ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 33

श्लोक ३३ में ज्ञानयज्ञ को द्रव्यमय यज्ञ से श्रेष्ठ बताया गया है, और कहा गया है कि सभी कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं।

संस्कृत श्लोक

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥

śreyān dravyamayād yajñāj jñāna-yajñaḥ parantapa | sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate ||33||

पदच्छेद / शब्दार्थ

श्रेयान्: श्रेष्ठ; द्रव्यमयात्: द्रव्यमय (पदार्थों से सम्पन्न) यज्ञ से; यज्ञात्: यज्ञ से; ज्ञानयज्ञः: ज्ञान-यज्ञ; परन्तप: हे परन्तप (शत्रुतापन); सर्वम्: सब; कर्म: कर्म; अखिलम्: सम्पूर्ण; पार्थ: हे पार्थ; ज्ञाने: ज्ञान में; परिसमाप्यते: पूर्णतः समाप्त हो जाता है।

हिंदी अनुवाद

हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में ही परिसमाप्त (चरम सीमा को प्राप्त) होते हैं।

English Translation

O scorcher of foes, the sacrifice of knowledge is superior to the sacrifice of material possessions. All actions in their entirety, O Partha, culminate in knowledge.

टीका / Commentary

कृष्ण अब स्पष्ट करते हैं कि सभी यज्ञों में सर्वोच्च ज्ञान-यज्ञ है। बाह्य पदार्थों (द्रव्य) से किए गए यज्ञ अपने आप में सीमित हैं, किन्तु ज्ञान-यज्ञ (आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास) सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि यह साधक को मोक्ष के द्वार तक ले जाता है। अंततः सभी कर्मों की परिणति ज्ञान में ही होती है—अर्थात् ज्ञान ही कर्मों का चरम लक्ष्य है।