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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 38

अध्याय 4 · श्लोक 38

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥

na hi jñānena sadṛśaṃ pavitram iha vidyate | tat svayaṃ yoga-saṃsiddhaḥ kālenātmani vindati ||38||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; हि: निश्चय ही; ज्ञानेन: ज्ञान के समान; सदृशम्: समान; पवित्रम्: पवित्र; इह: इस (लोक) में; विद्यते: है; तत्: वह (ज्ञान); स्वयम्: स्वयं; योगसंसिद्धः: योग में सिद्ध; कालेन: काल (समय) के साथ; आत्मनि: अपने आप में; विन्दति: पाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

निश्चय ही इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला और कुछ नहीं है। योग में सिद्ध पुरुष उस (ज्ञान) को समय के साथ अपने आप में पा लेता है।

English Translation

Verily, there is nothing so pure in this world as knowledge. One who is perfected in Yoga finds it in the Self in course of time.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक ज्ञान की पवित्रता पर बल देता है। ज्ञान सबसे बड़ा पवित्रकर्ता है—यह मन, बुद्धि और आत्मा को शुद्ध करता है। यह ज्ञान बाहर से नहीं मिलता, बल्कि योग (साधना) द्वारा सिद्ध हुआ व्यक्ति इसे अपने ही अन्तःकरण में प्राप्त करता है। कालेन का अर्थ है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे, उचित समय पर फलित होती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।