श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 21

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 20 मिनट का पठन 138 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || २१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
त्रिविधम्
तीन प्रकार का
नरकस्य
नरक का
इदम्
यह
द्वारम्
द्वार
नाशनम्
नाश करने वाला
आत्मन
आत्मा का
काम
काम
क्रोध
क्रोध
तथा
तथा
लोभ
लोभ
तस्मात्
इसलिए
एतत्
इस
त्रयम्
तीनों को
त्यजेत्
त्याग देना चाहिए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह तीन प्रकार का नरक का द्वार आत्मा का नाश करने वाला है – काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: - आध्यात्मिक विवेचन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के ग्रंथों में श्रीमद्भगवद्गीता को 'उपनिषदों का सार' माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश केवल कुरुक्षेत्र के मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के प्रत्येक क्षण के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ है। जब हम 'त्रिविधं नरकस्येदं' श्लोक का चिंतन करते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि नरक कोई भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक मानसिक और आत्मिक अवस्था है।

काम, क्रोध और लोभ—ये तीन ऐसे शत्रु हैं जो मनुष्य की विवेक शक्ति को ढंक लेते हैं। जिस प्रकार बादलों के आवरण से सूर्य का प्रकाश मंद पड़ जाता है, उसी प्रकार इन तीन दुर्गुणों के कारण आत्मा का दिव्य प्रकाश धूमिल हो जाता है। ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से, मनुष्य 'सत्व', 'रज' और 'तम' गुणों के मिश्रण से बना है। जब 'रज' और 'तम' का असंतुलन बढ़ता है, तो काम (अति-इच्छा), क्रोध (अति-आवेश) और लोभ (अति-संग्रह) का जन्म होता है। ये तीनों नरक के द्वार हैं क्योंकि ये मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप—'सच्चिदानंद'—से दूर ले जाते हैं। इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें आत्म-निरीक्षण (Self-Introspection) की प्रेरणा देता है। यदि हम अपने भीतर के इन तीन द्वारों को बंद कर लें, तो मोक्ष का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है। यह श्लोक न केवल चेतावनी है, बल्कि एक आध्यात्मिक औषधि भी है जो हमें पतन के गर्त से उठाकर उत्थान के शिखर तक ले जाने में सक्षम है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: |
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || २१||


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'त्रिविधं' (Tri-vidham) का उच्चारण स्पष्ट करें। यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के १६वें अध्याय (दैवासुरसंपद्विभागयोग) का २१वां श्लोक है। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके इसका तीन बार पाठ करने से मानसिक विकारों को दूर करने की प्रेरणा मिलती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
त्रिविधंतीन प्रकार कात्रिगुणात्मक माया का प्रभाव।
नरकस्यनरक काअधोगति या आत्मिक पतन की स्थिति।
द्वारंद्वारप्रवेश मार्ग, जहाँ से अज्ञानता प्रवेश करती है।
नाशनम्नाश करने वालाविवेक और आत्म-ज्ञान का विनाशक।
आत्मन:आत्मा कास्वयं का, जीवात्मा का।
काम:कामना/वासनाअतृप्त इच्छाओं का सागर।
क्रोध:क्रोधइच्छा में बाधा आने पर उत्पन्न अग्नि।
लोभ:लालचसंग्रह की कभी न मिटने वाली वृत्ति।
तस्मात्इसलिएसावधानी और निर्णय का संकेत।
त्यजेत्त्याग देना चाहिएपूर्ण समर्पण और वैराग्य का आह्वान।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के युद्ध के समय, जब अर्जुन विषाद में डूबे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों के बीच का अंतर समझाया। यह श्लोक उसी श्रृंखला का हिस्सा है। पौराणिक कथाओं में काम, क्रोध और लोभ को 'त्रि-शूल' कहा गया है जो मनुष्य को संसार के चक्र में बांधे रखते हैं।

पुराणों में हिरण्यकश्यप का उदाहरण लें, तो उसका 'काम' (अहंकार) और 'क्रोध' ही उसके विनाश का कारण बना। रामायण में रावण का 'लोभ' (सीता हरण की इच्छा) उसके पूरे कुल के विनाश का कारण बना। ये कथाएं हमें सिखाती हैं कि इन तीन द्वारों को खुला छोड़ने का परिणाम कितना भयानक हो सकता है। वेदों में भी 'अग्नि' को शुद्ध करने वाला माना गया है, लेकिन जब यही अग्नि 'क्रोध' का रूप लेती है, तो वह स्वयं को ही जला देती है। महर्षि व्यास ने गीता के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य की आत्मा शुद्ध है, लेकिन इन तीन द्वारों के माध्यम से आने वाली अशुद्धियां उसे मलिन कर देती हैं। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है जो सदियों से ऋषियों द्वारा अनुभूत सत्य पर आधारित है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-नियंत्रण (Self-Control): नियमित चिंतन से इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
  • मानसिक शांति: क्रोध और लोभ के त्याग से मन में एक अद्भुत स्थिरता और शांति का अनुभव होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इन दुर्गुणों के त्याग से व्यक्ति के व्यक्तित्व में सात्विक तेज और ओज की वृद्धि होती है।
  • कर्म शुद्धि: जब कामनाएं कम होती हैं, तो कर्म निष्काम भाव से होने लगते हैं, जिससे कर्म बंधन कटते हैं।
  • विवेक जागृति: सही और गलत के बीच भेद करने की बुद्धि (विवेक) तीव्र होती है।
  • तनाव मुक्ति: अधिकांश मानसिक तनाव इच्छाओं की पूर्ति न होने से उत्पन्न होते हैं; इस श्लोक का अभ्यास तनाव को जड़ से मिटाता है।
  • दैवीय कृपा: भगवान श्रीकृष्ण का यह वचन हृदय में धारण करने से भक्त को दैवी गुणों की प्राप्ति होती है।
  • अहंकार का नाश: लोभ का त्याग करने से व्यक्ति 'अहं' से 'वयं' की ओर बढ़ता है, जो आध्यात्मिक उन्नति का आधार है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों और आचार्य शंकर तथा स्वामी विवेकानंद के भाष्य के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत ज्ञान प्रदान करना है। यह व्याख्या गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों के संदर्भों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, ताकि भक्तगण बिना किसी संशय के इसका लाभ उठा सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

पूर्णतः समाप्त करना एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था है। सामान्य मनुष्य के लिए इन्हें 'नियंत्रित' करना और इनका 'रूपांतरण' करना ही प्रथम चरण है।

जब ये धर्म के विरुद्ध होते हैं, तब ये नरक के द्वार हैं। यदि काम (ईश्वर प्राप्ति की इच्छा), क्रोध (अधर्म पर क्रोध) और लोभ (ज्ञान प्राप्ति का लोभ) के रूप में हों, तो वे साधक के लिए सहायक हो सकते हैं।

जब भी मन में तीव्र इच्छा, क्रोध या लालच आए, तो स्वयं को याद दिलाएं कि यह 'नरक का द्वार' है। यह जागरूकता ही आपको उस क्षण में रुकने की शक्ति देगी।

बिल्कुल नहीं। यह गृहस्थों के लिए अधिक आवश्यक है, क्योंकि वे संसार के बीच रहकर इन विकारों का सामना सबसे अधिक करते हैं।

नरक का अर्थ है—दुःख, अशांति और पतन। जो मार्ग हमें शांति से दूर ले जाए और पतन की ओर धकेले, वही नरक का द्वार है।

© 2023 Bhaktilok.in - आध्यात्मिक ज्ञान का पावन स्रोत

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यह तीन प्रकार का नरक का द्वार (काम, क्रोध, लोभ) आत्मा का नाश करने वाला है। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

काम, क्रोध और लोभ मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। इनसे मुक्त होना ही कल्याण का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 21 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 21/24 88% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!