क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 32

श्लोक ३२ में बताया गया है कि परमात्मा शरीर में रहते हुए भी कर्म नहीं करता और न लिप्त होता है।

संस्कृत श्लोक

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः | शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || ३२ ||

anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ | śarīrastho'pi kaunteya na karoti na lipyate || 32 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अनादित्वात्: अनादि होने के कारण; निर्गुणत्वात्: निर्गुण होने के कारण; परमात्मा: परमात्मा; अयम्: यह; अव्यय: अविनाशी; शरीरस्थ: शरीर में स्थित; अपि: भी; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; न: नहीं; करोति: करता; न: नहीं; लिप्यते: लिप्त होता

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि होने के कारण और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।

English Translation

Being beginningless and devoid of qualities, this Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O son of Kunti, neither acts nor is tainted.

टीका / Commentary

परमात्मा अनादि और निर्गुण है, इसलिए शरीर में रहते हुए भी वह कर्म नहीं करता और न उनके फलों से लिप्त होता है। The Supreme Self, being beginningless and without qualities, does not act nor is affected by actions, even while residing in the body.