ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 40
श्लोक ४० में कहा गया है कि अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशयी पुरुष का पतन होता है।
संस्कृत श्लोक
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
ajñaś cāśraddadhānaś ca saṃśayātmā vinaśyati | nāyaṃ loko ’sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ ||40||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अज्ञः: अज्ञानी; च: और; अश्रद्दधानः: श्रद्धारहित; च: और; संशयात्मा: संशयी (संदेह करने वाला) पुरुष; विनश्यति: नष्ट हो जाता है; न: नहीं; अयम्: यह; लोकः: लोक; अस्ति: है; न: नहीं; परः: परलोक; न: नहीं; सुखम्: सुख; संशयात्मनः: संशयी पुरुष के लिए।
हिंदी अनुवाद
अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशयी पुरुष नष्ट हो जाता है। संशयी पुरुष के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।
English Translation
The ignorant, the faithless, and the doubting self goes to destruction. The doubting self has neither this world nor the next, nor happiness.
टीका / Commentary
यह श्लोक अज्ञान, अश्रद्धा और संशय के विनाशकारी परिणाम बताता है। जो व्यक्ति ज्ञान से रहित है, श्रद्धा से रहित है, और संशय में डूबा रहता है, वह आध्यात्मिक प्रगति से वंचित रह जाता है। ऐसे संशयी के लिए न तो इस लोक में सुख है (क्योंकि वह निश्चय नहीं कर पाता), न परलोक में (क्योंकि उसने कोई साधना नहीं की), और न ही कहीं सुख है।