श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 28

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 22 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् | विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति || २८ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
समम्
समान
सर्वेषु
सब
भूतेषु
भूतों में
तिष्ठन्तम्
स्थित
परमेश्वरम्
परमेश्वर को
विनश्यत्सु
नष्ट होने वालों में
अविनश्यन्तम्
न नष्ट होने वाले
य
जो
पश्यति
देखता है
स
वह
पश्यति
देखता है

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो सब प्राणियों में समान रूप से स्थित, अविनाशी परमेश्वर को विनश्वर प्राणियों के बीच देखता है, वही यथार्थ देखता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के विशाल वाङ्मय में 'श्रीमद्भगवद्गीता' का तेरहवां अध्याय, जिसे 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' कहा जाता है, आत्मा और परमात्मा के गूढ़ संबंधों को उद्घाटित करता है। प्रस्तुत श्लोक—"समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्..."—वेदांत दर्शन का वह आधारस्तंभ है, जो मनुष्य को संकीर्णता के अंधकार से निकालकर विश्व-बंधुत्व और आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश की ओर ले जाता है।

सांसारिक दृष्टि से हम वस्तुओं, प्राणियों और परिस्थितियों को अलग-अलग और नाशवान देखते हैं। परंतु, शास्त्र कहते हैं कि यह 'माया' का आवरण है। वास्तविक दृष्टि वह है जो परिवर्तनशील शरीर के भीतर उस अपरिवर्तनशील, शाश्वत और अविनाशी चैतन्य को देख सके। जब साधक यह अनुभव करने लगता है कि जो परमात्मा मेरे भीतर है, वही चींटी से लेकर हाथी तक और एक साधारण मनुष्य से लेकर ज्ञानी ऋषि तक, समान रूप से विद्यमान है, तब उसके भीतर से घृणा, द्वेष, अहंकार और भेदभाव का स्वतः ही लोप हो जाता है। यह श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। यह हमें सिखाता है कि सेवा का अर्थ केवल परोपकार नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा की पूजा है। जब हम प्रत्येक जीव में ईश्वर को देखते हैं, तो हमारी प्रत्येक क्रिया 'यज्ञ' बन जाती है। यह श्लोक अद्वैत वेदांत का वह सार है जो मनुष्य को 'अहं' से 'सोऽहं' की यात्रा पर ले जाता है, जहाँ भेद का अंत होता है और अभेद का उदय होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २८ ॥


(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १३, श्लोक २८)

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए। प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में इस श्लोक का मनन करना अत्यंत फलदायी माना गया है। पाठ की विधि सरल है: सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, तत्पश्चात इस श्लोक का तीन बार सस्वर पाठ करें और अंत में इसके अर्थ पर कम से कम पांच मिनट तक मौन चिंतन करें। यह चिंतन ही साधक की चेतना को जाग्रत करने का कार्य करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
समम्समान रूप सेईश्वर का अस्तित्व किसी में कम या अधिक नहीं है।
सर्वेषु भूतेषुसमस्त प्राणियों मेंसृष्टि के कण-कण और जीव-जंतुओं में।
तिष्ठन्तम्स्थितपरमात्मा का निरंतर निवास।
परमेश्वरम्परम ईश्वरजो समस्त शक्तियों का मूल स्रोत है।
विनश्यत्सुनाशवान शरीरों मेंजो शरीर काल के गाल में समा जाते हैं।
अविनश्यन्तम्अविनाशीजो कभी नष्ट नहीं होता, शाश्वत आत्मा।
यः पश्यतिजो देखता हैवह व्यक्ति जो दिव्य दृष्टि प्राप्त कर चुका है।
स पश्यतिवही वास्तव में देखता हैवही ज्ञानी है, शेष सब अंधे हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन मोह और विषाद से ग्रस्त होकर अपने धनुष-बाण त्याग देते हैं, तब भगवान श्री कृष्ण उन्हें 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' का ज्ञान देते हैं। यह श्लोक उसी संवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पौराणिक संदर्भों में, यह ज्ञान उपनिषदों के 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (सब कुछ ब्रह्म ही है) के महावाक्य का विस्तार है।

महाभारत के युद्ध के समय, जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखा, तो उनके मन में भेद उत्पन्न हो गया। उन्होंने 'स्व' और 'पर' का अंतर किया। भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें यह समझाया कि जिसे तुम 'स्वजन' या 'शत्रु' कह रहे हो, वे केवल नश्वर शरीर हैं। जो वास्तविक 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा) है, वह न तो मरता है और न ही मारा जा सकता है। यह श्लोक हमें उस उच्च चेतना की ओर ले जाता है जहाँ अर्जुन को यह बोध होता है कि युद्ध का उद्देश्य व्यक्तिगत विजय नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना है, क्योंकि धर्म का आधार ही 'समत्व' है। वेदों में भी 'ईशावास्यमिदं सर्वं' कहकर इसी सत्य को प्रतिपादित किया गया है। यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि हम जो कुछ भी देख रहे हैं, वह परमात्मा का ही विस्तार है। इस ज्ञान को आत्मसात करने वाला व्यक्ति ही वास्तविक अर्थों में 'द्रष्टा' कहलाता है। यह केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है जिसे ऋषि-मुनियों ने तपस्या के माध्यम से प्राप्त किया था।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का नाश: जब हम सबमें एक ही ईश्वर को देखते हैं, तो 'मैं' और 'मेरा' का भाव स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • मानसिक शांति: राग-द्वेष से मुक्ति मिलती है, जिससे मन की चंचलता शांत होती है।
  • समानता का भाव: समाज में ऊंच-नीच, जाति-पाति और भेदभाव के कुसंस्कारों से मुक्ति मिलती है।
  • कर्म शुद्धि: प्रत्येक कार्य को ईश्वर की सेवा मानकर करने से कर्म बंधन से मुक्ति मिलती है।
  • दिव्य दृष्टि का विकास: यह श्लोक साधक की अंतर्दृष्टि को जाग्रत करता है, जिससे वह सत्य और असत्य का भेद समझ पाता है।
  • भय से मुक्ति: मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक को ज्ञात हो जाता है कि आत्मा अविनाशी है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: निरंतर मनन से व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य आभा मंडल (Aura) का निर्माण होता है।
  • ईश्वरीय कृपा: जो भक्त सबमें ईश्वर को देखता है, भगवान उसे अत्यंत प्रिय होते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के तेरहवें अध्याय के २८वें श्लोक पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत विभिन्न भाष्यकारों, जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद के वेदांत दर्शन के आलोक में संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत और तार्किक आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, अपितु आत्म-चिंतन और विवेक को प्रोत्साहित करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर का अंश प्रत्येक जीव में है। दुष्टता शरीर और मन के स्तर पर होती है, आत्मा के स्तर पर नहीं। जब हम दुष्ट में भी ईश्वर को देखते हैं, तो हम उसकी दुष्टता को नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे उस शुद्ध चैतन्य को देखते हैं, जो अज्ञान के कारण ढका हुआ है।

प्रतिदिन किसी भी जीव को देखते समय मन में यह भाव लाएं कि "यह भी उसी परमात्मा का रूप है।" धीरे-धीरे यह अभ्यास आपके स्वभाव का हिस्सा बन जाएगा।

नहीं, यह श्लोक गृहस्थों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि गृहस्थ जीवन में ही हमें विभिन्न प्रकार के लोगों से व्यवहार करना पड़ता है। यह श्लोक हमें समभाव रखने की शक्ति देता है।

अविनाशी का अर्थ है जो कभी नष्ट न हो, जिसका न जन्म हो और न मृत्यु। यह केवल आत्मा या परमात्मा के लिए प्रयुक्त होता है।

पाप अज्ञान के कारण होते हैं। जब इस श्लोक के अर्थ का बोध होता है, तो अज्ञान का नाश होता है, और अज्ञान के नाश के साथ ही पापों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं।

© 2024 Bhaktilok.in - आध्यात्मिक ज्ञान का प्रामाणिक स्रोत

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो सब प्राणियों में समान रूप से स्थित, अविनाशी परमेश्वर को नष्ट होने वाले प्राणियों के बीच देखता है, वही यथार्थ देखता है।

He who sees the Supreme Lord, existing equally in all beings, the Imperishable among the perishing, he alone sees indeed.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सबमें एक समान है। भेद केवल शरीरों का है।

God is equally present in all. The differences are only of bodies.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 28 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 28/35 80% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!