श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 29

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 46 मिनट का पठन 131 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् | न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् || २९ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
समम्
समान
पश्यन्
देखता हुआ
हि
निश्चय ही
सर्वत्र
सर्वत्र
समवस्थितम्
समभाव से स्थित
ईश्वरम्
ईश्वर को
न
नहीं
हिनस्ति
हिंसा करता
आत्मना
अपने द्वारा
आत्मानम्
आत्मा को
तत
इसलिए
याति
जाता है
पराम्
परम
गतिम्
गति को

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

क्योंकि वह सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, इसलिए वह अपने द्वारा अपनी आत्मा की हिंसा नहीं करता (अर्थात् आत्मा को शरीर समझकर उसका अहित नहीं करता) और तब परमगति को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: अद्वैत चेतना और समत्व योग का महात्म्य

सनातन हिंदू धर्म और वेदान्त दर्शन में भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु समस्त उपनिषदों का सार और मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने का जीवंत मार्गदर्शक माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का यह उनतीसवां श्लोक—"समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् | न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्"—समस्त आध्यात्मिक साधनाओं का सर्वोच्च शिखर और पराकाष्ठा है। यह श्लोक मनुष्य को उस दिव्य दृष्टि से परिचित कराता है, जिसके जाग्रत होते ही संसार के सारे भेद-भाव, ऊंच-नीच, राग-द्वेष और अहंकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

जब एक साधक अपनी अंतर्दृष्टि से यह अनुभव करने लगता है कि कण-कण में, स्थावर और जंगम में, देवता से लेकर कीट-पतंगे तक में एक ही अविभाज्य परमेश्वर समभाव से स्थित है, तब उसके भीतर की संकीर्ण मानसिकता का अंत हो जाता है। सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है) के उद्घोष का मूल आधार है। जब हम सबमें एक ही ईश्वर का दर्शन करते हैं, तो हम किसी दूसरे से घृणा नहीं कर सकते, क्योंकि घृणा करना वस्तुतः अपने ही भीतर बैठे परमात्मा के अंश के साथ अन्याय करना है। यही कारण है कि यह श्लोक मोक्ष, मुक्ति और 'परां गति' (परम धाम) का सीधा मार्ग प्रशस्त करता है। भक्तीलॊक के इस विशेष आलेख में हम इसी महामंत्र के शाब्दिक सौंदर्य, दार्शनिक गहराई और व्यावहारिक जीवन में इसके प्रयोग पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ त्रयोदशोऽध्यायः — श्लोक २९

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २९ ॥

संस्कृत पदच्छेद: समम् पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितम् ईश्वरम् । न हिनस्ति आत्मना आत्मानम् ततः याति पराम् गतिम् ॥

पाठ विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:

इस श्लोक का दैनिक जीवन में सस्वर पाठ करने से पूर्व साधक को पवित्रता का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए। प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान उपरांत शांत चित्त होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठना चाहिए। भगवद्गीता के इस श्लोक का मानसिक जप या उच्चारण करते समय यह भावना रखनी चाहिए कि हमारा यह शरीर भी उसी परमपिता परमेश्वर का मंदिर है और संसार के समस्त जीव हमारे अपने ही स्वरूप का विस्तार हैं। प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) इस श्लोक का ध्यान करने से चित्त की वृत्तियां शांत होती हैं और उच्च कोटि की आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

गीता के प्रत्येक शब्द में गूढ़ वेदांती रहस्य छिपा है। आइए इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
समम् समान रूप से, एक सा भेदभाव रहित दृष्टि, जहाँ अमीर-गरीब, मित्र-शत्रु का भेद मिट जाए।
पश्यन् हि जो देखता है वास्तव में केवल नेत्रों से देखना नहीं, अपितु ज्ञानचक्षु से सत्य का साक्षात्कार करना।
सर्वत्र सभी स्थानों पर, सब भूतों में सृष्टि के कण-कण में, जड़ और चेतन दोनों अवस्थाओं में व्याप्त चेतना।
समवस्थितम् समान रूप से स्थित परमात्मा की उपस्थिति किसी में कम या अधिक नहीं, सर्वत्र पूर्ण रूप से है।
ईश्वरम् परमेश्वर, नियंता, भगवान समस्त ब्रह्मांड के स्वामी, जो जीवों के भीतर अंतर्यामी रूप में विराजमान हैं।
न हिनस्ति नष्ट नहीं करता, हिंसा नहीं करता किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या घात की भावना से मुक्त हो जाना।
आत्मना अपने द्वारा, मन या बुद्धि से स्वयं की चेतना और विवेक के माध्यम से अपने आचरण को शुद्ध रखना।
आत्मानम् अपनी आत्मा को, अपने स्वरूप को जीवात्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव करना, स्व-स्वरूप को न भूलना।
ततः तदनन्तर, उसके उपरांत समत्व दृष्टि प्राप्त होने और हिंसा से मुक्त होने के तुरंत बाद की अवस्था।
याति प्राप्त होता है, गमन करता है जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होना।
परां गतिम् परम गति, मोक्ष, सर्वोच्च धाम ब्रह्मलीन होने की अवस्था, जहाँ आनंद और शांति की कोई सीमा नहीं रहती।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के महायुद्ध के आरंभ में जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन अपने स्वजनों—भीष्म, द्रोण, और कौरवों को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन और मृत्यु के वास्तविक सत्य का बोध कराने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देते हैं। तेरहवां अध्याय 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' विशेष रूप से इस बात पर प्रकाश डालता है कि यह शरीर क्या है (क्षेत्र) और इसको जानने वाली चेतना या आत्मा क्या है (क्षेत्रज्ञ)।

इस प्रसंग में महर्षि वेद व्यास ने पुराणों और वेदों के सार को संकलित किया है। वैदिक काल से ही ऋषि-मुनियों का यह मानना रहा है कि जब तक मनुष्य अज्ञानता के आवरण में घिरा रहता है, तब तक वह स्वयं को इस नश्वर शरीर से जोड़कर देखता है और संसार के अन्य जीवों को अपने से भिन्न या पराया मानता है। वेदों के महान महावाक्य — 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ), 'अयम् आत्मा ब्रह्म' (यह आत्मा ब्रह्म है) और 'तत्त्वमसि' (वह तू है) — इसी अद्वैत दर्शन के स्तंभ हैं।

महाभारत के अनुशासन पर्व और विभिन्न पुराणों में ऐसी कई कथाएं मिलती हैं जहाँ महान संतों और महर्षियों (जैसे महर्षि अष्टवक, राजा जनक, और शुकदेव मुनि) ने इसी समत्व दृष्टि को अपने जीवन का आधार बनाया। राजा जनक, जिन्हें 'विदेह' कहा जाता है, वे राजमहल में रहते हुए भी इसी श्लोक के मर्म को जीते थे—वे अपने राज्य की हर प्रजा में उसी ईश्वर का दर्शन करते थे, जो उनके अपने भीतर था। यही कारण था कि बड़े-बड़े मुनि-ऋषि भी ज्ञान प्राप्ति के लिए राजा जनक के पास आते थे। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए वनों में भटकने की आवश्यकता नहीं है, अपितु अपनी दृष्टि को बदलने की आवश्यकता है। जब दृष्टि बदलती है, तो सृष्टि स्वतः बदल जाती है और संपूर्ण संसार एक उत्सव बन जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस परम पावन श्लोक का निरंतर स्मरण, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

संसार की उथल-पुथल, मान-अपमान और सुख-दुःख के द्वंद्वों के बीच मन अडिग रहता है। साधक को सभी परिस्थितियों में आंतरिक शांति की अनुभूति होती है।

2. ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध का शमन

जब व्यक्ति हर प्राणी में परमात्मा को देखता है, तो उसके मन से किसी के प्रति भी दुर्भावना, बैर या क्रोध स्वतः समाप्त हो जाता है। हृदय में करुणा का सागर उमड़ता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

इस श्लोक के निरंतर जप से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि के दिव्य प्रकाश वृत्त (aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

4. कर्म बंधनों से मुक्ति (कार्मिक शुद्धि)

अहंकार रहित होकर कर्म करने से नए पाप-पुण्य के बंधन नहीं बनते। पुराने संचित कर्मों का क्षय होने लगता है और चित्त निर्मल हो जाता है।

5. भय और असुरक्षा की भावना का नाश

अमृतत्व का बोध होने पर मृत्यु का भय, भविष्य की चिंता और हर प्रकार की हीन भावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है।

6. आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization)

साधक अपने वास्तविक स्वरूप (सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा) को पहचान पाता है और भ्रम के आवरण को चीरकर आगे बढ़ता है।

7. सामाजिक सद्भाव एवं प्रेम भाव

परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यपरायणता बढ़ती है। समाज में ऊंच-नीच के भेदभाव मिटते हैं और समरसता स्थापित होती है।

8. परम गति (मोक्ष) की प्राप्ति

यह श्लोक अंततः जीव को आवागमन के चक्र से मुक्त कर भगवत्धाम या 'परां गति' प्रदान करने में प्रत्यक्ष रूप से सहायक सिद्ध होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप एवं शंकराचार्य भाष्य) तथा प्रामाणिक पुराणों के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे वरिष्ठ संस्कृत भाषाविदों और आध्यात्मिक आचार्यों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका व्याकरण, तथा उसकी दार्शनिक गहराई आधुनिक पाठकों तक अत्यंत सरल, स्पष्ट और गरिमामयी हिंदी में पहुंचे। हमारा उद्देश्य सनातन धर्म के शाश्वत सत्यों को बिना किसी मिलावट के प्रामाणिक संदर्भों के साथ आप तक पहुँचाना है, ताकि आपकी आध्यात्मिक यात्रा सुगम और मंगलमय हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का 29वां (उनतीसवां) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) के भेद को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया है।

इसका अर्थ है कि "वह अपनी आत्मा द्वारा अपनी आत्मा को नष्ट नहीं करता"। इसका तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध या अज्ञान के कारण दूसरों को हानि पहुँचाता है, तो वह वस्तुतः अपने ही भीतर बैठे परमात्मा के अंश (अपनी आत्मा) को कष्ट देता है। समत्व दृष्टि वाला ज्ञानी पुरुष कभी किसी के प्रति हिंसा या द्वेष नहीं रखता, जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप की रक्षा करता है।

हाँ, बिल्कुल। गीता का यह उपदेश वनों में रहने वाले संन्यासियों के लिए ही नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए है। परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी यदि मन में यह भाव बना रहे कि सबमें एक ही ईश्वर है, तो मनुष्य सहज ही इस उच्च आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

अधिकांश मानसिक तनाव हमारे अंदर के द्वैध, राग-द्वेष और दूसरों से तुलना करने के कारण उत्पन्न होते हैं। जब हम यह समझ जाते हैं कि सब कुछ एक ही ईश्वर का स्वरूप है, तो अपेक्षाएं और शिकायतें समाप्त हो जाती हैं। मन शांत हो जाता है और तनाव स्वतः ही दूर हो जाता है।

'परां गति' का अर्थ है सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था—मोक्ष, मुक्ति, या ब्रह्मभाव की प्राप्ति। जब साधक भेद-बुद्धि को त्यागकर सर्वत्र समभाव से परमेश्वर का दर्शन करता है और किसी से द्वेष नहीं करता, तब उसके सारे कर्माशय समाप्त हो जाते हैं और वह जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परम गति को प्राप्त होता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखने वाला अपने द्वारा आत्मा की हिंसा नहीं करता और इस प्रकार परमगति को प्राप्त होता है।

Seeing the same Lord existing equally everywhere, he does not injure the Self by the self; and thus he attains the supreme goal.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

समदर्शन से अहंकार और द्वेष मिटते हैं और मोक्ष मिलता है।

Equal vision eradicates ego and hatred, leading to liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 29 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 29/35 83% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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