दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 22

श्लोक २२ में बताया गया कि काम, क्रोध, लोभ से मुक्त व्यक्ति कल्याण कर परम गति को जाता है।

संस्कृत श्लोक

एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: | आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् || २२||

etair vimuktaḥ kaunteya tamo-dvārais tribhir naraḥ | ācaraty ātmanaḥ śreyas tato yāti parāṃ gatim ||22||

पदच्छेद / शब्दार्थ

एतै: इनसे; विमुक्त: मुक्त; कौन्तेय: हे कौन्तेय; तमोद्वारै: अन्धकार के द्वारों से; त्रिभि: तीन; नर: मनुष्य; आचरति: आचरण करता है; आत्मन: अपने लिए; श्रेय: कल्याण; तत: तदनन्तर; याति: जाता है; पराम्: परम; गतिम्: गति को।

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! जो मनुष्य इन तीन अन्धकार के द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और तत्पश्चात परम गति को प्राप्त होता है।

English Translation

One who is freed from these three gates of darkness, O son of Kunti, practices what is good for him and thus attains the supreme goal.

टीका / Commentary

जो काम, क्रोध, लोभ से मुक्त हो जाता है, वह अपना कल्याण कर पाता है और अंत में परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है।