श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 32

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 38 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः | शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते || ३२ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अनादित्वात्
अनादि होने के कारण
निर्गुणत्वात्
निर्गुण होने के कारण
परमात्मा
परमात्मा
अयम्
यह
अव्यय
अविनाशी
शरीरस्थ
शरीर में स्थित
अपि
भी
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
करोति
करता
न
नहीं
लिप्यते
लिप्त होता

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि होने के कारण और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

गीता के इस अमोघ श्लोक के माध्यम से आत्मा, परमात्मा, कर्म और निर्लिप्तता के शाश्वत रहस्यों की विस्तृत व्याख्या।

अध्यात्म, कर्म और ब्रह्म का शाश्वत स्वरूप: एक व्यापक परिचय

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवद्वाणी और मोक्ष का मार्गदर्शक माना गया है। महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश आज भी संपूर्ण मानव जाति के लिए मानसिक संताप, कर्म बंधन और अस्तित्व संबंधी जिज्ञासाओं का एकमात्र समाधान प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुत श्लोक—"अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः | शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ||"—गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का अत्यंत महत्वपूर्ण और दार्शनिक दृष्टि से गांभीर्य लिए हुए श्लोक है।

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने उस परम शक्ति (परमात्मा) के मूल स्वभाव का पर्दाफाश किया है जो इस भौतिक जगत के कण-कण में व्याप्त होने के बावजूद इससे परे है। मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा संशय यह होता है कि यदि ईश्वर सब कुछ करने वाला है, तो क्या वह हमारे पाप-पुण्य और कर्मों के फलों से बंधा हुआ है? क्या शरीर के भीतर निवास करने वाली आत्मा या परमात्मा भी भौतिक विकारों से ग्रसित होती है? इन समस्त जटिल प्रश्नों का अत्यंत सहज, तार्किक और आध्यात्मिक उत्तर इस श्लोक में निहित है।

जब हम इस श्लोक के सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व का गहराई से अध्ययन करते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि यह केवल संस्कृत के कुछ श्लोक नहीं हैं, बल्कि यह मानव चेतना को उसके मूल स्रोत यानी सच्चिदानंद स्वरूप से जोड़ने का एक दिव्य सेतु हैं। आधुनिक युग की अंधी दौड़, मानसिक तनाव, और कर्मों के परिणाम की चिंता से ग्रस्त मनुष्य के लिए यह श्लोक एक अचूक औषधि की भांति कार्य करता है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार इस भौतिक शरीर रूपी मंदिर में रहते हुए भी अपने मूल दिव्य स्वभाव से विचलित न हों और संसार के द्वैतों से ऊपर उठकर परम शांति का अनुभव करें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं संदर्भ

॥ श्रीमद्भागवतगीता अध्याय १३, श्लोक ३२ ॥

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥ ३२ ॥


"Anaditvan nirgunatvat paramatmayam avyayah | Sharirastho 'pi kaunteya na karoti na lipyate ||"

संदर्भ एवं पूर्वपीठिका (Contextual Background):

श्रीमद्भागवतगीता के १३वें अध्याय का शीर्षक 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' है। इस अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को 'क्षेत्र' (यह भौतिक शरीर और प्रकृति) और 'क्षेत्रज्ञ' (शरीर को जानने वाली आत्मा और परमात्मा) के बीच के भेद को समझा रहे हैं। अर्जुन के पूछने पर कि प्रकृति क्या है, पुरुष क्या है, क्षेत्र क्या है, ज्ञान क्या है और ज्ञेय क्या है—भगवान विस्तार से सब कुछ स्पष्ट करते हैं। इसी शृंखला में, शरीर रूपी क्षेत्र में रहने वाले परमात्मा के निर्लिप्त और अकर्ता स्वरूप को इस ३२वें श्लोक में अत्यंत सुंदरता के साथ परिभाषित किया गया है। पाठकों को इस श्लोक का उच्चारण प्रातःकाल स्नान के पश्चात एकाग्र चित्त से करना चाहिए, जिससे मानसिक स्थिरता और आत्मबल में वृद्धि होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

संस्कृत भाषा के प्रत्येक पद में अगाध ज्ञान छिपा है। आइए इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अनादित्वत् (अनादित्वान्) शुरुआत या आदि से रहित होने के कारण जिसका कोई आरंभ नहीं है, जो काल की सीमा से परे है (अजन्मा और सनातन)।
निर्गुणत्वात् प्राकृत गुणों (सत्व, रज, तम) से रहित होने के कारण जो प्रकृति के तीनों गुणों से परे (निर्जीव या निरंजन) है, जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता।
परमात्मा परम आत्मा, सर्वोच्च ब्रह्म, ईश्वर समस्त जीवों के भीतर और बाहर व्याप्त वह सर्वोच्च चैतन्य सत्ता जो सबका संचालक है।
अयम् यह (प्रत्यक्ष उपस्थित चैतन्य) वह चेतना जो वर्तमान में भी इस शरीर के भीतर अनुभव की जा रही है।
अव्ययः क्षय रहित, कभी नष्ट न होने वाला, अविनाश जिसका कभी नाश नहीं होता, जो अपरिवर्तनीय और शाश्वत है।
शरीरस्थः + अपि शरीर में स्थित होने पर भी यद्यपि यह आत्मा/परमात्मा भौतिक शरीर (मांस-मज्जा) के भीतर निवास करता है...
कौन्तेय हे कुंतीपुत्र (अर्जुन को संबोधन) भगवान अर्जुन को उनके पराक्रमी और श्रेष्ठ कुल की याद दिलाते हुए संबोधित करते हैं।
न करोति न तो कुछ करता है, न ही कर्ता बनता है मूल रूप से वह किसी भी कर्म के कर्तापन के अहंकार या बंधन से मुक्त है।
न लिप्यते न ही लिप्त होता है, न बंधता है कर्मों के शुभ या अशुभ फल (पाप-पुण्य) उसे स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे जल में कमल का पत्ता।
विस्तृत भावार्थ:

इस श्लोक का समग्र भाव यह है कि परमात्मा का कोई आदि (प्रारंभ) नहीं है क्योंकि वह काल से परे है। वह प्रकृति के त्रिगुणात्मक बंधनों (सत, रज, तम) से भी परे (निर्गुण) है। इसलिए वह 'अव्यय' यानी कभी क्षीण न होने वाला है। हे अर्जुन! यद्यपि यह परमात्मा प्रत्येक प्राणी के शरीर के भीतर निवास करता है, परंतु वह न तो किसी कर्म को करता है और न ही कर्मों के अच्छे-बुरे फलों से लिप्त होता है। जिस प्रकार आकाश में धूल उड़ने से आकाश गंदा नहीं होता, उसी प्रकार शरीर के विकार परमात्मा को स्पर्श नहीं कर सकते।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के मोर्चे पर जब अर्जुन कौरव सेना को अपने ही गुरुओं, सगे-सम्बन्धियों और मित्रों से सजा हुआ देखते हैं, तो उनका गांडीव हाथ से छूट जाता है। विषाद और मोह के सागर में डूबे अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से शरण मांगते हैं। तब भगवान कृष्ण उन्हें ज्ञान, कर्म और भक्तियोग के विभिन्न आयामों से परिचित कराते हैं।

तेरहवें अध्याय की यह पृष्ठभूमि महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के 'भीष्म पर्व' के अंतर्गत आती है। इस संवाद में क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) के रहस्य को समझाने के लिए महर्षि व्यास ने वेदों और उपनिषदों के सार को संकलित किया है। वैदिक काल में ऋषि-मुनि अरण्यों (वनों) में बैठकर इसी तथ्य पर विचार करते थे कि "मैं कौन हूँ?" शरीर और आत्मा का यह भेद ही वेदों के ज्ञानकांड का मुख्य विषय है।

कठोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद में भी इसी प्रकार के मंत्र मिलते हैं जो यह बताते हैं कि परमात्मा शरीर रूपी वृक्ष पर बैठा हुआ एक ऐसा द्रष्टा (देखने वाला) है जो स्वयं कुछ नहीं खाता, बल्कि केवल देखता रहता है (द्वार् सुपर्णा सयुजा सखाया...)। भगवद्गीता इस उपनिषदिक ज्ञान का सबसे सरल और व्यावहारिक रूप प्रस्तुत करती है। महर्षि व्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह स्थापित किया कि मनुष्य जब तक अपने शरीर को ही 'मैं' मानता रहेगा, तब तक वह दुखों के चक्र में फंसा रहेगा। परंतु जैसे ही वह यह जान लेता है कि उसके भीतर बैठा परमात्मा अकर्ता और निर्लिप्त है, वह जीवन-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है।

यह ऐतिहासिक संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच की बात नहीं है, बल्कि यह हर उस मनुष्य के लिए मार्गदर्शिका है जो जीवन की आपाधापी में अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान खो बैठा है। भारतीय मनीषियों ने इसी ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक और लिखित परंपरा के माध्यम से सहेज कर रखा है ताकि मानवता अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ सके।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भागवतगीता के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

रोजाना इस श्लोक का पाठ करने से मन के उच्चाटन, तनाव, और भविष्य की चिंता से मुक्ति मिलती है, क्योंकि यह सिखाता है कि सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है।

2. कर्म बंधनों से मुक्ति (निर्लिप्त भाव)

यह श्लोक मनुष्य को 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' के सिद्धांत पर चलना सिखाता है, जिससे वह फल की आसक्ति से मुक्त होकर कार्य करता है।

3. सकारात्मक और ऊर्जावान आभा (Aura)

दिव्य श्लोकों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Vibrations) शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मक और सात्विक आभा का निर्माण करते हैं।

4. आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization)

साधक धीरे-धीरे यह अनुभव करने लगता है कि उसका वास्तविक स्वरूप नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अमर आत्मा है, जो परमात्मा का ही अंश है।

5. भय और शोक का नाश

मृत्यु, हानि और अपमान जैसे सांसारिक भयों के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है, क्योंकि साधक समझ जाता है कि आत्मा अछूती और अविनाशी है।

6. संकेंद्रण और एकाग्रता में वृद्धि

संस्कृत श्लोकों के स्मरण और उच्चारण से मस्तिष्क की स्मरण शक्ति (Memory) और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Focus) तीव्र होती है।

7. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

ईश्वर के इस स्वरूप के चिंतन मात्र से पूर्व संचित बुरे कर्मों के संस्कारों का प्रभाव क्षीण होने लगता है और बुद्धि सात्विक बनती है.

8. भगवद्कृपा की प्राप्ति

गीता के वचनों को अपने जीवन में उतारने वाले भक्त पर भगवान श्री कृष्ण की अहैतुकी कृपा और योगक्षेम का आशीर्वाद सदैव बना रहता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों, पारंपरिक संस्कृत व्याकरण और प्रामाणिक टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और श्रीमद्भगवद्गीता प्रेस गोरखपुर के संस्करण) के गहन अध्ययन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, उपनिषदों और पुराणों के शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल, निष्कलंक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुंचाना है।

इस लेख की प्रत्येक पंक्ति यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों को धार्मिक भ्रांतियों से दूर रखते हुए विशुद्ध अद्वैत और भक्तियोग का सही मर्म समझ आए। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई भी प्रश्न या सुझाव है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भागवतगीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का 32वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने शरीर (क्षेत्र) और आत्मा/परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) के अंतर को विस्तार से समझाया है।

इसका अर्थ यह है कि परमात्मा शरीर रूपी मंदिर में साक्षी भाव (द्रष्टा) के रूप में निवास करता है। भौतिक शरीर और प्रकृति (त्रिगुणात्मक माया) सारे कर्म करती है, परंतु परमात्मा उससे सर्वथा अलिप्त और निर्विकार रहता है—जैसे जल में कमल का पत्ता पानी से भीगता नहीं है।

जब मनुष्य यह समझ जाता है कि वह केवल एक निमित्त मात्र है और भीतर बैठा परमात्मा अकर्ता व निर्लिप्त है, तो उसके मन से कर्मों के फलों का अनावश्यक बोझ और चिंता समाप्त हो जाती है। यह दृष्टिकोण उसे मानसिक रूप से शांत, स्थिर और तनावमुक्त बनाता है।

'अनादि' का अर्थ है जिसका कोई प्रारंभ या उत्पत्ति काल न हो (जो हमेशा से है)। 'निर्गुण' का अर्थ है जो प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के बंधनों से परे है और किसी भी भौतिक विकार से अछूता है।

हाँ, बिल्कुल! श्रीमद्भागवतगीता का प्रत्येक श्लोक संपूर्ण मानव जाति केल्याण के लिए है। कोई भी व्यक्ति किसी भी आयु वर्ग में बिना किसी कठिन अनुष्ठान के अपनी दैनिक पूजा या संध्या-वंदन के समय श्रद्धापूर्वक इस श्लोक का पाठ और स्मरण कर सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कौन्तेय! यह परमात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण अविनाशी है। शरीर में स्थित होने पर भी न तो कर्म करता है और न लिप्त होता है।

Being beginningless and devoid of qualities, this Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O son of Kunti, neither acts nor is tainted.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मा नित्य अकर्ता है, उस पर किसी कर्म का लेप नहीं होता।

The Self is eternally actionless; no action can taint it.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 32 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 32/35 91% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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