श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 25

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 36 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना | अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे || २५ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
ध्यानेन
ध्यान द्वारा
आत्मनि
अपने में
पश्यन्ति
देखते हैं
केचित्
कुछ लोग
आत्मानम्
आत्मा को
आत्मना
अपने मन से
अन्ये
अन्य
साङ्ख्येन
सांख्य योग से
योगेन
योग द्वारा
कर्मयोगेन
कर्मयोग से
च
और
अपरे
दूसरे

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कुछ लोग ध्यान द्वारा अपने मन से अपने में आत्मा को देखते हैं, अन्य लोग सांख्ययोग द्वारा और दूसरे लोग कर्मयोग द्वारा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन धर्म, वैदिक दर्शन और उपनिषदों की परंपरा में आत्मसाक्षात्कार (Self-Realization) ही मानव जीवन का सर्वोच्च और परम गंतव्य माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का यह तेरहवां अथवा सांख्य-योग प्रसंग से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक—“ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना | अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे || २५ ||”—समस्त आध्यात्मिक जगत का सार प्रस्तुत करता है। यह श्लोक न केवल वेदों और वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करता है, बल्कि मानव चेतना के विकास और जीव के ब्रह्मïा से मिलने के तीन स्पष्ट, वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक मार्ग भी प्रशस्त करता है।

जब हम भगवान श्रीकृष्ण के मुखर वचनों का संधान करते हैं, तो यह ज्ञात होता है कि संसार में मनुष्य की प्रवृत्तियां, मानसिक स्तर, बौद्धिक क्षमताएं और संस्कार भिन्न-भिन्न होते हैं। एक ही लक्ष्य (परमात्मा की प्राप्ति) तक पहुँचने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने किसी एक मार्ग को अनिवार्य न बनाकर जीवों की पात्रता के अनुसार अनेक द्वार खोले हैं। यहाँ ध्यानयोग (Dhyana Yoga), सांख्ययोग (Jnana Yoga/Sankhya Yoga) और कर्मयोग (Karma Yoga)—ये तीन परम मार्ग बताए गए हैं, जो अंततः जीव को उसकी मूल सनातन पहचान से जोड़ते हैं। भूलोक के समस्त साधकों, मुनियों, योगियों और गृहस्थों के लिए यह श्लोक एक महान मार्गदर्शिका है, जो अज्ञान के गाढ़ अंधकार को चीरकर ज्ञान और भक्ति का सूर्योदय करता है। 'भक्तिलोक' (Bhaktilok.in) के इस पावन मंच पर हम इसी श्लोक के अंतरंग में उतरकर इसके हर एक आयाम का वैज्ञानिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि हर साधक अपने अनुकूल मार्ग का चयन कर अपने जीवन को कृतार्थ कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥ २५ ॥


श्लोक का संस्कृत पदावली एवं उच्चारण विधि

इस श्लोक का उच्चारण करते समय दीर्घ स्वरों (जैसे ध्यानेनात्मनि में 'आ' और 'ते') पर उचित बल देना चाहिए। यह श्लोक मुख्य रूप से ध्यान की गहराई, बुद्धि की तीक्ष्णता और कर्म की निष्ठा का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। वेदों के अध्ययन के उपरांत जब साधक के मन में वैराग्य और जिज्ञासा उत्पन्न होती है, तब उसे इस श्लोक की महत्ता समझ में आती है। इसका प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में पाठ करने से मन की वृत्तियां शांत होती हैं और एकाग्रता स्वतः सिद्ध होने लगती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द में अनंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा संचित है। आइए, इस श्लोक के एक-एक पद का व्याकरणिक और आध्यात्मिक विश्लेषण करते हैं ताकि इसके मर्म को पूरी तरह से आत्मसात किया जा सके:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ध्यानेन ध्यान के द्वारा (Meditation) चित्त की वृत्तियों को रोककर अंतःकरण में एकाग्रता स्थापित करने की विधि।
आत्मनि अपने अंतःकरण में / हृदय रूपी आकाश में शरीर रूपी मंदिर के भीतर विराजमान सूक्ष्म चैतन्य आत्मा का क्षेत्र।
पश्यन्ति देखते हैं / साक्षात्कार करते हैं सांसारिक नेत्रों से परे दिव्य ज्ञान चक्षु से परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव करना।
केचित् कुछ (विशिष्ट योगी) वे उच्च कोटि के विरक्त साधक जो अंतर्मुखी साधना में सिद्ध होते हैं।
आत्मानम् परमात्मा को / जीवात्मा को परम सत्य, जो जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतीक है।
आत्मना अपनी ही शुद्ध बुद्धि या मन के द्वारा जब मन ही मन को साध लेता है और वह निर्मल दर्पण बन जाता है।
अन्ये अन्य (दूसरे प्रकार के ज्ञानी) वे साधक जिनकी रुचि बौद्धिक विश्लेषण और विवेक में होती है।
साङ्ख्येन योगेन सांख्य योग (ज्ञान योग) के द्वारा प्रकृति और पुरुष का विवेक करने वाली दार्शनिक और ज्ञानात्मक पद्धति।
कर्मयोगेन कर्म योग के द्वारा फलों की आसक्ति को त्यागकर कर्तव्य-कर्म को ही ईश्वर-पूजा मानना।
च और इन सभी मार्गों की समता और उनकी सार्थकता को जोड़ने वाला संयोजक।
अपरे अन्य (गृहस्थ एवं सेवाभावी साधक) वे लोग जो सांसारिक क्रियाकलापों के बीच रहकर भगवत्प्राप्ति करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान से जुड़ी हुई है, जहाँ अर्जुन अपने स्वजनों को युद्धभूमि में देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। विषाद और कर्तव्य-विमुक्ता की उस घड़ी में जगतगुरु श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वेदों, उपनिषदों और पुराणों का सार हैं। इस विशेष प्रसंग में अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि परम सत्य को प्राप्त करने के उपाय कौन-कौन से हैं और क्या हर व्यक्ति के लिए एक ही मार्ग अनिवार्य है? इसी का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य की मानसिक वृत्तियों के आधार पर तीन प्रमुख मार्गों का विस्तार से वर्णन किया है।

वैदिक इतिहास में महर्षि वेद व्यास ने महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से यह स्थापित किया है कि मनुष्य के स्वभाव में त्रिगुणात्मक प्रकृतियां (सत्व, रज, तम) पाई जाती हैं। जिस व्यक्ति का अंतःकरण शांत और निस्पृह है, वह ध्यानयोग के द्वारा अपने भीतर समाहित हो जाता है। जिसकी बुद्धि अत्यंत सूक्ष्म, तर्कसंगत और विवेकशील है, वह सांख्ययोग (ज्ञानयोग) के माध्यम से प्रकृति और पुरुष के भेद को पहचानकर मोक्ष को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, जो साधारण मनुष्य समाज में रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं, उनके लिए निष्काम भाव से किया गया कर्मयोग ही सबसे सुगम और श्रेष्ठ मार्ग बन जाता है।

पुराणों में ऐसे अनेक आख्यान मिलते हैं—जैसे महर्षि शुकदेव का सांख्ययोग, भक्त प्रह्लाद और राजा जनक का कर्मयोग, तथा शौनक आदि ऋषियों एवं योगियों की ध्यानपरक साधनाएं—जो इस बात की पुष्टि करती हैं कि मार्ग कोई भी हो, यदि भावना शुद्ध है और लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है, तो सभी मार्ग एक ही महासमुद्र में जाकर मिलने वाली नदियों के समान हैं। यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि हमें अपनी मानसिक प्रकृति के अनुसार धैर्यपूर्वक अपने मार्ग का चयन करना चाहिए और दूसरों के मार्ग में दोष नहीं देखना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को अलौकिक मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

ध्यानयोग के महत्व को समझने से मन के विचार शांत होने लगते हैं और अवसाद, चिंता तथा तनाव से मुक्ति मिलती है।

2. सकारात्मक और ऊर्जावान औरा (Aura)

श्लोक का नित्य उच्चारण और मनन करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

कर्मयोग के सिद्धांत को अपनाने से कर्मों के बंधन कटते हैं और नया पाप-पुण्य का चक्र कमजोर होता है।

4. आत्म-बोध और विवेक की प्राप्ति

सांख्ययोग के प्रभाव से बुद्धि इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि साधक सत्य और असत्य का भेद पल भर में कर लेता है।

5. भगवत्कृपा की प्राप्ति

जो साधक निष्ठापूर्वक अपने मार्ग पर चलता है, उस पर भगवान श्रीकृष्ण की असीम अनुकंपा और आशीर्वाद सदैव बना रहता है।

6. मोह और भय से मुक्ति

आत्मा के अजर-अमर स्वरूप का बोध होने से मृत्यु का भय और सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह स्वतः समाप्त हो जाता है।

7. निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता

जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उचित और धर्मसंगत निर्णय लेने की शक्ति विकसित होती है।

8. उच्चतर चेतना का विकास

चेतना निचले चक्रों से उठकर सहस्रार चक्र की ओर अग्रसर होती है, जिससे साधक परमानंद का अनुभव करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: 'भक्तिलोक' (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन करके तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का मर्म बिना किसी मिलावट या भ्रम के पाठकों तक पहुचे। इस आलेख में प्रस्तुत श्लोक का अर्थ, व्याकरण और आध्यात्मिक व्याख्या पूरी तरह से शास्त्रीय परंपराओं के अनुकूल है, जिससे पाठक अपनी साधना यात्रा में पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक में आत्मसाक्षात्कार के मुख्य रूप से तीन मार्ग बताए गए हैं – पहला ध्यानयोग (मन को अंतर्मुखी कर एकाग्र करना), दूसरा सांख्ययोग (विवेक और ज्ञान के द्वारा प्रकृति और पुरुष को अलग जानना), और तीसरा कर्मयोग (फलों की आसक्ति त्यागकर निष्काम भाव से कर्तव्य का पालन करना)।

उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार सभी मार्ग अपने-अपने स्तर पर उत्तम और फलदायी हैं। मनुष्य की मानसिक प्रवृत्ति, संस्कार और योग्यता के अनुसार उसके लिए अलग-अलग मार्ग उपयुक्त होते हैं। अंततः इन सभी मार्गों का गंतव्य एक ही (परमात्मा की प्राप्ति) है।

उत्तर: जो लोग गृहस्थ आश्रम में रहकर अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारी निभाते हैं, उनके लिए कर्मयोग सबसे सुगम और प्राकृतिक मार्ग है। इसमें उन्हें संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं होती, बस अपने कर्मों का फल ईश्वर को समर्पित करना होता है।

उत्तर: प्रतिदिन सुबह या संध्याकाल में कुछ समय शांत स्थान पर बैठकर अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करने, अंतःकरण की वृत्तियों को देखने और मौन का अभ्यास करने से ध्यानयोग की शुरुआत की जा सकती है। इससे मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ती है।

उत्तर: सांख्ययोग मुख्य रूप से बौद्धिक ज्ञान, विवेक और वैराग्य पर आधारित है, जहाँ साधक बुद्धि द्वारा सत्य की खोज करता है। इसके विपरीत, कर्मयोग शारीरिक और मानसिक क्रियाओं (कर्मों) को निष्काम भाव से ईश्वरार्पण करते हुए जीने की पद्धति है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कुछ लोग ध्यान द्वारा अपने मन से अपने में आत्मा को देखते हैं, अन्य सांख्ययोग (ज्ञानयोग) द्वारा, और कुछ कर्मयोग द्वारा।

Some by meditation behold the Self in the self through the self; others by the Yoga of knowledge; and others by the Yoga of action.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मसाक्षात्कार के अनेक मार्ग हैं, साधक अपनी रुचि के अनुसार किसी भी मार्ग से लक्ष्य तक पहुँच सकता है।

There are many paths to self-realization; a seeker can reach the goal by any path according to his inclination.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/35 71% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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