ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – श्लोक 30

श्लोक ३० में सभी यज्ञों के समान फल – ब्रह्मप्राप्ति – का वर्णन है।

संस्कृत श्लोक

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः | यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ||३०||

sarve 'py ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ | yajña-śiṣṭāmṛta-bhujo yānti brahma sanātanam ||30||

पदच्छेद / शब्दार्थ

सर्वे: सभी; अपि: भी; एते: ये; यज्ञविदः: यज्ञ के ज्ञाता; यज्ञक्षपितकल्मषाः: यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले; यज्ञशिष्टामृतभुजः: यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले; यान्ति: जाते हैं; ब्रह्म: ब्रह्म; सनातनम्: सनातन।

हिंदी अनुवाद

ये सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले हैं, और यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले हैं – वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

English Translation

All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed through sacrifice. They, who enjoy the nectar of the remnants of sacrifice, go to the eternal Brahman.

टीका / Commentary

सभी प्रकार के यज्ञ करने वालों का लक्ष्य एक ही है – ब्रह्म की प्राप्ति। वे यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ से उनके पाप नष्ट हो जाते हैं, और वे यज्ञ के शेष (प्रसाद) का भोग करते हुए अंततः सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।