ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 31

श्लोक ३१ में कहा गया है कि यज्ञ के शेष (प्रसाद) को भोगने वाले ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, और यज्ञ न करने वाले को इस लोक में भी सुख नहीं मिलता।

संस्कृत श्लोक

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥

yajña-śiṣṭāmṛta-bhujo yānti brahma sanātanam | nāyaṃ loko ’sty ayajñasya kuto ’nyaḥ kuru-sattama ||31||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यज्ञशिष्ट: यज्ञ से बचे हुए; अमृत: अमृत (प्रसाद) को; भुज: भोगने वाले; यान्ति: जाते हैं; ब्रह्म: ब्रह्म को; सनातनम्: सनातन; न: नहीं; अयम्: यह; लोक: लोक; अस्ति: है; अयज्ञस्य: यज्ञ न करने वाले के लिए; कुत: कहाँ; अन्य: अन्य (लोक); कुरुसत्तम: हे कुरुश्रेष्ठ।

हिंदी अनुवाद

यज्ञ से बचे हुए अमृत (प्रसाद) को भोगने वाले योगीजन सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ न करने वाले के लिए तो यह (मनुष्य) लोक भी सुखद नहीं है, फिर परलोक (सुखद) कैसे हो सकता है?

English Translation

Those who partake of the nectar (the remnants) of a sacrifice attain the eternal Brahman. For one who does not perform any sacrifice, neither this world nor the next is happy, O best of the Kurus.

टीका / Commentary

इस श्लोक में भगवान पिछले श्लोकों में वर्णित यज्ञों के फल का उपसंहार करते हैं। यज्ञ के शेष (प्रसाद) का भोग करने वाले साधक सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यह "प्रसाद" शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि योगी अपने कर्मों के फल के स्वामी स्वयं को न मानकर उसे ईश्वर को अर्पित कर देते हैं और जो कुछ ईश्वर की कृपा से वापस मिलता है, उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यही कर्मयोग का रहस्य है। दूसरी ओर, जो कोई भी यज्ञ (समर्पण भाव से किया गया कर्म) नहीं करता, उसे इस लोक में भी सुख नहीं मिल सकता, क्योंकि उसके कर्मों के शुभ फल नहीं होते और वह आसक्ति में बंधा रहता है। यदि इस लोक में ही सुख नहीं, तो परलोक (स्वर्ग या मोक्ष) में सुख की कल्पना करना तो व्यर्थ है। यह श्लोक सांसारिक जीवन में ही ईश्वर-समर्पित भाव से कर्म करने की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।