क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 33

श्लोक ३३ में आकाश के दृष्टांत द्वारा आत्मा की निर्लिप्तता समझाई गई है।

संस्कृत श्लोक

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते | सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते || ३३ ||

yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate | sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate || 33 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यथा: जैसे; सर्वगतम्: सर्वव्यापी; सौक्ष्म्यात्: सूक्ष्म होने के कारण; आकाशम्: आकाश; न: नहीं; उपलिप्यते: लिप्त होता; सर्वत्र: सर्वत्र; अवस्थित: स्थित; देहे: शरीर में; तथा: वैसे ही; आत्मा: आत्मा; न: नहीं; उपलिप्यते: लिप्त होता

हिंदी अनुवाद

जैसे सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म होने के कारण कहीं भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में सर्वत्र स्थित आत्मा (परमात्मा) कहीं लिप्त नहीं होता।

English Translation

As the all-pervading ether is not tainted, because of its subtlety, so the Self, seated everywhere in the body, is not tainted.

टीका / Commentary

आकाश की भाँति आत्मा भी सर्वव्यापी और सूक्ष्म है, इसलिए शरीर के गुणों से लिप्त नहीं होती। Like the all-pervading ether, the Self is subtle and not tainted by the qualities of the body.