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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 30

अध्याय 4 · श्लोक 30

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः | यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ||३०||

sarve 'py ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ | yajña-śiṣṭāmṛta-bhujo yānti brahma sanātanam ||30||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सर्वे: सभी; अपि: भी; एते: ये; यज्ञविदः: यज्ञ के ज्ञाता; यज्ञक्षपितकल्मषाः: यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले; यज्ञशिष्टामृतभुजः: यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले; यान्ति: जाते हैं; ब्रह्म: ब्रह्म; सनातनम्: सनातन।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

ये सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले हैं, और यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले हैं – वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

English Translation

All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed through sacrifice. They, who enjoy the nectar of the remnants of sacrifice, go to the eternal Brahman.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सभी प्रकार के यज्ञ करने वालों का लक्ष्य एक ही है – ब्रह्म की प्राप्ति। वे यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ से उनके पाप नष्ट हो जाते हैं, और वे यज्ञ के शेष (प्रसाद) का भोग करते हुए अंततः सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।