ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 32

श्लोक ३२ में कहा गया है कि वेदों में अनेक यज्ञों का वर्णन है, उन सबको कर्मज जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

संस्कृत श्लोक

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥

evaṃ bahu-vidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe | karmajān viddhi tān sarvān evaṃ jñātvā vimokṣyase ||32||

पदच्छेद / शब्दार्थ

एवम्: इस प्रकार; बहुविधा: अनेक प्रकार के; यज्ञा: यज्ञ; वितता: विस्तृत; ब्रह्मणः: वेदों के; मुखे: मुख में (द्वारा); कर्मजान्: कर्मों से उत्पन्न; विद्धि: जानो; तान्: उन; सर्वान्: सबको; एवम्: इस प्रकार; ज्ञात्वा: जानकर; विमोक्ष्यसे: मुक्त हो जाओगे।

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों के मुख (द्वारा) विस्तृत रूप से कहे गए हैं। उन सबको कर्मों से उत्पन्न जानो और इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

English Translation

Thus, manifold sacrifices are spread out in the Vedas. Know them all to be born of action, and knowing thus, you shall be liberated.

टीका / Commentary

कृष्ण अब यज्ञों का सार समझाते हैं। सभी यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होते हैं। वे चाहे बाह्य हों या आंतरिक, सभी का आधार कर्म है। इन यज्ञों के मूल तत्व (ज्ञान) को समझ लेने पर साधक समस्त कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाता है। यहाँ "ब्रह्मणो मुखे" का अर्थ है वेदों के वचनों द्वारा। वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है, पर उन सबका अंतिम लक्ष्य एक ही है—आत्मज्ञान।