ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 34
श्लोक ३४ में ज्ञान प्राप्ति के उपाय बताए गए हैं—प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा से तत्त्वदर्शी ज्ञानी उपदेश देंगे।
संस्कृत श्लोक
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
tad viddhi praṇipātena paripraśnena sevayā | upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninas tattva-darśinaḥ ||34||
पदच्छेद / शब्दार्थ
तत्: उस (ज्ञान) को; विद्धि: जानो; प्रणिपातेन: प्रणिपात (समर्पण) से; परिप्रश्नेन: परिप्रश्न (विनीत प्रश्न) से; सेवया: सेवा से; उपदेक्ष्यन्ति: उपदेश देंगे; ते: तुझे; ज्ञानम्: ज्ञान; ज्ञानिनः: ज्ञानी; तत्त्वदर्शिनः: तत्त्व के दर्शी (साक्षात्कारी)।
हिंदी अनुवाद
उस (ज्ञान) को तू प्रणिपात (समर्पण), परिप्रश्न (विनीत प्रश्न) और सेवा द्वारा जान। तत्त्व के साक्षात्कारी ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश देंगे।
English Translation
Know that by prostrating yourself at the feet of the wise, by questioning them, and by serving them, the wise who have realized the Truth will instruct you in that knowledge.
टीका / Commentary
यह श्लोक गुरु-शिष्य परम्परा का आधार है। ज्ञान प्राप्त करने के तीन साधन बताए गए हैं—प्रणिपात (गुरु के चरणों में समर्पण), परिप्रश्न (विनीत भाव से प्रश्न करना), और सेवा (गुरु की सेवा)। ऐसे शिष्य को तत्त्वदर्शी गुरु सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। यहाँ बल इस बात पर है कि ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि साक्षात् गुरु के सान्निध्य से प्राप्त होता है।