क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 31
श्लोक ३१ में बताया गया है कि सब प्राणियों को एक ब्रह्म में देखने वाला ब्रह्म को प्राप्त होता है।
संस्कृत श्लोक
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा || ३१ ||
yadā bhūtapṛthagbhāvamekasthamanupaśyati | tata eva ca vistāraṃ brahma sampadyate tadā || 31 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यदा: जब; भूतपृथग्भावम्: भूतों के पृथक्-पृथक् भाव को; एकस्थम्: एक में स्थित; अनुपश्यति: देखता है; तत: उससे; एव: ही; च: और; विस्तारम्: विस्तार को; ब्रह्म: ब्रह्म; सम्पद्यते: प्राप्त हो जाता है; तदा: तब
हिंदी अनुवाद
जब मनुष्य यह देख लेता है कि सम्पूर्ण प्राणियों के पृथक्-पृथक् भाव एक (ब्रह्म) में ही स्थित हैं और उसी से उनका विस्तार हुआ है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
English Translation
When a man realizes that the diversity of beings rests in the One and that their expansion is from That alone, he then attains Brahman.
टीका / Commentary
जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि सब वस्तुएँ एक ही ब्रह्म से उत्पन्न और उसी में स्थित हैं, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। When one realizes that all diversity arises from and rests in the One Brahman, one attains Brahman.