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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 35

अध्याय 4 · श्लोक 35

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥

yaj jñātvā na punar moham evaṃ yāsyasi pāṇḍava | yena bhūtāny aśeṣeṇa drakṣyasy ātmany atho mayi ||35||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यत्: जिस (ज्ञान) को; ज्ञात्वा: जानकर; न: नहीं; पुनः: फिर; मोहम्: मोह को; एवम्: इस प्रकार; यास्यसि: जाओगे; पाण्डव: हे पाण्डव; येन: जिससे; भूतानि: प्राणियों को; अशेषेण: सम्पूर्ण रूप से; द्रक्ष्यसि: देखोगे; आत्मनि: अपने आप में; अथो: तथा; मयि: मुझमें।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पाण्डव! जिस (ज्ञान) को जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिसके द्वारा तू सम्पूर्ण प्राणियों को अपने आप में और मुझमें देखेगा।

English Translation

Knowing which, O Pandava, you shall not again be deluded like this; and by which you shall see all beings without exception in your own Self and in Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इस श्लोक में उस ज्ञान के फल का वर्णन है। वह ज्ञान साधक को पुनः मोह में नहीं पड़ने देता। साथ ही, उस ज्ञान के प्रभाव से साधक समस्त प्राणियों को अपने आत्मा में और परमात्मा (कृष्ण) में देखता है—अर्थात् उसे सर्वत्र एक ही चेतना दिखाई देती है। यह अद्वैत दृष्टि का सूचक है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।