श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 27

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 37 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् | क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || २७ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
यावत्
जितना भी
सञ्जायते
उत्पन्न होता है
किञ्चित्
कुछ भी
सत्त्वम्
प्राणी या पदार्थ
स्थावरजङ्गमम्
स्थावर और जङ्गम
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से
तत्
उसको
विद्धि
जानो
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्माण्डकीय चेतना

सनातन धर्म के अद्वितीय ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के त्रयोदश अध्याय, जिसे 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, का यह सत्ताईसवाँ (२७वाँ) श्लोक समस्त चराचर जगत की उत्पत्ति के मूल रहस्य को अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से उद्घाटित करता है। इस लोक में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है—चाहे वह जड़ हो या चेतन, सूक्ष्म हो या स्थूल—उसकी उत्पत्ति का एकमात्र कारण 'क्षेत्र' (प्रकृति/शरीर) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/परमात्मा) का परस्पर संयोग है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि इस सृष्टि में कोई भी वस्तु या प्राणी स्वतंत्र रूप से केवल जड़ या केवल चेतन के अकेलेपन में उत्पन्न नहीं हो सकता, बल्कि द्वैत और अद्वैत के इस अद्भुत मिलन से ही इस विराट ब्रह्माण्ड की जीवंतता गतिमान होती है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक अद्वैत वेदांत और सांख्य दर्शन का एक अभूतपूर्व संगम प्रस्तुत करता है। 'स्थावर' का तात्पर्य उन जीवों या पदार्थों से है जो गतिहीन हैं (जैसे वृक्ष, पर्वत, चट्टानें), और 'जङ्गम' का अर्थ उन प्राणियों से है जो गमनशील हैं (जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंगे)। इन दोनों कोटियों के समस्त जीव इस भौतिक संसार में अपनी संपूर्ण विविधता के साथ केवल और केवल प्रकृति और पुरुष के इस शाश्वत मिलन का परिणाम हैं। जब एक साधक इस श्लोक के गूढ़ मर्म को अपने जीवन में उतारता है, तब उसके भीतर से संसार के प्रति मोह, अहंकार और भेदभाव की भावना समाप्त होने लगती है। वह हर स्थावर और जङ्गम वस्तु में उसी एक परम चेतना के दर्शन करने लगता है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान कर रही है। यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि उसका शरीर मात्र पांच तत्वों का पुतला नहीं है, बल्कि इसके भीतर उस अनंत ब्रह्म का अंश 'क्षेत्रज्ञ' विराजमान है, जो इस नश्वर काया को जीवंत बनाता है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष आलेख में हम इसी पावन श्लोक के प्रत्येक शब्द, इसके व्याकरणिक स्वरूप, महाभारत के युद्धक्षेत्र में इसके प्रसंग, और इसके नियमित पठन से मिलने वाले मानसिक व आध्यात्मिक लाभों का अत्यंत सूक्ष्मता और प्रामाणिकता के साथ विश्लेषण करेंगे। आइए, इस पावन ज्ञान की गंगा में गोता लगाएं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं पद्यात्मक पाठ

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् l
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || २७ ||

पदच्छेद (संस्कृत संधि विच्छेद):

यावत ् + सञ्जायते + किञ्चित ् + सत्त्वम् + स्थावर-जङ्गमम् ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-संयोगात ् + तत् + विद्धि + भरत-ऋषभ ॥ २७ ॥

श्लोकार्थ: हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! संसार में जितने भी स्थावर (चलने-फिरने में असमर्थ, जैसे वृक्ष आदि) और जंगम (चलने-फिरने वाले, जैसे मनुष्य-पशु आदि) प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तुम क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के संयोग से ही उत्पन्न हुआ जानो।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यावत ् (यावत्) जितने भी, जितना कुछ यह संपूर्ण सृष्टि की व्यापकता और उसकी विशालता को दर्शाता है, यानी असीम विविधता।
सञ्जायते उत्पन्न होते हैं, पैदा होते हैं भौतिक जगत में निरंतर होने वाली उत्पत्ति, विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया का द्योतक है।
किञ्चित् (किञ्चित्) कुछ भी, किसी भी प्रकार का कोई भी अपवाद नहीं; सूक्ष्म से सूक्ष्म परमाणु से लेकर विराट आकाशगंगा तक सब इसमें शामिल हैं।
सत्त्वम् प्राणी, जीव, पदार्थ या वस्तु चेतना या भौतिक रूप से प्रकट होने वाली प्रत्येक इकाई, जिसे हम जीवन या वस्तु के रूप में देखते हैं।
स्थावरम् स्थावर, स्थिर या जड़ (जैसे वृक्ष, पर्वत) वे जीव या पदार्थ जो अपनी जगह पर स्थिर रहते हैं, जिनमें आंतरिक प्राण तो है पर गतिशीलता नहीं।
जङ्गमम् जंगम, गतिशील (जैसे मनुष्य, पशु) वे सभी प्राणी जो अपनी इच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन कर सकते हैं।
क्षेत्र शरीर, भौतिक प्रकृति, जड़ तत्व यह पांच महाभूतों, मन, बुद्धि और अहंकार का वह क्षेत्र है जिसमें आत्मा अनुभव प्राप्त करती है।
क्षेत्रज्ञम् क्षेत्र को जानने वाला, आत्मा, परमात्मा वह चेतनामय तत्व जो इस शरीररूपी क्षेत्र का ज्ञाता है और इसके भीतर साक्षी भाव से रहता है।
संयोगात् संयोग से, मिलन से, आपसी मेल से प्रकृति (मायिका) और पुरुष (चेतना) के मिलन के बिना सृष्टि की एक इंच भी गति संभव नहीं है।
भरतर्षभ हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन को संबोधन) भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके महान कुल और उच्च उत्तरदायित्व का स्मरण करा रहे हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Context & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के त्रयोदश अध्याय का यह प्रसंग महाभारत के उस अत्यंत महत्त्वपूर्ण मोड़ पर आता है जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन भयंकर मानसिक द्वंद्व, विषाद और मोह के सागर में डूबे हुए थे। वे अपने सगे-सम्बन्धियों को युद्धभूमि में देखकर कर्तव्यविमूढ़ हो गए थे। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मृत्यु, शरीर, आत्मा, प्रकृति और पुरुष के शाश्वत सत्यों से अवगत कराने के लिए ज्ञान योग और सांख्य दर्शन का उपदेश देना आरंभ किया। त्रयोदश अध्याय पूरी तरह से 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' के विवेचन को समर्पित है, जहाँ अर्जुन के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति, पुरुष, ज्ञान, और ज्ञेय के स्वरूप को विस्तार से समझाया।

वैदिक परंपरा और उपनिषदों में इस दार्शनिक पृष्ठभूमि की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। मुण्डकोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद में भी प्रकृति (क्षेत्र) और परमेश्वर (क्षेत्रज्ञ) के संबंध का बार-बार उल्लेख मिलता है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश (भीष्म पर्व के अंतर्गत गीता पर्व) में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य जिस शरीर को 'मैं मेरा' मानकर अहंकार से भर जाता है, वह वास्तव में केवल एक 'क्षेत्र' यानी खेत या कार्यक्षेत्र मात्र है। जिस प्रकार खेत में किसान बीज बोता है और फसल उगती है, उसी प्रकार इस भौतिक शरीररूपी क्षेत्र में कर्मों के संस्कार बोए जाते हैं और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) उनका फल भोगती है।

जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'भरतर्षभ' कहकर संबोधित करते हैं, तो इसका एक गहरा ऐतिहासिक और वंशगत अर्थ है। भरत वंश में उत्पन्न होने के कारण अर्जुन महान राजाओं की उस परंपरा के संवाहक थे जिन्होंने हमेशा धर्म, सत्य और आत्मज्ञान को सर्वोपरि रखा था। इसलिए श्रीकृष्ण चाहते थे कि अर्जुन क्षुद्र मोह को त्यागकर इस ब्रह्मांडीय सत्य को समझें कि मारने वाला और मरने वाला दोनों ही स्तर पर केवल शरीर (क्षेत्र) नष्ट होता है, जबकि भीतर का क्षेत्रज्ञ (आत्मा) अमर और अविनाशी है। यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि जीवन के हर संकट में हमें सत्यों का अन्वेषण करना चाहिए, न कि सतही दुखों में उलझे रहना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

इस श्लोक के नियमित मनन से मन के भीतर चल रहे उद्वेग, चिंता और अनावश्यक तनाव शांत होते हैं। व्यक्ति को यह बोध होता है कि संसार में सब कुछ एक उच्च नियम के तहत चल रहा है, जिससे मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

2. अहंकार और मोह का नाश

जब साधक यह समझ जाता है कि उसका शरीर केवल एक 'क्षेत्र' है और वह स्वयं 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा) है, तब शरीर के प्रति अस्वाभाविक मोह और 'मैं और मेरा' का अहंकार स्वतः ही गलने लगता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

गीता के इन ज्ञानयुक्त श्लोकों का उच्चारण और चिंतन करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक सकारात्मक ऊर्जा का घेरा (औरा) बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

4. कर्म शुद्धि और निष्काम भाव

यह श्लोक व्यक्ति को उसके कर्मों के प्रति सचेत करता है। जब ज्ञान हो जाता है कि शरीर साधन है और आत्मा द्रष्टा, तब मनुष्य निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा पाता है।

5. चराचर जगत के प्रति आदर भाव (समदृष्टि)

यह ज्ञान साधक की दृष्टि को व्यापक बनाता है। वह पेड़-पौधों (स्थावर) से लेकर सभी मनुष्यों और पशुओं (जंगम) में एक ही दिव्य चेतना के दर्शन करता है, जिससे उसके भीतर करुणा और प्रेम का विस्तार होता है।

6. आध्यात्मिक जागृति और आत्मसाक्षात्कार

नियमित अध्ययन और इस पर ध्यान लगाने से अंतःकरण शुद्ध होता है और मोक्ष मार्ग के द्वार खुलते हैं, जिससे व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मसाक्षात्कार की उच्च अवस्था की ओर अग्रसर होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों जैसे श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता प्रेस गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण एवं आदि शंकराचार्य भाष्य), उपनिषदों और महाभारत के ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे विद्वान भाषाविदों और संस्कृत आचार्यों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक के प्रत्येक पद का अर्थ वेदसम्मत, व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध और आधुनिक पाठकों के लिए अत्यंत सहज एवं सुबोध हो। हमारा उद्देश्य सनातन धर्म के महान दार्शनिक सिद्धांतों को बिना किसी अतिशयोक्ति के, पूरी प्रमाणिकता के साथ पाठकों तक पहुँचाना है, ताकि हर साधक आध्यात्मिक पथ पर सुगमता से आगे बढ़ सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: 'क्षेत्र' का शाब्दिक अर्थ खेत या शरीर है, जो जड़ प्रकृति (पंचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार) से बना है। वहीं 'क्षेत्रज्ञ' वह चेतन सत्ता यानी आत्मा या परमात्मा है जो इस क्षेत्र को जानता है और इसका साक्षी है। इन दोनों के मिलने से ही समस्त जीव और पदार्थ उत्पन्न होते हैं।

उत्तर: 'स्थावर' उन जीवों और पदार्थों को कहा जाता है जो एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं (जैसे वृक्ष, पौधे, पहाड़ आदि)। 'जङ्गम' उन प्राणियों को कहा जाता है जो अपनी इच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति कर सकते हैं (जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी और कीट)।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के त्रयोदश (13वें) अध्याय 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' का सत्ताईसवाँ (२७वाँ) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर और आत्मा के अंतर को विस्तार से समझाया है।

उत्तर: इस श्लोक के मर्म को समझने से व्यक्ति के भीतर का अहंकार और शरीर के प्रति अत्यधिक मोह समाप्त होता है। वह समझ जाता है कि सभी जीवों में एक ही चेतन तत्व निवास करता है, जिससे वह सभी के प्रति दया, प्रेम और समदृष्टि का भाव विकसित कर पाता है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक मानवता के कल्याण के लिए है। कोई भी साधक, विद्यार्थी या जिज्ञासु श्रद्धा और पवित्रता के साथ इसका पाठ कर सकता है और इसके दार्शनिक अर्थ को अपने जीवन में उतार सकता है।

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संकलन एवं प्रस्तुति: भक्तिलोक मुख्य devotional scholar एवं संस्कृत भाषाविद् टीम

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही जानो।

Wherever a being is born, whether unmoving or moving, know it to be from the union of the field and its knower, O best of the Bharatas.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सृष्टि का प्रत्येक प्राणी शरीर-आत्मा के संयोग से बना है। आत्मा अलग है, शरीर अलग।

Every creature is a combination of body and soul. The soul is distinct from the body.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/35 77% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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