श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 24

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 46 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह | सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते || २४ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
य
जो
एवम्
इस प्रकार
वेत्ति
जानता है
पुरुषम्
पुरुष को
प्रकृतिम्
प्रकृति को
च
और
गुणै
गुणों के साथ
सह
सहित
सर्वथा
सब प्रकार से
वर्तमान
बर्ताव करता हुआ
अपि
भी
न
नहीं
स
वह
भूय
फिर
अभिजायते
जन्मता

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति को गुणों सहित जान लेता है, वह सब प्रकार से बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं पाता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह - श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान | Bhaktilok.in

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व

सनातन धर्म और वेदान्त दर्शन में भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवती श्रुति का सार माना गया है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को निमित्त बनाकर दिया गया यह उपदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए भवसागर से तरने का एकमात्र महामंत्र है। प्रस्तुत श्लोक—"य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह | सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते || २४ ||"—श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का अत्यंत महत्वपूर्ण और जीवन का कायापलट करने वाला श्लोक है। इस श्लोक में जीव (पुरुष), प्रकृति और उनके त्रिगुणों (सत्, रज, तम) के यथार्थ ज्ञान के माध्यम से प्राप्त होने वाली परमसत्य की मुक्ति का अत्यंत सुंदर और स्पष्ट दिग्दर्शन कराया गया है।

इस पावन भूमंडल पर जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी जन्म और मरण के चक्र (संसार चक्र) में बंधा हुआ है। अज्ञानता और मोह के कारण जीव स्वयं को नाशवान शरीर मान बैठता है, और यहीं से दुखों की अनंत श्रृंखला प्रारंभ होती है। परंतु जब कोई साधक अपने भीतर के विवेक को जागृत करता है, तब उसे 'क्षेत्र' (शरीर, मन, बुद्धि) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा, ज्ञाता) का अंतर भली-भांति समझ आने लगता है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, अपितु यह अनुभवजन्य आत्मसाक्षात्कार है। जब मनुष्य प्रकृति और पुरुष के अलगाव व उनके संयोजन के सत्य को जान लेता है, तब वह संसार में रहते हुए भी संसार के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान मुक्तिदायक है और इस ज्ञान को प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने जीवन की किसी भी परिस्थिति में हो, किसी भी कुल, देश या काल में जीवित हो, वह इस नश्वर संसार के बार-बार होने वाले पुनर्जन्म के चक्र से सदा-सदा के लिए छूट जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी परम ज्ञान की गहराई में उतरेंगे और এর हर एक आयाम को शास्त्रीय व तार्किक दृष्टिकोण से समझेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ त्रयोदशोऽध्यायः — श्लोक २४

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २४ ॥


"यः एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानः अपि न सः भूयः अभिजायते॥"

इस श्लोक का उच्चारण करने और इसका प्रतिदिन पाठ करने से मन में सात्त्विक ऊर्जा का प्रवाह होता है। विधि विधान के संदर्भ में, साधक को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके, पवित्र वस्त्र धारण कर, भगवान श्री कृष्ण के विग्रह या चित्र के समक्ष शांत चित्त से आसन पर बैठकर इस तेरहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए। श्लोक के प्रत्येक पद का उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए, जिससे इसकी आन्तरिक ध्वनि आपके सूक्ष्म शरीरों को आंदोलित कर सके और भीतर छिपे हुए अज्ञान के अंधकार को समूल नष्ट कर सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के मर्म को समझने के लिए इसके प्रत्येक शब्द (पद) का शाब्दिक अर्थ और उसके दार्शनिक निहितार्थ को जानना अति आवश्यक है। नीचे दी गई सारणी में इसका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यः (यः) जो कोई भी मनुष्य वह जिज्ञासु साधक या ज्ञानी पुरुष जो सत्य की खोज में समर्पित है।
एवम् (एवं) इस प्रकार / इसी विधि से तथ्यों को बिना किसी मिलावट या भ्रम के ज्यों का त्यों स्वीकार करना।
वेत्ति (वेत्ति) जानता है / अनुभव करता है मात्र किताबी ज्ञान नहीं, अपितु प्रत्यक्ष अनुभूति (अपरोक्ष ज्ञान) करना।
पुरुषम् (पुरुषं) चेतन आत्मा / भोक्ता शरीर में स्थित निर्विकार, अकर्ता और द्रष्टा रूप चेतना (आत्मा या परमात्मा)।
प्रकृतिम् (प्रकृतिं) जड़ प्रकृति / माया सम्पूर्ण भौतिक जगत, शरीर, मन और बुद्धि का उपादान कारण।
च (च) और पुरुष और प्रकृति दोनों के सह-संबंध और उनके भेद का समुच्चय।
गुणैः सह (गुणैः सह) त्रिगुणों (सत्, रज, तम) के सहित प्रकृति के तीन बंधनकारी गुणों—सत्व, रज और तम—की संपूर्ण कार्यप्रणाली सहित।
सर्वथा (सर्वथा) हर प्रकार से / किसी भी स्थिति में परिस्थितियां चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल, सुख हो या दुख।
वर्तमानोऽपि (वर्तमानोऽपि) रहते हुए भी / आचरण करते हुए भी संसार में अपने कर्तव्यों (कर्मों) का निर्वाह करते हुए भी आसक्ति से मुक्त रहना।
न (न) नहीं पुनर्जन्म या बंधन की प्राप्ति नहीं होती है।
सः (सः) वह ज्ञानी पुरुष वह विरक्त और जीवन्मुक्त महापुरुष।
भूयः (भूयः) पुनः / बार-बार मृत्यु के उपरांत इस मृत्युलोक में।
अभिजायते (अभिजायते) जन्म लेता है गर्भ में आना और कर्मफल भोगने हेतु नया शरीर धारण करना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के भीषण युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का मोह और विषाद चरम सीमा पर पहुँच गया था, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई। तेरहवां अध्याय विशेष रूप से 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय के आरंभ में अर्जुन ने प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के संबंध में सात महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे थे। इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए योगेश्वर कृष्ण ने सृष्टि के आदिस्रोत से लेकर जीव के बंधन और मुक्ति के समस्त रहस्यों का पर्दाफाश किया।

वैदिक और पौराणिक साहित्यों में इस प्रसंग को सांख्य दर्शन और वेदान्त के समन्वय के रूप में देखा जाता है। महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस पर्व में यह दर्शाया गया है कि कैसे एक सामान्य मनुष्य भी संसार के तमाम प्रपंचों, युद्धों, पारिवारिक उत्तरदायित्वों और सामाजिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी परम आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहता है परंतु जल से कभी भीगता नहीं है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप को जान लेने वाला ज्ञानी पुरुष इस भौतिक संसार में रहते हुए भी इसके द्वंद्वों—राग-द्वेष, मान-अपमान, सुख-दुख—से अलिप्त रहता है। प्राचीन काल में राजा जनक, महर्षि शुकदेव और प्रह्लाद जैसे महापुरुषों ने इसी विद्या को आत्मसात करके जीवनमुक्त अवस्था का अनुभव किया था। यह श्लोक हमें यह आश्वस्त करता है कि आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने के लिए हिमालय की गुफाओं में भागने की आवश्यकता नहीं है, अपितु अपनी चेतना को रूपांतरित करने की आवश्यकता है जहाँ कर्म बाहर से होते हैं परंतु भीतर से आत्मा पूर्णतः शांत और मुक्त रहती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक का स्मरण, मनन और इसके अर्थ का नियमित चिंतन करने से साधक को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं। प्राचीन ऋषियों और आधुनिक मनोवैज्ञानिकों दोनों ने ही इस प्रकार के आध्यात्मिक अभ्यासों के अद्भुत परिणामों को स्वीकारा है:

  • मानसिक शांति और स्थिरता: इस श्लोक के नियमित चिंतन से मन के भीतर चल रहे उद्वेग, चिंता, तनाव और भय स्वतः शांत होने लगते हैं, क्योंकि व्यक्ति समझ जाता है कि शरीर और प्रकृति बदल रहे हैं, पर उसकी वास्तविक आत्मा अचल है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: श्लोक के संस्कृत उच्चारण और उसके दिव्य अर्थ से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि की सात्त्विक ऊर्जा (औरा) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।
  • कर्मों के बंधनों से शुद्धि (कर्म योग): यह ज्ञान मनुष्य को फल की आसक्ति से मुक्त कर निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देता है, जिससे उसके नए कर्मों का बंधन नहीं बनता और पुराने कर्मों का क्षय होने लगता है।
  • पुनर्जन्म के भय से मुक्ति: जन्म-मरण के चक्र का भय मनुष्य को सबसे अधिक डराता है। इस श्लोक का बोध होने पर साधक समझ जाता है कि उसकी अमर आत्मा कभी नहीं मरती, जिससे मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
  • विवेक बुद्धि का विकास: 'क्षेत्र' (शरीर-मन) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा) का भेद स्पष्ट होने से व्यक्ति सही और गलत का निर्णय अत्यंत बुद्धिमत्ता और तटस्थता के साथ कर पाता है।
  • सांसारिक आसक्तियों में अनासक्ति: परिवार, धन, पद और प्रतिष्ठा के प्रति अत्यधिक मोह जो दुखों का कारण बनता है, वह धीरे-धीरे कम होने लगता है और व्यक्ति एक दृष्टा भाव (Witness attitude) में जीना सीख जाता है।
  • दिव्य कृपा की प्राप्ति: जो साधक भगवान श्री कृष्ण के इन वचनों को अपने जीवन में उतारता है, उस पर भगवान की अहेतुकी कृपा और आशीर्वाद निरंतर बरसता रहता है, जिससे उसकी आध्यात्मिक यात्रा सुगम हो जाती है।
  • जीवनमुक्त अवस्था का अनुभव: जीते-जी जीवन के समस्त विकारों, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और लघुता से ऊपर उठकर एक दिव्य आनंद से परिपूर्ण जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को हमारे वरिष्ठ वैदिक विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों द्वारा अत्यंत सूक्ष्म शोध के उपरांत तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद जैसे महान आचार्यों के भाष्यों और टीकाओं का गहन अध्ययन किया गया है ताकि पाठकों तक वेदान्त का शुद्धतम, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पहुंच सके। हमारी संपादकीय नीति यह सुनिश्चित करती है कि सनातन संस्कृति के किसी भी श्लोक या मंत्र की व्याख्या भ्रामक या अतिशयोक्तिपूर्ण न हो, अपितु वह तार्किक, शास्त्रसम्मत और आधुनिक जीवनशैली के लिए उपयोगी हो। यदि आपके मन में इस श्लोक से संबंधित कोई भी दार्शनिक जिज्ञासा है, तो आप हमारी वेबसाइट के माध्यम से हमसे संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: सनातन सांख्य और वेदान्त दर्शन के अनुसार, 'पुरुष' का अर्थ शरीर में स्थित चेतन आत्मा (द्रष्टा, ज्ञाता और भोक्ता) से है, जो निर्विकार और अमर है। वहीं 'प्रकृति' का अर्थ संपूर्ण भौतिक जगत, पंचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार और उनके तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से है जिससे यह भौतिक शरीर निर्मित हुआ है।

उत्तर: "सर्वथा वर्तमानोऽपि" का अर्थ है कि व्यक्ति कैसी भी स्थिति में हो, चाहे वह गृहस्थ आश्रम में हो, नौकरी कर रहा हो या समाज सेवा में हो—यानी संसार में हर प्रकार से कार्य करते हुए भी वह यदि पुरुष और प्रकृति के सत्य को जानता है, तो उसे घर-परिवार या समाज छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। असली संन्यास मन की आसक्ति का त्याग है, वस्त्रों का नहीं।

उत्तर: पुनर्जन्म का मूल कारण अज्ञान और इच्छाएं (कर्मफल की आसक्ति) हैं। जब मनुष्य यह जान लेता है कि वह नाशवान शरीर या गुणमयी प्रकृति नहीं बल्कि शुद्ध चेतन आत्मा है, तब उसकी संसार के प्रति कामनाएं समाप्त हो जाती हैं। कामनाओं के अभाव में नए कर्मबीज नहीं बनते, जिसके फलस्वरूप पुनर्जन्म का चक्र स्वतः रुक जाता है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के सभी श्लोक संपूर्ण मानव जाति के लिए हैं। इसके पाठ या अध्ययन के लिए किसी विशेष संन्यास या दीक्षा की अनिवार्यता नहीं है। कोई भी गृहस्थ, विद्यार्थी या वृद्ध व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका अध्ययन और मनन कर सकता है।

उत्तर: सत्वगुण मनुष्य में ज्ञान और सुख की आसक्ति पैदा करता है, रजोगुण कामना और कर्मों की लालसा पैदा करता है, तथा तमोगुण प्रमाद, आलस्य और अज्ञान में बांधता है। जब साधक इन तीनों गुणों की कार्यपद्धति को समझ लेता है, तो वह इनके प्रभाव से ऊपर उठकर गुणातीत अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति को उनके गुणों सहित जान लेता है, वह कैसा भी जीवन जीते हुए फिर जन्म नहीं पाता।

He who thus knows the Purusha and Prakriti together with the qualities, whatever way he may live, he is not born again.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मज्ञान ही परम मुक्ति है। इसके बाद कर्म बंधन नहीं बनाते।

Self-knowledge is the highest liberation. Thereafter, actions do not bind.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/35 69% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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