श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 31

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 54 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || ३१ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
यदा
जब
भूतपृथग्भावम्
भूतों के पृथक्-पृथक् भाव को
एकस्थम्
एक में स्थित
अनुपश्यति
देखता है
तत
उससे
एव
ही
च
और
विस्तारम्
विस्तार को
ब्रह्म
ब्रह्म
सम्पद्यते
प्राप्त हो जाता है
तदा
तब

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब मनुष्य यह देख लेता है कि सम्पूर्ण प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्तिलोक.इन विशेष अध्ययन

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) के इस पावन श्लोक का अद्वैत दर्शन, दार्शनिक विश्लेषण और समग्र आध्यात्मिक मार्गदर्शन।

प्रस्तावना: अद्वैत दर्शन और ब्रह्मांडीय चेतना का सार

सनातन संस्कृति और वैदिक वांग्मय में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात भगवद्वाणी और मानव जीवन के समस्त संशयों का निवारण करने वाला मोक्ष-ग्रंथ माना गया है। भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय, जिसे 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, उसमें प्रकृति, पुरुष, जीव और ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। प्रस्तुत श्लोक — "यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || ३१ ||" — आध्यात्मिक साधना की पराकाष्ठा और अद्वैत दर्शन की वह सर्वोच्च अवस्था है, जहाँ साधक अपनी सीमित वैयक्तिक चेतना (Individual Consciousness) को ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) के साथ लीन कर देता है।

इस लोक-प्रसिद्ध श्लोक का मूल मर्म यह है कि जब मनुष्य अपनी अंतर्दृष्टि (Divine Eye / Spiritual Vision) को जागृत कर लेता है, तब उसे इस संपूर्ण चराचर जगत में — जिसमें भिन्न-भिन्न रूप, नाम, गुण और स्वभाव वाले जीव, वस्तुएं और प्रकृतियां सम्मिलित हैं — किसी भी प्रकार की मौलिक भिन्नता या अनेकता नजर नहीं आती। उसे हर कण में एक ही परमात्मा की ऊर्जा प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है। यह वह अवस्था है जहाँ द्वैत (Dualism) का भ्रम समाप्त होकर अद्वैत (Non-duality) की अनुभूति स्वतः सिद्ध हो जाती है। भक्तलोक.इन (Bhaktilok.in) के इस विस्तृत आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि, व्यावहारिक जीवन में इसके अनुप्रयोग और इसके निरंतर पठन से मिलने वाले असीम मानसिक व आध्यात्मिक लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता के इस तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) के इस श्लोक का पाठ पूर्ण विधि-विधान, शुद्ध उच्चारण और एकाग्रचित्त होकर करना चाहिए। यहाँ श्लोक का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत है:

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३१ ॥

श्लोक गायन एवं पठन विधि:
  • पवित्रता: प्रातः काल ब्रह्म बेला में स्नान कर स्वच्छ श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें। अपने पूजा कक्ष या ध्यान केंद्र को गंगा जल से पवित्र करें।
  • आसन: कुशा या ऊन के आसन पर सुखासन या पद्मासन में रीढ़ की हड्डी को सीधा करके बैठें।
  • मानसिक एकाग्रता: अपनी दोनों आँखें बंद कर भ्रू-मध्य (आज्ञा चक्र) पर ध्यान केंद्रित करें और भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का मानसिक स्मरण करें।
  • उच्चारण: श्लोक का सस्वर पाठ करते समय प्रत्येक वर्ण (जैसे- भूतपृथग्भावम्, एकस्थम्, अनुपश्यति) का स्पष्ट उच्चारण करें ताकि नादब्रह्म की ऊर्जा आपके भीतर प्रवाहित हो सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

किसी भी श्लोक के आन्तरिक रहस्यों को समझने के लिए उसके प्रत्येक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
यदा (Yada) जब / जिस समय साधक की साधना और विवेक बुद्धि जब परिपक्व हो जाती है, उस विशिष्ट कालखंड की ओर संकेत।
भूत (Bhuta) प्राणी / जीव / भूतमात्र इस सृष्टि के सभी चर और अचर प्राणी, जिनमें मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंग सभी सम्मिलित हैं।
पृथग्भावम् (Prithagbhavam) भिन्न-भिन्न भाव / पृथक अस्तित्व जो संसार में अलग-अलग नाम, रूप और स्वभाव वाले प्रतीत होते हैं, उनकी विविधता।
एकस्थम् (Ekastham) एक ही आधार में स्थित यह समझना कि ये समस्त भिन्न रूप किसी अन्य स्वतंत्र सत्ता के नहीं, बल्कि एक ही परमात्मा (ब्रह्म) में स्थित हैं।
अनुपश्यति (Anupashyati) भली-भांति देखता है / अनुभव करता है केवल शारीरिक नेत्रों से नहीं, बल्कि प्रज्ञा चक्षु (Divine Intellect) से उस एकत्व का प्रत्यक्ष दर्शन करना।
ततः एव च (Tata Eva Cha) और उसी से ही उसी एक मूल ब्रह्म सत्ता से ही यह सारा प्रपंच और विविधता उत्पन्न हुई है, किसी अन्य बाहरी शक्ति से नहीं।
विस्तारम् (Vistaram) विस्तार / फैलाव / प्रसार ब्रह्म का ही यह संपूर्ण ब्रह्मांडीय विस्तार (Manifestation) है, जो महासमुद्र की लहरों के समान है।
ब्रह्म (Brahma) परमाब्रह्म / परम सत्य वह असीम, अनंत, सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा जो इस संपूर्ण जगत का उपादान और निमित्त कारण है।
सम्पद्यते (Sampadyate) प्राप्त हो जाता है / तद्रूप हो जाता है साधक अपनी व्यक्तिगत पहचान को मिटाकर उस अनंत ब्रह्म में पूर्णतः तल्लीन या एकरूप हो जाता है।
तदा (Tada) उस समय / उसी क्षण वह वर्तमान क्षण जब जीव को कैवल्य, मुक्ति या जीवन्मुक्ति की प्राप्ति होती है।
विस्तृत भावार्थ:

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जब कोई विरला साधक अपनी ज्ञान चक्षुओं से यह प्रत्यक्ष देख लेता है कि संसार के तमाम भूत-प्राणी, जो ऊपरी तौर पर एक-दूसरे से भिन्न और अलग दिखाई देते हैं, वे सब के सब मूल रूप से एक ही परमब्रह्म में टिके हुए हैं और इस समस्त विविधता का विस्तार भी उसी एक ब्रह्म से हुआ है, तब वह साधक तात्कालिक रूप से ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। उसके लिए जन्म-मृत्यु का चक्र और संसार का बंधन समाप्त हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

गीता के तेरहवें अध्याय की पृष्ठभूमि और कुरुक्षेत्र का कुरुक्षेत्र

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय का नाम 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' है। महाभारत के युद्ध के ठीक आरंभ में, जब अर्जुन विषाद से घिरकर अपने ही स्वजनों के वध के पाप से डरकर गांडीव नीचे रख देता है, तब भगवान श्रीकृष्ण उसे जीवन और जगत के परम सत्य का बोध कराने के लिए योगेश्वर के रूप में प्रकट होते हैं। कुरुक्षेत्र की उस धर्मभूमि पर, जहाँ कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, जीवन और मृत्यु का सबसे बड़ा संघर्ष चल रहा था। ऐसे संकटकाल में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया, वह केवल दो सेनाओं का युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले मोह और ज्ञान के आंतरिक युद्ध का समाधान था।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद

तेरहवें अध्याय के प्रारंभ में ही भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'क्षेत्र' (शरीर, प्रकृति, अहंकार, बुद्धि, इंद्रियां और पांच महाभूत) तथा 'क्षेत्रज्ञ' (शरीर को जानने वाली जीवात्मा और परमात्मा) के बीच का अंतर समझाते हैं। अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि प्रकृति के इन अनंत रूपों और जीवों में क्या कोई एक ही सूत्र पिरोया हुआ है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक 31 के माध्यम से अद्वैत वेदांत के उस परम सिद्धांत की घोषणा की, जिसे उपनिषदों में "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (यह संपूर्ण जगत ब्रह्म ही है) कहा गया है।

ऋषि परंपरा और वैदिक संदर्भ

इस दार्शनिक प्रसंग की जड़ें वेदों और उपनिषदों में गहरी उतरी हुई हैं। मुंडकोपनिषद और छंदोग्य उपनिषद में महर्षियों ने इसी तथ्य को प्रतिपादित किया है कि जैसे एक ही सोने से अनेक प्रकार के आभूषण (कंगन, हार, कुंडल) बनाए जाते हैं, और आभूषणों के नाम व रूप भिन्न होने के बावजूद उनका मूल तत्व केवल सोना ही होता है, ठीक उसी प्रकार इस संपूर्ण ब्रह्मांड में अनगिनत नाम और रूप वाले जीव हैं, किंतु सबका मूल आधार केवल एक ही परमब्रह्म है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के इस पर्व में गीता के माध्यम से इसी सनातन सत्य को मानव जाति के कल्याण के लिए लिपिबद्ध किया है, ताकि हर कालखंड का मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर अज्ञान रूपी अंधकार से बाहर आ सके।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेकों मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace)

इस श्लोक के चिंतन से संसार की उठापटक, उतार-चढ़ाव और द्वंद्वों के बीच भी मन अडिग रहता है। साधक समझ जाता है कि सब कुछ एक ही ब्रह्म की लीला है, जिससे चिंताएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार (Positive Aura)

जब कोई व्यक्ति यह भाव धारण करता है कि हर जीव में वही परमात्मा विद्यमान है, तो उसके भीतर से ईर्ष्या, द्वेष और घृणा समाप्त हो जाती है, जिससे उसका सूक्ष्म शरीर और औरा अत्यंत पवित्र व प्रकाशमान हो जाता है।

3. कार्मिक शुद्धि और पापों का क्षय (Karmic Purification)

समन्वयवादी दृष्टि अपनाने से मनुष्य किसी भी प्राणी को कष्ट देने से बचता है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' की यह भावना उसके संचित कर्मों की शुद्धि करती है और नए बुरे कर्मों के बंधन से उसकी रक्षा करती है।

4. अद्वैत बोध और आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization)

यह श्लोक साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) की अनुभूति के निकट ले जाता है। व्यक्ति अपनी नश्वर देह से ऊपर उठकर अपनी अमर आत्मा और परमात्मा के एकत्व को अनुभव करने लगता है।

5. अहंकार का पूर्ण नाश (Ego Dissolution)

जब यह बोध हो जाता है कि सब कुछ उस एक ही ब्रह्म का विस्तार है, तो 'मैं और मेरा' (Mamatva and Ahankara) का भ्रमजाल टूट जाता है, जो कि आध्यात्मिक प्रगति का सबसे बड़ा मार्ग है।

6. भगवान की अहैतुकी कृपा प्राप्ति (Divine Grace)

जो भक्त समस्त प्राणियों में परमात्मा के दर्शन करता है, भगवान श्रीकृष्ण ऐसे भक्त को अत्यंत प्रिय मानते हैं (गीता अध्याय 12, श्लोक 4)। उसे भगवद कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है।

7. भय और मृत्यु के संताप से मुक्ति (Fearlessness)

मृत्यु का भय केवल शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण होता है। जब साधक ब्रह्म के अनंत स्वरूप को जान लेता है, तब उसके मन से मृत्यु और भविष्य का भय हमेशा के लिए तिरोहित हो जाता है।

8. समाज में सद्भाव और करुणा की स्थापना (Universal Compassion)

यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण समाज में ऊंच-नीच, जाति-पाति और भेदभाव के पाखंडों को समाप्त कर संपूर्ण मानवता के प्रति प्रेम, करुणा और सेवा भाव का बीजगणित तैयार करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तलोक.इन (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह आलेख सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न टीकाग्रंथों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञाननानंद जी महाराज के संस्मरणों) तथा अद्वैत वेदांत के पारंपरिक सिद्धान्तों का गहन अध्ययन करने के पश्चात विद्वान संस्कृत भाषाविदों और आध्यात्मिक आचार्यों की देखरेख में तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक केवल शाब्दिक अर्थ पहुँचाना नहीं, बल्कि वेदों और पुराणों के उस मूल संदेश को सुगम हिंदी में प्रस्तुत करना है जो मानव जीवन को सुखी, शांत और मोक्षगामी बना सके। इस लेख में किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या अप्रमाणित दावों से परहेज किया गया है तथा शास्त्रीय तथ्यों की पूर्ण प्रमाणिकता का ध्यान रखा गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

श्रीमद्भगवद्गीता का तेरहवां अध्याय 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' कहलाता है। इसमें मुख्य रूप से भौतिक शरीर (क्षेत्र) और इसके भीतर निवास करने वाली आत्मा तथा परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। इसके साथ ही प्रकृति, पुरुष, ज्ञान के साधनों और मोक्ष प्राप्ति के दार्शनिक मार्गों का अत्यंत सुंदर विवेचन किया गया है।

इस कथन का व्यावहारिक अर्थ यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में जिन भी व्यक्तियों, जीवों या वस्तुओं से मिलते हैं, उन सबके भीतर एक ही चेतना या परमात्मा का अंश विद्यमान है। जब हम यह समझ जाते हैं, तब हमारे मन से भेदभाव, ईर्ष्या, और द्वेष समाप्त हो जाते हैं और हम हर प्राणी के साथ प्रेम और आदर का व्यवहार करने लगते हैं।

'ब्रह्म को प्राप्त होने' का अर्थ केवल मृत्यु के उपरांत मिलने वाली मुक्ति नहीं है, बल्कि इसे 'जीवनमुक्ति' (Liberation while living) भी कहा जाता है। जो साधक इसी जीवन में अपने अहंकार और अज्ञान को मिटाकर संपूर्ण जगत में एक ही परमात्मा के दर्शन कर लेता है, वह इसी देह में रहते हुए ब्रह्म का अनुभव कर लेता है और उसके सारे मानसिक बंधन कट जाते हैं।

इस श्लोक का पाठ और मनन प्रातःकाल ब्रह्म बेला (सूर्योदय से पूर्व) में करना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि इस समय मन शांत और प्रदुष्मण-मुक्त होता है। इसके अतिरिक्त, संध्याकाल में ध्यान के समय या किसी भी शांत एकांत स्थान पर इसका पठन मानसिक ऊर्जा को बढ़ाने वाला होता है।

अद्वैत दर्शन (Non-duality) में इस श्लोक को सर्वोच्च प्रमाण माना जाता है क्योंकि यह स्पष्ट रूप से जीव और ब्रह्म की एकता ('एकस्थम्... ब्रह्म सम्पद्यते') की पुष्टि करता है। वहीं, विशिष्टाद्वैत दर्शन में इसे इस रूप में देखा जाता है कि संपूर्ण जगत ब्रह्म का शरीर या विस्तार है, और जीव ब्रह्म का ही एक अंश है। दोनों ही दृष्टियों से यह श्लोक साधक को सर्वोच्च आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर करता है।

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"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः"

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जब मनुष्य यह देख लेता है कि समस्त प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

When a man realizes that the diversity of beings rests in the One and that their expansion is from That alone, he then attains Brahman.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

एकत्व का अनुभव ही ब्रह्मप्राप्ति है।

The experience of oneness is the attainment of Brahman.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 31 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 31/35 89% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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