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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 40

अध्याय 4 · श्लोक 40

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥

ajñaś cāśraddadhānaś ca saṃśayātmā vinaśyati | nāyaṃ loko ’sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ ||40||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अज्ञः: अज्ञानी; च: और; अश्रद्दधानः: श्रद्धारहित; च: और; संशयात्मा: संशयी (संदेह करने वाला) पुरुष; विनश्यति: नष्ट हो जाता है; न: नहीं; अयम्: यह; लोकः: लोक; अस्ति: है; न: नहीं; परः: परलोक; न: नहीं; सुखम्: सुख; संशयात्मनः: संशयी पुरुष के लिए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशयी पुरुष नष्ट हो जाता है। संशयी पुरुष के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।

English Translation

The ignorant, the faithless, and the doubting self goes to destruction. The doubting self has neither this world nor the next, nor happiness.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अज्ञान, अश्रद्धा और संशय के विनाशकारी परिणाम बताता है। जो व्यक्ति ज्ञान से रहित है, श्रद्धा से रहित है, और संशय में डूबा रहता है, वह आध्यात्मिक प्रगति से वंचित रह जाता है। ऐसे संशयी के लिए न तो इस लोक में सुख है (क्योंकि वह निश्चय नहीं कर पाता), न परलोक में (क्योंकि उसने कोई साधना नहीं की), और न ही कहीं सुख है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।