दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 23
श्लोक २३ में कहा गया कि शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण करने वाला न सिद्धि, न सुख, न परमगति पाता है।
संस्कृत श्लोक
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: | न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || २३||
yaḥ śāstra-vidhim utsṛjya vartate kāma-kārataḥ | na sa siddhim avāpnoti na sukhaṃ na parāṃ gatim ||23||
पदच्छेद / शब्दार्थ
य: जो; शास्त्रविधिम्: शास्त्र की विधि को; उत्सृज्य: त्यागकर; वर्तते: बर्तता है; कामकारत: मनमाना आचरण करते हुए; न: नहीं; स: वह; सिद्धिम्: सिद्धि को; अवाप्नोति: प्राप्त होता; न: नहीं; सुखम्: सुख; न: नहीं; पराम्: परम; गतिम्: गति को।
हिंदी अनुवाद
जो शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।
English Translation
He who discards scriptural injunctions and acts according to his own whims attains neither perfection, nor happiness, nor the supreme goal.
टीका / Commentary
शास्त्र विधि का पालन किए बिना स्वेच्छाचारी बनने वाला व्यक्ति न तो सफल होता है, न सुखी, न मोक्ष पाता है।