क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 29
श्लोक २९ में समदर्शी को परमगति की प्राप्ति बताई गई है।
संस्कृत श्लोक
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् | न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् || २९ ||
samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram | na hinastyātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim || 29 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
समम्: समान; पश्यन्: देखता हुआ; हि: निश्चय ही; सर्वत्र: सर्वत्र; समवस्थितम्: समभाव से स्थित; ईश्वरम्: ईश्वर को; न: नहीं; हिनस्ति: हिंसा करता; आत्मना: अपने द्वारा; आत्मानम्: आत्मा को; तत: इसलिए; याति: जाता है; पराम्: परम; गतिम्: गति को
हिंदी अनुवाद
क्योंकि वह सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, इसलिए वह अपने द्वारा अपनी आत्मा की हिंसा नहीं करता (अर्थात् आत्मा को शरीर समझकर उसका अहित नहीं करता) और तब परमगति को प्राप्त होता है।
English Translation
Seeing the same Lord existing equally everywhere, he does not injure the Self by the self; and thus he attains the supreme goal.
टीका / Commentary
जो सबमें एक ईश्वर को देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता और न ही अपने वास्तविक स्वरूप को भूलता है। This leads to the supreme goal. One who sees the one God in all does not hate anyone nor forget his own true nature, and thus attains the highest.