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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 33

अध्याय 4 · श्लोक 33

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥

śreyān dravyamayād yajñāj jñāna-yajñaḥ parantapa | sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate ||33||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रेयान्: श्रेष्ठ; द्रव्यमयात्: द्रव्यमय (पदार्थों से सम्पन्न) यज्ञ से; यज्ञात्: यज्ञ से; ज्ञानयज्ञः: ज्ञान-यज्ञ; परन्तप: हे परन्तप (शत्रुतापन); सर्वम्: सब; कर्म: कर्म; अखिलम्: सम्पूर्ण; पार्थ: हे पार्थ; ज्ञाने: ज्ञान में; परिसमाप्यते: पूर्णतः समाप्त हो जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में ही परिसमाप्त (चरम सीमा को प्राप्त) होते हैं।

English Translation

O scorcher of foes, the sacrifice of knowledge is superior to the sacrifice of material possessions. All actions in their entirety, O Partha, culminate in knowledge.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अब स्पष्ट करते हैं कि सभी यज्ञों में सर्वोच्च ज्ञान-यज्ञ है। बाह्य पदार्थों (द्रव्य) से किए गए यज्ञ अपने आप में सीमित हैं, किन्तु ज्ञान-यज्ञ (आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास) सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि यह साधक को मोक्ष के द्वार तक ले जाता है। अंततः सभी कर्मों की परिणति ज्ञान में ही होती है—अर्थात् ज्ञान ही कर्मों का चरम लक्ष्य है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।