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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 32

अध्याय 4 · श्लोक 32

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥

evaṃ bahu-vidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe | karmajān viddhi tān sarvān evaṃ jñātvā vimokṣyase ||32||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

एवम्: इस प्रकार; बहुविधा: अनेक प्रकार के; यज्ञा: यज्ञ; वितता: विस्तृत; ब्रह्मणः: वेदों के; मुखे: मुख में (द्वारा); कर्मजान्: कर्मों से उत्पन्न; विद्धि: जानो; तान्: उन; सर्वान्: सबको; एवम्: इस प्रकार; ज्ञात्वा: जानकर; विमोक्ष्यसे: मुक्त हो जाओगे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों के मुख (द्वारा) विस्तृत रूप से कहे गए हैं। उन सबको कर्मों से उत्पन्न जानो और इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

English Translation

Thus, manifold sacrifices are spread out in the Vedas. Know them all to be born of action, and knowing thus, you shall be liberated.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अब यज्ञों का सार समझाते हैं। सभी यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होते हैं। वे चाहे बाह्य हों या आंतरिक, सभी का आधार कर्म है। इन यज्ञों के मूल तत्व (ज्ञान) को समझ लेने पर साधक समस्त कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाता है। यहाँ "ब्रह्मणो मुखे" का अर्थ है वेदों के वचनों द्वारा। वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है, पर उन सबका अंतिम लक्ष्य एक ही है—आत्मज्ञान।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।