ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 36
श्लोक ३६ में कहा गया है कि ज्ञानरूपी नौका सबसे बड़े पापी को भी पाप-समुद्र से पार उतार देती है।
संस्कृत श्लोक
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥
api ced asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛttamaḥ | sarvaṃ jñāna-plavenaiva vṛjinaṃ santariṣyasi ||36||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अपि: यद्यपि; चेत्: यदि; असि: तुम हो; पापेभ्यः: पापियों में; सर्वेभ्यः: सबसे; पापकृत्तमः: अधिक पाप करने वाला; सर्वम्: सब; ज्ञानप्लवेन: ज्ञानरूपी नौका द्वारा; एव: ही; वृजिनम्: पाप-समुद्र को; सन्तरिष्यसि: पार कर जाओगे।
हिंदी अनुवाद
यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा तू सम्पूर्ण पाप-समुद्र को पार कर जाएगा।
English Translation
Even if you are the most sinful of all sinners, you shall cross over all sin by the raft of knowledge alone.
टीका / Commentary
यह श्लोक ज्ञान की महिमा का गान करता है। ज्ञान की शक्ति इतनी प्रबल है कि वह सबसे बड़े पापी को भी पापों के समुद्र से पार उतार सकती है। यहाँ ज्ञानप्लव (ज्ञानरूपी नौका) का प्रयोग दर्शाता है कि जैसे नौका बिना डूबे पानी को पार करा देती है, वैसे ही ज्ञान बिना लिप्त हुए पापों के प्रभाव से मुक्त कर देता है।