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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 37

अध्याय 4 · श्लोक 37

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥

yathaidhāṃsi samiddho ’gnir bhasmasāt kurute ’rjuna | jñānāgniḥ sarva-karmāṇi bhasmasāt kurute tathā ||37||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यथा: जैसे; एधांसि: ईंधनों को; समिद्धः: प्रज्वलित; अग्निः: अग्नि; भस्मसात्: भस्म; कुरुते: कर देती है; अर्जुन: हे अर्जुन; ज्ञानाग्निः: ज्ञानरूपी अग्नि; सर्वकर्माणि: सब कर्मों को; भस्मसात्: भस्म; कुरुते: कर देती है; तथा: वैसे ही।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है।

English Translation

As a blazing fire reduces wood to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge reduce all actions to ashes.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह एक प्रसिद्ध दृष्टान्त है। जैसे आग जलाऊ लकड़ी को जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञान की अग्नि समस्त कर्मों के बंधनकारी फलों को भस्म कर देती है। यहाँ सर्वकर्माणि का अर्थ है—सभी प्रकार के कर्म (पुण्य, पाप, मिश्रित) जो जीव को बांधते हैं। ज्ञान होने पर ये सभी कर्म साधक को प्रभावित नहीं कर पाते।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।