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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 39

अध्याय 4 · श्लोक 39

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥

śraddhāvāṃl labhate jñānaṃ tat-paraḥ saṃyatendriyaḥ | jñānaṃ labdhvā parāṃ śāntim acireṇādhigacchati ||39||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रद्धावान्: श्रद्धालु; लभते: प्राप्त करता है; ज्ञानम्: ज्ञान; तत्परः: उसमें तत्पर; संयतेन्द्रियः: संयमित इन्द्रियों वाला; ज्ञानम्: ज्ञान; लब्ध्वा: प्राप्त करके; पराम्: परम; शान्तिम्: शान्ति; अचिरेण: शीघ्र; अधिगच्छति: प्राप्त होता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रद्धालु, उसमें (ज्ञान में) तत्पर और संयमित इन्द्रियों वाला पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

English Translation

A man of faith, devoted to it, and having subdued his senses, attains knowledge. Having attained knowledge, he soon attains supreme peace.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ज्ञान प्राप्ति के लिए तीन शर्तें हैं—श्रद्धा (विश्वास), तत्परता (निष्ठा), और संयतेन्द्रियता (इन्द्रिय-निग्रह)। श्रद्धा के बिना ज्ञान टिकाऊ नहीं होता। तत्परता के बिना प्रयास निरन्तर नहीं रहता। इन्द्रिय-संयम के बिना मन भटकता रहता है। इन तीनों से युक्त साधक ज्ञान प्राप्त करता है और फिर शीघ्र ही परम शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।