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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 · श्लोक 42

अध्याय 4 · श्लोक 42

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥

tasmād ajñāna-sambhūtaṃ hṛt-sthaṃ jñānāsinātmanaḥ | chittvainaṃ saṃśayaṃ yogam ātiṣṭhottiṣṭha bhārata ||42||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तस्मात्: इसलिए; अज्ञानसम्भूतम्: अज्ञान से उत्पन्न; हृत्स्थम्: हृदय में स्थित; ज्ञानासिना: ज्ञानरूपी तलवार से; आत्मनः: अपने; छित्त्वा: काटकर; एनम्: इस; संशयम्: संशय को; योगम्: योग में; आतिष्ठ: स्थित हो; उत्तिष्ठ: खड़ा हो; भारत: हे भारत।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इसलिए हे भारत! तू अज्ञान से उत्पन्न, हृदय में स्थित इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काट डाल। योग (समत्वबुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

English Translation

Therefore, O Bharata, cut this doubt, born of ignorance, residing in your heart, with the sword of knowledge. Resort to Yoga and arise!

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अध्याय ४ का समापन इस आह्वान के साथ होता है। कृष्ण अर्जुन को आदेश देते हैं कि वे अज्ञान से उत्पन्न संशय को, जो उनके हृदय में है, ज्ञानरूपी तलवार से काट डालें। फिर योग (समत्व की बुद्धि) में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़े हों। यह अध्याय ज्ञान और कर्म के समन्वय का उपदेश देकर अर्जुन को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।