दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 21
श्लोक २१ में काम, क्रोध और लोभ को नरक के तीन द्वार बताया गया है, जिन्हें त्यागना चाहिए।
संस्कृत श्लोक
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || २१||
tri-vidhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanam ātmanaḥ | kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṃ tyajet ||21||
पदच्छेद / शब्दार्थ
त्रिविधम्: तीन प्रकार का; नरकस्य: नरक का; इदम्: यह; द्वारम्: द्वार; नाशनम्: नाश करने वाला; आत्मन: आत्मा का; काम: काम; क्रोध: क्रोध; तथा: तथा; लोभ: लोभ; तस्मात्: इसलिए; एतत्: इस; त्रयम्: तीनों को; त्यजेत्: त्याग देना चाहिए।
हिंदी अनुवाद
यह तीन प्रकार का नरक का द्वार आत्मा का नाश करने वाला है – काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
English Translation
There are three gates leading to this hell—lust, anger and greed. Every sane man should give these up, for they lead to the degradation of the soul.
टीका / Commentary
भगवान तीन घोर दुर्गुण बताते हैं – काम, क्रोध, लोभ। ये नरक के द्वार हैं और आत्मा का पतन करते हैं। इन्हें त्यागना आवश्यक है।