श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 23

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 26 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: | न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || २३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
य
जो
शास्त्रविधिम्
शास्त्र की विधि को
उत्सृज्य
त्यागकर
वर्तते
बर्तता है
कामकारत
मनमाना आचरण करते हुए
न
नहीं
स
वह
सिद्धिम्
सिद्धि को
अवाप्नोति
प्राप्त होता
न
नहीं
सुखम्
सुख
न
नहीं
पराम्
परम
गतिम्
गति को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का १६वां अध्याय 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने उन गुणों का वर्णन किया है जो मनुष्य को दिव्य प्रकृति की ओर ले जाते हैं और उन प्रवृत्तियों का भी, जो उसे आसुरी मार्ग पर धकेलती हैं। प्रस्तुत श्लोक (१६.२३) गीता के उन अत्यंत महत्वपूर्ण उपदेशों में से एक है, जो मानव जीवन की सफलता के आधारभूत स्तंभ 'शास्त्र-अनुशासन' को परिभाषित करता है।

ब्रह्मांड एक सुव्यवस्थित तंत्र है, जो ऋत (Cosmic Order) के नियमों से संचालित होता है। जिस प्रकार एक यंत्र अपने निर्माता द्वारा दिए गए निर्देशों (Manual) के बिना कार्य करने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मानव जीवन भी यदि शास्त्रों द्वारा निर्धारित मर्यादाओं का उल्लंघन करता है, तो वह अपने लक्ष्य से भटक जाता है। शास्त्र केवल पुस्तकें नहीं हैं, बल्कि वे ऋषि-मुनियों के तप, अनुभव और दिव्य दृष्टि का निचोड़ हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी तुच्छ इच्छाओं (कामकारतः) के वशीभूत होकर इन शाश्वत नियमों को त्याग देता है, तो वह स्वयं को ब्रह्मांडीय व्यवस्था से काट लेता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, भारतीय सनातन परंपरा में 'शास्त्र' का अर्थ है 'शासन करने वाला'। यह अनुशासन ही मनुष्य को पशुत्व से उठाकर देवत्व की ओर ले जाता है। इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह स्पष्ट करता है कि केवल कर्म करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्म का 'विधि-विधान' के अनुसार होना अनिवार्य है। जो व्यक्ति स्वेच्छाचारिता को ही स्वतंत्रता समझ बैठता है, वह वास्तव में अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त करता है। यह श्लोक हमें आत्म-संयम, विनम्रता और श्रद्धा के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है, ताकि हम न केवल भौतिक सफलता प्राप्त करें, बल्कि परम गति (मोक्ष) के अधिकारी भी बन सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'य:' (यः) में विसर्ग का उच्चारण 'ह' की तरह करें। 'शास्त्रविधिमुत्सृज्य' में संधि का ध्यान रखें। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में है, अतः इसे लयबद्ध तरीके से गाना मन को एकाग्र करने में अत्यंत सहायक होता है। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात, शांत चित्त होकर इस श्लोक का तीन बार पाठ करने से व्यक्ति के भीतर अनुशासन के प्रति श्रद्धा जागृत होती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हमारी इच्छाएं यदि शास्त्रों के प्रकाश में नहीं हैं, तो वे केवल बंधन का कारण हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
य:जोवह जीव जो स्वयं को कर्ता मानता है।
शास्त्रविधिम्शास्त्रों के विधानवेदों और स्मृतियों द्वारा निर्धारित आचार संहिता।
उत्सृज्यत्याग करअहंकारवश नियमों को तुच्छ समझना।
वर्ततेआचरण करता हैअपने जीवन की दिनचर्या को ढालना।
कामकारत:अपनी इच्छा सेस्वार्थ, वासना और मनमानी का दास होना।
न स सिद्धिमवह सिद्धि नहींयोग, तप या कर्म की पूर्णता का अभाव।
अवाप्नोतिप्राप्त करता हैसफलता का द्वार बंद हो जाना।
न सुखम्न सुखआंतरिक शांति और संतोष का अभाव।
न परां गतिम्न परम गतिमोक्ष या भगवत्प्राप्ति का मार्ग अवरुद्ध होना।

इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि 'कामकारतः' (मनमानी) ही पतन का मूल कारण है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों के अधीन होकर कार्य करता है, तो वह 'सिद्धि' (सफलता) से वंचित रह जाता है। यहाँ सिद्धि का अर्थ केवल भौतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार है। सुख का अर्थ केवल इंद्रिय-भोग नहीं, बल्कि वह आनंद है जो शास्त्र-सम्मत जीवन जीने से मिलता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। महाभारत के युद्ध से पूर्व, जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहे थे, तब भगवान ने उन्हें 'शास्त्र' के महत्व को समझाया। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि रावण, दुर्योधन और कंस जैसे पात्रों का पतन केवल इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने 'शास्त्रविधि' को 'कामकारतः' (अपनी इच्छा) के लिए त्याग दिया था।

वेदों में 'ऋत' की अवधारणा है, जो ब्रह्मांड के नैतिक और भौतिक नियमों का समूह है। शास्त्र इसी ऋत का मानवीय संस्करण हैं। जब विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर नवीन सृष्टि रचने का प्रयास किया, तो वह भी एक प्रकार का 'शास्त्र-उल्लंघन' था, जिसे बाद में उन्होंने अपनी भूल स्वीकार कर सुधारा। इसी प्रकार, राजा वेन का उदाहरण भी हमारे शास्त्रों में मिलता है, जिन्होंने वेदों और धर्म के नियमों को मानने से इनकार कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप राज्य में अराजकता फैल गई।

महाभारत का युद्ध केवल दो परिवारों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह 'धर्म' (शास्त्र) और 'अधर्म' (स्वेच्छाचारिता) के बीच का महासंग्राम था। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति शास्त्रों को नहीं मानता, वह न तो इस लोक में सुखी रह सकता है और न ही परलोक में। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारी स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। शास्त्र हमें वह दिशा प्रदान करते हैं जहाँ हमारी व्यक्तिगत इच्छाएं ब्रह्मांडीय कल्याण के साथ एकाकार हो जाती हैं। अतः, शास्त्रों का अध्ययन और उनका पालन करना किसी बंधन में पड़ना नहीं, बल्कि अपनी चेतना को मुक्त करना है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्पष्टता: शास्त्रों के प्रति श्रद्धा रखने से मन में उठने वाले द्वंद्व समाप्त होते हैं और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • अहंकार का शमन: 'कामकारतः' का त्याग करने से व्यक्ति का अहंकार कम होता है, जिससे वह विनम्र बनता है।
  • कर्म की शुद्धि: जब हम शास्त्र-विधि से कार्य करते हैं, तो हमारे कर्म निष्काम भाव की ओर अग्रसर होते हैं।
  • सकारात्मक आभा (Aura): अनुशासनबद्ध जीवन जीने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक दिव्य तेज और शांति का संचार होता है।
  • तनाव से मुक्ति: स्वेच्छाचारिता से उत्पन्न होने वाली चिंताएं और भय समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि व्यक्ति ईश्वर के विधान पर भरोसा करता है।
  • दैवीय कृपा: जो शास्त्र-मर्यादा का पालन करता है, उस पर ईश्वर की विशेष कृपा बनी रहती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह श्लोक साधक को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक अनुशासन प्रदान करता है।
  • सामाजिक सामंजस्य: शास्त्र-सम्मत आचरण करने वाला व्यक्ति समाज में मर्यादा और शांति स्थापित करने में सहायक होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के १६वें अध्याय के २३वें श्लोक पर आधारित है। हमने इसे प्रामाणिक भाष्यों, जैसे कि शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के गीता-भाष्य के संदर्भों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र-मर्यादा के महत्व से अवगत कराना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि वेदों और उपनिषदों के तार्किक और आध्यात्मिक आधार को प्रस्तुत करती है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक लेख के रूप में न देखें, बल्कि इसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, बिल्कुल। शास्त्र-विधि का अर्थ केवल प्राचीन कर्मकांड नहीं है, बल्कि सत्य, अहिंसा, संयम और कर्तव्य-परायणता जैसे शाश्वत मूल्यों का पालन करना है। आधुनिक जीवन में भी हम अपने कार्यों को ईमानदारी और नैतिकता के साथ करके शास्त्र-विधि का पालन कर सकते हैं।

कामकारतः का अर्थ है 'अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करना'। जब कोई व्यक्ति बिना किसी नैतिक या आध्यात्मिक आधार के केवल अपनी इंद्रिय-तृप्ति के लिए कार्य करता है, तो उसे कामकारतः कहा जाता है। यह व्यक्ति को स्वार्थी और अशांत बनाता है।

सिद्धि का अर्थ है कार्य की पूर्णता और आत्मिक सफलता। यह तब प्राप्त होती है जब हमारे कर्म शास्त्र-सम्मत हों और हम फल की इच्छा का त्याग करके ईश्वर को समर्पित होकर कार्य करें।

निश्चित रूप से। शास्त्र-विधि हमें संयम सिखाती है। जब हम अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं, तो हमें वह आंतरिक सुख प्राप्त होता है जो बाह्य वस्तुओं से नहीं मिल सकता।

परम गति का अर्थ है मोक्ष, यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और ईश्वर के धाम की प्राप्ति। यह जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है, जो केवल शास्त्र-सम्मत और धर्मनिष्ठ जीवन जीने से ही संभव है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो शास्त्र की विधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख, न परम गति।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शास्त्र हमारे जीवन के मार्गदर्शक हैं। उनकी अवहेलना करने पर जीवन निष्फल हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/24 96% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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