पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
जो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति को गुणों सहित जान लेता है, वह सब प्रकार से बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं पाता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व
सनातन धर्म और वेदान्त दर्शन में भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात् भगवती श्रुति का सार माना गया है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को निमित्त बनाकर दिया गया यह उपदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए भवसागर से तरने का एकमात्र महामंत्र है। प्रस्तुत श्लोक—"य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह | सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते || २४ ||"—श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का अत्यंत महत्वपूर्ण और जीवन का कायापलट करने वाला श्लोक है। इस श्लोक में जीव (पुरुष), प्रकृति और उनके त्रिगुणों (सत्, रज, तम) के यथार्थ ज्ञान के माध्यम से प्राप्त होने वाली परमसत्य की मुक्ति का अत्यंत सुंदर और स्पष्ट दिग्दर्शन कराया गया है।
इस पावन भूमंडल पर जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी जन्म और मरण के चक्र (संसार चक्र) में बंधा हुआ है। अज्ञानता और मोह के कारण जीव स्वयं को नाशवान शरीर मान बैठता है, और यहीं से दुखों की अनंत श्रृंखला प्रारंभ होती है। परंतु जब कोई साधक अपने भीतर के विवेक को जागृत करता है, तब उसे 'क्षेत्र' (शरीर, मन, बुद्धि) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा, ज्ञाता) का अंतर भली-भांति समझ आने लगता है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, अपितु यह अनुभवजन्य आत्मसाक्षात्कार है। जब मनुष्य प्रकृति और पुरुष के अलगाव व उनके संयोजन के सत्य को जान लेता है, तब वह संसार में रहते हुए भी संसार के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान मुक्तिदायक है और इस ज्ञान को प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने जीवन की किसी भी परिस्थिति में हो, किसी भी कुल, देश या काल में जीवित हो, वह इस नश्वर संसार के बार-बार होने वाले पुनर्जन्म के चक्र से सदा-सदा के लिए छूट जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी परम ज्ञान की गहराई में उतरेंगे और এর हर एक आयाम को शास्त्रीय व तार्किक दृष्टिकोण से समझेंगे।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
अथ त्रयोदशोऽध्यायः — श्लोक २४
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २४ ॥
"यः एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानः अपि न सः भूयः अभिजायते॥"
इस श्लोक का उच्चारण करने और इसका प्रतिदिन पाठ करने से मन में सात्त्विक ऊर्जा का प्रवाह होता है। विधि विधान के संदर्भ में, साधक को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके, पवित्र वस्त्र धारण कर, भगवान श्री कृष्ण के विग्रह या चित्र के समक्ष शांत चित्त से आसन पर बैठकर इस तेरहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए। श्लोक के प्रत्येक पद का उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए, जिससे इसकी आन्तरिक ध्वनि आपके सूक्ष्म शरीरों को आंदोलित कर सके और भीतर छिपे हुए अज्ञान के अंधकार को समूल नष्ट कर सके।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
इस श्लोक के मर्म को समझने के लिए इसके प्रत्येक शब्द (पद) का शाब्दिक अर्थ और उसके दार्शनिक निहितार्थ को जानना अति आवश्यक है। नीचे दी गई सारणी में इसका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
महाभारत के भीषण युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का मोह और विषाद चरम सीमा पर पहुँच गया था, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई। तेरहवां अध्याय विशेष रूप से 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय के आरंभ में अर्जुन ने प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के संबंध में सात महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे थे। इन प्रश्नों के उत्तर देते हुए योगेश्वर कृष्ण ने सृष्टि के आदिस्रोत से लेकर जीव के बंधन और मुक्ति के समस्त रहस्यों का पर्दाफाश किया।
वैदिक और पौराणिक साहित्यों में इस प्रसंग को सांख्य दर्शन और वेदान्त के समन्वय के रूप में देखा जाता है। महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस पर्व में यह दर्शाया गया है कि कैसे एक सामान्य मनुष्य भी संसार के तमाम प्रपंचों, युद्धों, पारिवारिक उत्तरदायित्वों और सामाजिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी परम आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहता है परंतु जल से कभी भीगता नहीं है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप को जान लेने वाला ज्ञानी पुरुष इस भौतिक संसार में रहते हुए भी इसके द्वंद्वों—राग-द्वेष, मान-अपमान, सुख-दुख—से अलिप्त रहता है। प्राचीन काल में राजा जनक, महर्षि शुकदेव और प्रह्लाद जैसे महापुरुषों ने इसी विद्या को आत्मसात करके जीवनमुक्त अवस्था का अनुभव किया था। यह श्लोक हमें यह आश्वस्त करता है कि आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने के लिए हिमालय की गुफाओं में भागने की आवश्यकता नहीं है, अपितु अपनी चेतना को रूपांतरित करने की आवश्यकता है जहाँ कर्म बाहर से होते हैं परंतु भीतर से आत्मा पूर्णतः शांत और मुक्त रहती है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक का स्मरण, मनन और इसके अर्थ का नियमित चिंतन करने से साधक को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं। प्राचीन ऋषियों और आधुनिक मनोवैज्ञानिकों दोनों ने ही इस प्रकार के आध्यात्मिक अभ्यासों के अद्भुत परिणामों को स्वीकारा है:
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को हमारे वरिष्ठ वैदिक विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों द्वारा अत्यंत सूक्ष्म शोध के उपरांत तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद जैसे महान आचार्यों के भाष्यों और टीकाओं का गहन अध्ययन किया गया है ताकि पाठकों तक वेदान्त का शुद्धतम, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पहुंच सके। हमारी संपादकीय नीति यह सुनिश्चित करती है कि सनातन संस्कृति के किसी भी श्लोक या मंत्र की व्याख्या भ्रामक या अतिशयोक्तिपूर्ण न हो, अपितु वह तार्किक, शास्त्रसम्मत और आधुनिक जीवनशैली के लिए उपयोगी हो। यदि आपके मन में इस श्लोक से संबंधित कोई भी दार्शनिक जिज्ञासा है, तो आप हमारी वेबसाइट के माध्यम से हमसे संपर्क कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति को उनके गुणों सहित जान लेता है, वह कैसा भी जीवन जीते हुए फिर जन्म नहीं पाता।
He who thus knows the Purusha and Prakriti together with the qualities, whatever way he may live, he is not born again.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आत्मज्ञान ही परम मुक्ति है। इसके बाद कर्म बंधन नहीं बनाते।
Self-knowledge is the highest liberation. Thereafter, actions do not bind.