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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · 42 श्लोक

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)

चौथा अध्याय: ज्ञान-कर्म-संन्यास योग। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ज्ञानयोग और कर्मयोग के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। वे अपने दिव्य जन्म और कर्मों का वर्णन करते हैं, तथा बताते हैं कि कैसे ज्ञान की अग्नि में समस्त कर्मों को भस्म किया जा सकता है।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. अध्याय संक्षिप्त परिचय (Introduction)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन अध्याय का शीर्षक "ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)" है। यह अध्याय कर्म, भक्ति और ज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों का एक उत्कृष्ट समन्वय है।

अध्याय संदेश

चौथा अध्याय: ज्ञान-कर्म-संन्यास योग। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ज्ञानयोग और कर्मयोग के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। वे अपने दिव्य जन्म और कर्मों का वर्णन करते हैं, तथा बताते हैं कि कैसे ज्ञान की अग्नि में समस्त कर्मों को भस्म किया जा सकता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक (Gita Shlokas)

प्रत्येक श्लोक को उसके मूल देवनागरी पाठ और हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद के साथ नीचे सूचीबद्ध किया गया है।

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥


हिंदी अनुवाद: “हे धनञ्जय! योग (समत्व) द्वारा कर्मों का त्याग किए हुए, ज्ञान द्वारा जिसके संशय नष्ट हो गए हैं, और जो आत्मनिष्ठ है—ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।”

English Translation: He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are destroyed by knowledge, and who is self-possessed, is not bound by actions, O Dhananjaya.

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥


हिंदी अनुवाद: “इसलिए हे भारत! तू अज्ञान से उत्पन्न, हृदय में स्थित इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल। योग (समत्वबुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।”

English Translation: Therefore, O Bharata, cut this doubt, born of ignorance, residing in your heart, with the sword of knowledge. Resort to Yoga and arise!

श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।