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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 36

अध्याय 4 · श्लोक 36

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥

api ced asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛttamaḥ | sarvaṃ jñāna-plavenaiva vṛjinaṃ santariṣyasi ||36||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अपि: यद्यपि; चेत्: यदि; असि: तुम हो; पापेभ्यः: पापियों में; सर्वेभ्यः: सबसे; पापकृत्तमः: अधिक पाप करने वाला; सर्वम्: सब; ज्ञानप्लवेन: ज्ञानरूपी नौका द्वारा; एव: ही; वृजिनम्: पाप-समुद्र को; सन्तरिष्यसि: पार कर जाओगे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा तू सम्पूर्ण पाप-समुद्र को पार कर जाएगा।

English Translation

Even if you are the most sinful of all sinners, you shall cross over all sin by the raft of knowledge alone.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक ज्ञान की महिमा का गान करता है। ज्ञान की शक्ति इतनी प्रबल है कि वह सबसे बड़े पापी को भी पापों के समुद्र से पार उतार सकती है। यहाँ ज्ञानप्लव (ज्ञानरूपी नौका) का प्रयोग दर्शाता है कि जैसे नौका बिना डूबे पानी को पार करा देती है, वैसे ही ज्ञान बिना लिप्त हुए पापों के प्रभाव से मुक्त कर देता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।