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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 41

अध्याय 4 · श्लोक 41

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥

yoga-sannyasta-karmāṇaṃ jñāna-sañchinna-saṃśayam | ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya ||41||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

योगसंन्यस्तकर्माणम्: योग (समत्व) द्वारा त्यागे हुए कर्म वाले (अर्थात् फलासक्ति रहित कर्म करने वाले); ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्: ज्ञान द्वारा छिन्न (नष्ट) किए हुए संशय वाले; आत्मवन्तम्: आत्मनिष्ठ; न: नहीं; कर्माणि: कर्म; निबध्नन्ति: बाँधते; धनञ्जय: हे धनञ्जय।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे धनञ्जय! योग (समत्व) द्वारा कर्मों का त्याग किए हुए, ज्ञान द्वारा जिसके संशय नष्ट हो गए हैं, और जो आत्मनिष्ठ है—ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।

English Translation

He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are destroyed by knowledge, and who is self-possessed, is not bound by actions, O Dhananjaya.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इस श्लोक में ज्ञानी कर्मयोगी के लक्षण बताए गए हैं। वह योग द्वारा—अर्थात् समत्व बुद्धि द्वारा—कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देता है। उसके सारे संशय ज्ञान से नष्ट हो गए हैं। वह आत्मवान् (आत्मा में स्थित) है। ऐसे व्यक्ति को कोई कर्म बन्धन में नहीं डाल सकता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।