दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 20
श्लोक २० में कहा गया कि आसुरी योनियों में जन्म लेने वाले मूढ़ ईश्वर को न पाकर अधम गति को प्राप्त होते हैं।
संस्कृत श्लोक
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि | मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् || २०||
āsurīṃ yonim āpannā mūḍhā janmani janmani | mām aprāpyaiva kaunteya tato yānty adhamāṃ gatim ||20||
पदच्छेद / शब्दार्थ
आसुरीम्: आसुरी; योनिम्: योनि को; आपन्ना: प्राप्त हुए; मूढा: मूढ़; जन्मनि जन्मनि: जन्म-जन्म में; माम्: मुझको; अप्राप्य: न पाकर; एव: ही; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; तत: उससे; यान्ति: जाते हैं; अधमाम्: अधम; गतिम्: गति को।
हिंदी अनुवाद
हे कौन्तेय! वे मूढ़ जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होकर मुझे नहीं पाते, और तदनन्तर उससे भी अधम गति को चले जाते हैं।
English Translation
Attaining birth in demoniac species again and again, O son of Kunti, such foolish persons never reach Me and gradually sink to the most abominable condition.
टीका / Commentary
आसुरी योनियों में जन्म लेने वाले मूढ़ जीव ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते और क्रमशः अधोगति को प्राप्त होते जाते हैं।