श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 35

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 42 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
यत्
जिस (ज्ञान) को
ज्ञात्वा
जानकर
न
नहीं
पुनः
फिर
मोहम्
मोह को
एवम्
इस प्रकार
यास्यसि
जाओगे
पाण्डव
हे पाण्डव
येन
जिससे
भूतानि
प्राणियों को
अशेषेण
सम्पूर्ण रूप से
द्रक्ष्यसि
देखोगे
आत्मनि
अपने आप में
अथो
तथा
मयि
मुझमें।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पाण्डव! जिस (ज्ञान) को जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिसके द्वारा तू सम्पूर्ण प्राणियों को अपने आप में और मुझमें देखेगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तुतकर्ता: मुख्य devotional विद्वान, संस्कृत भाषाविद् एवं Google Helpful Content विशेषज्ञ (Bhaktilok.in)

अध्याय 4, श्लोक 35: मोह के बंधन का अंत और ब्रह्मांडीय एकता का साक्षात्कार

सनातन धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) का पैंतीसवां (35वां) श्लोक भारतीय दर्शन, वेदांत और अद्वैत चिंतन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। मानव जीवन का मूल दुखों का कारण अज्ञान, अविद्या और मोह (भ्रम) है। जब मनुष्य इस नश्वर संसार को वास्तविक सत्य मान बैठता है और स्वयं को शरीर तक सीमित कर लेता है, तब वह जन्म-मरण के चक्र और मानसिक संतापों से घिर जाता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह आश्वासन देते हैं कि उस पराविद्या या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य के जीवन में कभी भी मोह का अंधकार प्रवेश नहीं कर सकता।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व इस बात में निहित है कि यह केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष आनुभविक स्थिति है। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अंधकार स्वतः विलीन हो जाता है, ठीक उसी प्रकार जब साधक के भीतर आत्मबोध का सूर्य चमक उठता है, तब उसे संपूर्ण चराचर जगत में एक ही परमात्मा की ऊर्जा प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है। वह प्राणीमात्र में भेद करना भूल जाता है और संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने हृदय और परमात्मा का ही विस्तार मानने लगता है। यह स्थिति जीव को परम शांति और मोक्ष की ओर ले जाती है, जो कि मानव योनि का परम लक्ष्य है। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी परम पावन श्लोक के गूढ़ रहस्यों, उसके शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि और दैनिक जीवन में उसके व्यावहारिक उपयोग का विस्तार से विश्लेषण करेंगे ताकि हर साधक इस ज्ञान की पावन धारा में गोता लगा सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥


पदच्छेद (श्लोक का विच्छेद):

यत् ज्ञात्वा न पुनः मोहम् एवम् यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतानि अशेषेण द्रक्ष्यसि आत्मनि अथो मयि ॥

पाठ विधि एवं उच्चारण नियम:

इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना अत्यंत फलदायी माना गया है। श्लोक का उच्चारण करते समय स्पष्टता (उच्चारण शुद्धि) का विशेष ध्यान रखें। 'यज्ज्ञात्वा' बोलते समय 'ज्ज्ञा' का उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। पाठ के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का स्मरण करते हुए तीन बार शांति पाठ करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

आइए इस श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में उतरकर उसके शाब्दिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यत् (Yat) जिसे / जिस ज्ञान को उस ब्रह्मविद्या या आत्मज्ञान की ओर संकेत, जो समस्त भौतिक बंधनों को काटने में सक्षम है।
ज्ञात्वा (Jnatva) जानकर / अनुभव करके केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, अपितु प्रत्यक्ष अनुभूति और स्वानुभव के माध्यम से सत्य को आत्मसात करना।
न (Na) नहीं अभाव या निवृत्ति का सूचक, जो बताता है कि इस ज्ञान के बाद भ्रम का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
पुनः (Punah) फिर से / दोबारा काल चक्र की निरंतरता; अर्थात् भूतकाल की भूलों या मोह की स्थिति भविष्य में कभी लौटकर नहीं आएगी।
मोहम् (Moham) मोह को / भ्रम को अज्ञान जनित वह स्थिति जिसमें शरीर को ही आत्मा मान लिया जाता है और ममता उत्पन्न होती है।
एवम् (Evam) इस प्रकार की स्थिति को निश्चित रूप से, बिना किसी संदेह के प्राप्त होने वाली परम स्पष्टता का बोध।
यास्यसि (Yasyasi) तू प्राप्त होगा / प्राप्त करेगा भगवान अर्जुन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि तुम्हारी चेतना इस अवस्था को प्राप्त हो जाएगी।
पाण्डव (Pandava) हे पाण्डव (अर्जुन) पाण्डु पुत्र अर्जुन को संबोधित कर यह स्मरण कराना कि तुम महान वंश से हो और दिव्य ज्ञान के पात्र हो।
येन (Yena) जिस ज्ञान या दृष्टि के प्रभाव से वह दिव्य चक्षु जो भौतिक आँखों के परे जाकर आंतरिक सत्य का दर्शन कराती है।
भूतानि अशेषेण (Bhootani Asheshena) समस्त प्राणियों को / संपूर्ण भूतों को कीड़े-मकोड़ों से लेकर मनुष्य और देवताओं तक, सृष्टि के कण-कण में उपस्थित जीव समुदाय।
द्रक्ष्यसि (Drakshyasi) तू देखेगा देखने की क्रिया का आंतरिक रूपांतरण, जहाँ नेत्रों से परे अंतःकरण से दर्शन होता है।
आत्मनि (Atmani) अपनी आत्मा में यह अनुभव करना कि जो चेतना मुझमें है, वही चेतना समस्त चराचर जगत में भी विद्यमान है।
अथो मयि (Atho Mayi) और तत्पश्चात मुझमें (परमात्मा में) समस्त जीवों को भगवान श्रीकृष्ण के ही स्वरूप के रूप में देखना, अद्वैत चेतना की पराकाष्ठा।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक पहले कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र से जुड़ी हुई है। जब दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब कौरवों की विशाल सेना को देखकर वीर अर्जुन का गाण्डीव धनुष हाथ से छूटने लगा। मोह और अपने परिजनों के प्रति क्षुद्र ममता के कारण अर्जुन विषाद से भर गए और उन्होंने युद्ध करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। उस संकट की घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाते हुए उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में अमर हो गया।

चतुर्थ अध्याय जिसका नाम 'ज्ञान-कर्म-संन्यास योग' है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान की महत्ता का प्रतिपादन कर रहे हैं। अर्जुन के मन में यह शंका थी कि कर्म और ज्ञान में क्या श्रेष्ठ है और इस संसार के दुखों से कैसे मुक्ति पाई जाए। भगवान श्रीकृष्ण ने प्राचीन परंपरा का स्मरण कराते हुए बताया कि यह योग उन्होंने सूर्यदेव को दिया था, और समय के प्रभाव से यह गुप्त हो गया था, जिसे वे आज अर्जुन को पुनः समझा रहे हैं।

श्लोक 35 उसी पावन संवाद का अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है, जहाँ भगवान ज्ञान के व्यावहारिक परिणाम को स्पष्ट करते हैं। पुराणों और वेदों में भी इस अद्वैत दर्शन का भरपूर उल्लेख मिलता है—"सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (सब कुछ ब्रह्म ही है)। उपनिषदों में ऋषिगण इसी सत्य की खोज करते हैं कि जब तक मनुष्य द्वैत भाव में जीता है (मैं और दूसरा, अपना और पराया), तब तक भय और मोह बने रहते हैं। लेकिन जब वह इस श्लोक में वर्णित दृष्टि को प्राप्त कर लेता है, जहाँ वह सब भूतों को अपनी आत्मा में और परमात्मा में देखता है, तब उसका सारा द्वंद्व समाप्त हो जाता है। यह ज्ञान महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व का एक ऐसा रत्न है जो पीढ़ियों से मानव जाति का मार्गदर्शन करता आ रहा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेकों मानसिक, आध्यात्मिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मोह और भ्रम से मुक्ति

संसार के प्रपंचों, झूठे संबंधों और अनित्य वस्तुओं के प्रति अत्यधिक लगाव (मोह) स्वतः समाप्त होने लगता है, जिससे मानसिक हल्कापन महसूस होता है।

2. मानसिक शांति और एकाग्रता

अकारण की चिंताएं, भविष्य का भय और भूतकाल का पश्चाताप कम होता है। मन वर्तमान क्षण में स्थिर होकर शांत और केंद्रित रहता है।

3. अद्वैत दृष्टि का विकास

साधक सभी मनुष्यों और जीवों में एक ही दिव्य चेतना का दर्शन करता है, जिससे उसके भीतर ईर्ष्या, द्वेष और घृणा का भाव सदा के लिए नष्ट हो जाता है।

4. कार्मिक शुद्धि (कर्म बंधनों से मुक्ति)

जब व्यक्ति सबको अपने समान और परमात्मा का रूप देखने लगता है, तो उसके द्वारा कोई भी पाप या अनैतिक कर्म होना असंभव हो जाता है, जिससे कार्मिक खाते शुद्ध होते हैं।

5. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार

दिव्य वचनों के जाप से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा (औरा) का निर्माण होता है जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

6. भयहीन जीवन की प्राप्ति

मृत्यु, हानि और अपमान का भय उस व्यक्ति को नहीं सताता जो यह जान लेता है कि आत्मा अमर है और सब कुछ उसी एक परमात्मा का विस्तार है।

7. भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा

गीता के वचनों को अपने जीवन का आधार बनाने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण का वात्सल्य और योगक्षेम का आशीर्वाद सदैव बना रहता है।

8. मोक्ष और परम गति का मार्ग प्रशस्त

यह श्लोक मुक्ति का द्वार खोलता है। जीवन के अंतिम समय में भी इस ज्ञान का स्मरण रखने वाला साधक सीधे परमधाम को प्राप्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह पावन आलेख वेदों, पुराणों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानंद टीका सहित), तथा पारंपरिक सनातन ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात हमारे विद्वान आचार्यों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों और उपनिषदों के शुद्ध, अकाट्य और प्रेरणादायी संदेश को सहज हिंदी भाषा में पहुंचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय प्रामाणिकता, ऐतिहासिक सटीकता और आध्यात्मिक गहराई का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि प्रत्येक भक्त को सही और सटीक मार्गदर्शन मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक में 'मोह' का अर्थ है अज्ञानवश इस नश्वर संसार, शरीर और बंधनों को ही सत्य मान लेना तथा अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को भूल जाना। जब साधक गुरु और शास्त्रों के माध्यम से यह जान लेता है कि सब कुछ परमात्मा का ही स्वरूप है, तब यह मोह स्वतः समाप्त हो जाता है।

इसका तात्पर्य अद्वैत दृष्टि से है। जब एक साधक पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, तो वह देखता है कि जो चेतना (आत्मा) उसके भीतर है, वही चेतना संसार के प्रत्येक जीव में भी है और वे सभी जीव भगवान श्रीकृष्ण की ही ऊर्जा से संचालित हो रहे हैं। इस दृष्टि के बाद किसी के प्रति भेद या द्वेष नहीं रहता।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक पर संपूर्ण मानवता का अधिकार है। कोई भी जिज्ञासु, भक्त या विद्यार्थी श्रद्धापूर्वक इस श्लोक का पाठ, स्मरण और मनन कर सकता है। इससे मन को शांति और जीवन को सही दिशा मिलती है।

चौथे अध्याय (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) का मुख्य संदेश यह है कि ज्ञान और कर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। निष्काम भाव से किए गए कर्म भी योग बन जाते हैं, बशर्ते उनके पीछे ज्ञान और ईश्वर समर्पण का भाव हो। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी अध्याय में अपने अवतार के रहस्यों को भी समझाया है।

दैनिक जीवन में हर प्राणी के प्रति दया भाव रखकर, किसी को भी अनावश्यक कष्ट न देकर, और अपने हर कार्य को भगवान की सेवा मानकर करने से इस श्लोक के ज्ञान को उतारा जा सकता है। जब हम हर व्यक्ति में उसी परमात्मा का अंश देखते हैं, तो हमारा व्यवहार स्वतः प्रेमपूर्ण और न्यायसंगत हो जाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे पाण्डव! जिस (ज्ञान) को जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिसके द्वारा तू सम्पूर्ण प्राणियों को अपने आप में और मुझमें देखेगा। Knowing which, O Pandava, you shall not again be deluded like this; and by which you shall see all beings without exception in your own Self and in Me.

व्याख्या / Explanation

ज्ञान की दो विशेषताएँ बताई गई हैं। पहली, यह स्थायी है—एक बार प्राप्त हो जाने पर पुनः मोह नहीं होता। दूसरी, यह सर्वसमावेशी दृष्टि देता है—ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही आत्मा देखता है, और वह आत्मा परमात्मा (कृष्ण) में एकीभूत है। यही वास्तविक ज्ञान है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 35 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 35/42 83% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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