क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 28

श्लोक २८ में कहा गया है कि जो सब प्राणियों में एक अविनाशी परमेश्वर को देखता है, वही सच्चा द्रष्टा है।

संस्कृत श्लोक

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् | विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति || २८ ||

samaṃ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṃ parameśvaram | vinaśyatsvavinaśyantaṃ yaḥ paśyati sa paśyati || 28 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

समम्: समान; सर्वेषु: सब; भूतेषु: भूतों में; तिष्ठन्तम्: स्थित; परमेश्वरम्: परमेश्वर को; विनश्यत्सु: नष्ट होने वालों में; अविनश्यन्तम्: न नष्ट होने वाले; य: जो; पश्यति: देखता है; स: वह; पश्यति: देखता है

हिंदी अनुवाद

जो सब प्राणियों में समान रूप से स्थित, अविनाशी परमेश्वर को विनश्वर प्राणियों के बीच देखता है, वही यथार्थ देखता है।

English Translation

He who sees the Supreme Lord, existing equally in all beings, the Imperishable among the perishing, he alone sees indeed.

टीका / Commentary

वास्तविक दृष्टि वह है जो समस्त प्राणियों में एक ही अविनाशी परमेश्वर को देखती है। True vision is seeing the one Imperishable Lord equally in all perishable beings.