आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · 43 श्लोक

कर्म योग (Karma Yoga)

तीसरा अध्याय कर्म योग के सिद्धान्त की व्याख्या करता है – निष्काम कर्म, स्वधर्म का पालन, और ज्ञानी व कर्मयोगी की तुलना। Chapter 3 explains the doctrine of Karma Yoga – selfless action, performing one's duty, and the contrast between the wise and the active yogi.

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. अध्याय संक्षिप्त परिचय (Introduction)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन अध्याय का शीर्षक "कर्म योग (Karma Yoga)" है। यह अध्याय कर्म, भक्ति और ज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों का एक उत्कृष्ट समन्वय है।

अध्याय संदेश

तीसरा अध्याय कर्म योग के सिद्धान्त की व्याख्या करता है – निष्काम कर्म, स्वधर्म का पालन, और ज्ञानी व कर्मयोगी की तुलना। Chapter 3 explains the doctrine of Karma Yoga – selfless action, performing one's duty, and the contrast between the wise and the active yogi.

२. अध्याय के पावन श्लोक (Gita Shlokas)

प्रत्येक श्लोक को उसके मूल देवनागरी पाठ और हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद के साथ नीचे सूचीबद्ध किया गया है।

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ | पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ||४१||


हिंदी अनुवाद: “इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! पहले इन्द्रियों को वश में करके, इस ज्ञान-विज्ञान का नाश करने वाले पापी (काम) को नष्ट कर डाल।”

English Translation: Therefore, O best of the Bharatas, first control the senses and then slay this sinful thing (desire) that destroys knowledge and discrimination.

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः | मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ||४२||


हिंदी अनुवाद: “इन्द्रियाँ (शरीर से) श्रेष्ठ कही जाती हैं, इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, और जो बुद्धि से परे है – वह (आत्मा) है।”

English Translation: The senses are said to be superior to the body, the mind is superior to the senses, the intellect is superior to the mind, and that which is superior to the intellect is He (the Self).

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना | जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ||४३||


हिंदी अनुवाद: “इस प्रकार बुद्धि से परे (आत्मा) को जानकर, बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, हे महाबाहो! इस दुर्जय कामरूपी शत्रु को मार डाल।”

English Translation: Thus knowing that which is beyond the intellect, and restraining the mind by the intellect, O mighty-armed, slay this enemy in the form of desire, which is difficult to conquer.

श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।