क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 30
श्लोक ३० में बताया गया है कि सभी कर्म प्रकृति के हैं, आत्मा अकर्ता है।
संस्कृत श्लोक
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः | यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति || ३० ||
prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ | yaḥ paśyati tathātmānamakartāraṃ sa paśyati || 30 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
प्रकृत्या: प्रकृति द्वारा; एव: ही; च: और; कर्माणि: कर्म; क्रियमाणानि: किये जाते हुए; सर्वशः: सब प्रकार से; य: जो; पश्यति: देखता है; तथा: तथा; आत्मानम्: आत्मा को; अकर्तारम्: अकर्ता; स: वह; पश्यति: देखता है
हिंदी अनुवाद
जो यह देखता है कि सम्पूर्ण कर्म प्रकृति द्वारा ही किये जा रहे हैं और आत्मा अकर्ता है, वही यथार्थ देखता है।
English Translation
He who sees that all actions are performed by Prakriti alone, and that the Self is actionless, he alone sees (the truth).
टीका / Commentary
यथार्थ दृष्टि वह है जिसमें सभी क्रियाएँ प्रकृति को अर्पित कर दी जाती हैं और आत्मा को निर्लिप्त देखा जाता है। True vision is attributing all actions to Prakriti and seeing the Self as actionless.