमित पाठ से मन की दुविधा समाप्त होती है और सही निर्णय लेने की बुद्धि (विवेक) जागृत होती है।
  • मानसिक शांति: शास्त्र के मार्ग पर चलने से मन में 'क्या सही है, क्या गलत' का तनाव समाप्त हो जाता है।
  • अहंकार का नाश: अपनी बुद्धि को शास्त्रों के अधीन करने से अहंकार का शमन होता है और विनम्रता आती है।
  • कर्म शुद्धि: यह श्लोक हमें सकाम कर्मों से हटाकर निष्काम कर्म की ओर प्रेरित करता है, जिससे कर्म बंधन कटते हैं।
  • दैवी संपदा का विकास: शास्त्रानुसार आचरण करने से व्यक्ति में निर्भयता, दान और तप जैसे दैवी गुणों का उदय होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: शास्त्रों के शब्दों में दिव्य स्पंदन होता है, जो आसपास के वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाता है।
  • आध्यात्मिक सुरक्षा: यह श्लोक आसुरी प्रवृत्तियों के प्रभाव से साधक की रक्षा करता है।
  • ईश्वरीय कृपा: जो शास्त्र को प्रमाण मानता है, उस पर भगवान की विशेष कृपा दृष्टि बनी रहती है, क्योंकि वह स्वयं को ईश्वर की व्यवस्था के प्रति समर्पित कर देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य कृत गीता भाष्य और आधुनिक आध्यात्मिक व्याख्याओं के समन्वय से तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत अर्थ और भावार्थ वेदों की परंपरा और महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे इसे केवल एक मार्गदर्शिका के रूप में लें और अपने जीवन में शास्त्रों के अध्ययन को निरंतर बनाए रखें। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि विवेकपूर्ण धर्म-पालन का समर्थन करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, शास्त्र शाश्वत हैं। भौतिक विज्ञान बदल सकता है, लेकिन मानव स्वभाव, दुख, सुख और नैतिकता के सिद्धांत वही हैं। शास्त्र हमें 'कैसे जीना है' (Art of Living) सिखाते हैं, जो किसी भी युग में पुराना नहीं होता।

शास्त्रों का अर्थ केवल बाहरी कर्मकांड नहीं है। यदि कहीं मतभेद लगे, तो इसका अर्थ है कि हमें उस शास्त्र के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए किसी योग्य गुरु या विद्वान का मार्गदर्शन लेना चाहिए। सत्य कभी भी तर्क के विरुद्ध नहीं होता।

पाप का अर्थ है 'अज्ञानवश किया गया गलत कार्य'। जब आप इस श्लोक का पाठ करते हैं और इसके अर्थ को जीवन में उतारते हैं, तो आप गलत कार्य करना बंद कर देते हैं। यही वास्तविक प्रायश्चित और पाप-मुक्ति है।

इसका अर्थ है—अपने कर्तव्य का पालन करना, सत्य बोलना, अहिंसा का पालन करना और दूसरों के प्रति करुणा रखना। शास्त्र हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर लोक-कल्याण के लिए कार्य करने का निर्देश देते हैं।

बिल्कुल नहीं। यह श्लोक अर्जुन के लिए कहा गया था, जो एक गृहस्थ और योद्धा थे। यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो समाज में रहकर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर रहा है।

... (अतिरिक्त आध्यात्मिक चिंतन) ...

शास्त्रों की महत्ता को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि 'शास्त्र' शब्द 'शास' धातु से बना है, जिसका अर्थ है अनुशासन। जिस प्रकार एक संगीतज्ञ संगीत के नियमों (सुर और ताल) का पालन करके ही मधुर संगीत उत्पन्न कर सकता है, उसी प्रकार मनुष्य जीवन के नियमों (शास्त्रों) का पालन करके ही जीवन में आनंद और शांति का संगीत उत्पन्न कर सकता है। यदि हम नियमों को तोड़ते हैं, तो जीवन में केवल कोलाहल और दुख ही शेष रहता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह श्लोक इसलिए दिया क्योंकि वे जानते थे कि युद्ध के बाद अर्जुन के मन में कई नैतिक प्रश्न उठेंगे। उन प्रश्नों का समाधान केवल शास्त्रों के पास था।

आज के दौर में, जहाँ सूचनाओं की भरमार है, मनुष्य भ्रमित है। सोशल मीडिया, इंटरनेट और बाहरी प्रभाव हमें हर पल गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में 'शास्त्र' एक स्थिर ध्रुव तारे की तरह है। जब हम कहते हैं कि 'शास्त्र को प्रमाण मानो', तो हम वास्तव में अपनी बुद्धि को उस उच्चतर चेतना के साथ जोड़ रहे हैं जो ऋषियों ने तपस्या के माध्यम से प्राप्त की थी। यह कोई बंधन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता है। यह हमें उन बंधनों से मुक्त करता है जो हमारे अपने गलत निर्णयों के कारण पैदा हुए हैं।

अतः, हे साधक, इस श्लोक को अपने हृदय में धारण करें। जब भी आप किसी निर्णय के प्रति अनिश्चित हों, तो स्वयं से पूछें—क्या यह कार्य शास्त्र-सम्मत है? क्या यह कार्य मेरे और समाज के कल्याण के लिए है? यदि उत्तर 'हाँ' है, तो निडर होकर आगे बढ़ें। यही गीता का सार है और यही जीवन की सफलता का एकमात्र मार्ग है। निरंतर अभ्यास, स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से हम इस श्लोक के अर्थ को अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं।

अंत में, यह स्मरण रखना आवश्यक है कि शास्त्र का अर्थ केवल पढ़ना नहीं, बल्कि उसे 'जीना' है। एक ज्ञानी वह नहीं जो बहुत कुछ जानता है, बल्कि वह है जो अपने ज्ञान को अपने आचरण में उतारता है। भगवान श्रीकृष्ण का यह अंतिम उपदेश हमें एक पूर्ण मानव बनने की प्रेरणा देता है। दैवी संपदा को अपनाएं, आसुरी प्रवृत्तियों का त्याग करें और शास्त्रों के प्रकाश में अपने जीवन की यात्रा को सफल बनाएं। ॐ तत्सत्।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही तेरा प्रमाण है। शास्त्रविधि द्वारा बताए गए कर्म को जानकर ही तू यहाँ कर्म करने योग्य है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शास्त्र ही धर्म का मूल है। उनके अनुसार चलने वाला ही जीवन में सफल होता है और मोक्ष का अधिकारी बनता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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