सभी अध्याय अध्याय 8 | 28 श्लोक

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)

आठवें अध्याय में अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर में श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ की परिभाषा देते हैं। साथ ही, मृत्यु के समय स्मरण और उसके परिणामों का वर्णन करते हैं।

परिचय / Introduction

पिछले अध्याय में कृष्ण ने अपने स्वरूप का सामान्य परिचय दिया। अब अध्याय ८ में अर्जुन कुछ पारिभाषिक शब्दों को स्पष्ट करने का अनुरोध करते हैं – ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ। कृष्ण इन्हें सरलता से परिभाषित करते हैं और फिर उस परम गति का रहस्य बताते हैं, जो मृत्यु के समय स्मरण से प्राप्त होती है।

मुख्य विषय / Key Themes

  • पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या (Definitions of Key Terms): ब्रह्म (अविनाशी परम तत्व), अध्यात्म (जीव का स्वरूप), कर्म (ईश्वरार्पण बुद्धि से किए गए कार्य), अधिभूत (क्षर भौतिक जगत), अधिदैव (हिरण्यगर्भ या सूत्रात्मा), अधियज्ञ (साक्षात् कृष्ण ही सब यज्ञों के भोक्ता)।
  • अन्तकालीन स्मरण (Remembrance at the Time of Death): मृत्यु के समय जिस भावना से मनुष्य शरीर त्यागता है, वह उसकी अगली गति निर्धारित करती है। इसलिए सदा कृष्ण का स्मरण करते हुए जीना चाहिए।
  • ऊँ का जप और कृष्ण का ध्यान (Chanting Om and Meditating on Krishna): अभ्यासयुक्त मन से ॐकार का जप करते हुए कृष्ण का ध्यान करने वाला परम गति को प्राप्त होता है।
  • शुक्ल और कृष्ण गति (The Paths of Light and Darkness): दो मार्ग हैं – अग्नि, ज्योति, दिन आदि वाला (उत्तरायण, देवयान) जिससे जाने वाला लौटता नहीं; और धूम, रात्रि आदि वाला (दक्षिणायन, पितृयान) जिससे लौटना पड़ता है।
  • सगुण और निर्गुण उपासना (Worship of the Manifest and Unmanifest): सगुण रूप (कृष्ण) की उपासना सरल है। निर्गुण ब्रह्म की उपासना अत्यंत कठिन है और देहधारियों के लिए दुःखदायी।

यह अध्याय हमें जीवन और मृत्यु के रहस्य से अवगत कराता है। यह स्मरण दिलाता है कि हमारे वर्तमान विचार और कर्म ही हमारे भविष्य की नींव रखते हैं। मृत्यु को जीतने का सबसे सरल उपाय है निरंतर भगवान का स्मरण। This chapter underscores the importance of focusing the mind on the Supreme at the final moment and explains the cosmic paths that determine the soul's destiny.

अध्याय के सभी श्लोक

श्लोक 21

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अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ २१॥

“वह अव्यक्त अक्षर कहा गया है, उसे ही परम गति बताते हैं; जिसे प्राप्त करके (पुरुष) लौटकर नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।”

English: That which is called the Unmanifest and Imperishable, that is said to be the supreme goal. That is My supreme abode, attaining which one does not return.

श्लोक 22

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पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२॥

“हे पार्थ! वह परम पुरुष, जिसके अन्तर्गत सब प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।”

English: O Partha, that Supreme Purusha, in whom all beings dwell and by whom all this is pervaded, is attainable only through unswerving devotion.

श्लोक 23

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यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३॥

“हे भरतश्रेष्ठ! जिस काल (समय) में मरकर योगी लौटकर नहीं आते और जिस काल में मरकर लौटते हैं, उस काल को मैं बताऊँगा।”

English: O best of the Bharatas, I will now declare that time departing at which yogis attain non-return (liberation), and also the time departing at which they return (to rebirth).

श्लोक 24

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अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४॥

“अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छः महीने; इस मार्ग से जाने वाले ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।”

English: Fire, light, daytime, the bright fortnight, and the six months of the northern solstice—departing by this path, the knowers of Brahman attain Brahman.

श्लोक 25

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धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५॥

“धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छः महीने; इस मार्ग से जाने वाला योगी चन्द्रज्योति को प्राप्त होकर लौटता है।”

English: Smoke, night, the dark fortnight, and the six months of the southern solstice—departing by this path, the yogi attains the lunar light and returns (to rebirth).

श्लोक 26

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शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः ॥ २६॥

“ये शुक्ल और कृष्ण दो गतियाँ (मार्ग) संसार में सनातन मानी गई हैं। इनमें से एक से (जाने वाला) लौटकर नहीं आता, दूसरे से (जाने वाला) पुनः लौट आता है।”

English: These two paths, the bright and the dark, are considered eternal for the world. By one, one goes to non-return; by the other, one returns again.

श्लोक 27

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नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७॥

“हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय योग में स्थित रह।”

English: O Partha, knowing these two paths, no yogi is deluded. Therefore, O Arjuna, be steadfast in yoga at all times.

श्लोक 28

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वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८॥

“वेदों, यज्ञों, तपों और दानों में जो पुण्यफल बताया गया है, उस सबको जानकर योगी उससे अतीत हो जाता है और परम आदि स्थान (ब्रह्म) को प्राप्त होता है।”

English: Whatever fruit of merit is declared in the Vedas, sacrifices, austerities, and gifts—having known this, the yogi surpasses all that and attains the supreme, primeval abode.