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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 20

अध्याय 16 · श्लोक 20

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि | मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् || २०||

āsurīṃ yonim āpannā mūḍhā janmani janmani | mām aprāpyaiva kaunteya tato yānty adhamāṃ gatim ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

आसुरीम्: आसुरी; योनिम्: योनि को; आपन्ना: प्राप्त हुए; मूढा: मूढ़; जन्मनि जन्मनि: जन्म-जन्म में; माम्: मुझको; अप्राप्य: न पाकर; एव: ही; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; तत: उससे; यान्ति: जाते हैं; अधमाम्: अधम; गतिम्: गति को।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! वे मूढ़ जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होकर मुझे नहीं पाते, और तदनन्तर उससे भी अधम गति को चले जाते हैं।

English Translation

Attaining birth in demoniac species again and again, O son of Kunti, such foolish persons never reach Me and gradually sink to the most abominable condition.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी योनियों में जन्म लेने वाले मूढ़ जीव ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते और क्रमशः अधोगति को प्राप्त होते जाते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।