ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 41

श्लोक ४१ में कहा गया है कि जो योग द्वारा कर्म-त्यागी, ज्ञान से नि:संशय और आत्मनिष्ठ है, उसे कर्म नहीं बाँधते।

संस्कृत श्लोक

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥

yoga-sannyasta-karmāṇaṃ jñāna-sañchinna-saṃśayam | ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya ||41||

पदच्छेद / शब्दार्थ

योगसंन्यस्तकर्माणम्: योग (समत्व) द्वारा त्यागे हुए कर्म वाले (अर्थात् फलासक्ति रहित कर्म करने वाले); ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्: ज्ञान द्वारा छिन्न (नष्ट) किए हुए संशय वाले; आत्मवन्तम्: आत्मनिष्ठ; न: नहीं; कर्माणि: कर्म; निबध्नन्ति: बाँधते; धनञ्जय: हे धनञ्जय।

हिंदी अनुवाद

हे धनञ्जय! योग (समत्व) द्वारा कर्मों का त्याग किए हुए, ज्ञान द्वारा जिसके संशय नष्ट हो गए हैं, और जो आत्मनिष्ठ है—ऐसे पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।

English Translation

He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are destroyed by knowledge, and who is self-possessed, is not bound by actions, O Dhananjaya.

टीका / Commentary

इस श्लोक में ज्ञानी कर्मयोगी के लक्षण बताए गए हैं। वह योग द्वारा—अर्थात् समत्व बुद्धि द्वारा—कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर देता है। उसके सारे संशय ज्ञान से नष्ट हो गए हैं। वह आत्मवान् (आत्मा में स्थित) है। ऐसे व्यक्ति को कोई कर्म बन्धन में नहीं डाल सकता।