क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 27
श्लोक २७ में बताया गया है कि समस्त प्राणी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न होते हैं।
संस्कृत श्लोक
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् | क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || २७ ||
yāvatsañjāyate kiñcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam | kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha || 27 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यावत्: जितना भी; सञ्जायते: उत्पन्न होता है; किञ्चित्: कुछ भी; सत्त्वम्: प्राणी या पदार्थ; स्थावरजङ्गमम्: स्थावर और जङ्गम; क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्: क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से; तत्: उसको; विद्धि: जानो; भरतर्षभ: हे भरतश्रेष्ठ
हिंदी अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही जानो।
English Translation
Wherever a being is born, whether unmoving or moving, know it to be from the union of the field and its knower, O best of the Bharatas.
टीका / Commentary
संसार में जितने भी प्राणी हैं, वे सब शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के संयोग से उत्पन्न होते हैं। All beings in the world are born from the union of the body (field) and the self (knower of the field).