श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 8 (अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga))

अध्याय 8 · श्लोक 18

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 58 मिनट का पठन 134 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
अव्यक्तात्
from the unmanifest
व्यक्तयः
manifestations
सर्वाः
all
प्रभवन्ति
come forth
अहःआगमे
at the coming of day
रात्रिआगमे
at the coming of night
प्रलीयन्ते
dissolve
तत्र
in that
एव
indeed
अव्यक्तसंज्ञके
called the unmanifest.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में सभी व्यक्त (प्रकट) पदार्थ अव्यक्त (अप्रकट) से उत्पन्न होते हैं; और रात्रि के आरम्भ में उसी अव्यक्त (नाम वाले) में लीन हो जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८॥"


श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' का यह १८वां श्लोक सनातन धर्म के उस विराट और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है, जो सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, और उसके महाप्रलय के शाश्वत चक्र को परिभाषित करता है। यह श्लोक केवल एक धार्मिक व्याख्यान नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय समय (Cosmic Time) और पदार्थ की विभिन्न अवस्थाओं के बीच होने वाले रूपांतरण का एक अत्यंत गूढ़ वैज्ञानिक व दार्शनिक दस्तावेज है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह समझा रहे हैं कि जिसे हम 'सृष्टि' या 'जीवन' कहते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा और चेतना का एक चक्रीय प्रवाह है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इस श्लोक का महत्व अद्वितीय है। यह हमें सिखाता है कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है; जो कुछ भी आज दृश्यमान या व्यक्त है, वह कल अदृश्य या अव्यक्त में विलीन हो जाएगा। यह सत्य हमें जीवन की अनित्यता का बोध कराता है और हमारे भीतर के अहंकार, आसक्ति तथा भय को समूल नष्ट करने की सामर्थ्य रखता है। जब एक साधक इस श्लोक के गहरे अर्थों में उतरता है, तो उसे यह समझ में आता है कि जन्म और मृत्यु, सृष्टि और प्रलय केवल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो ब्रह्मा के दिन और रात के रूप में निरंतर घटित हो रहे हैं।

आधुनिक भौतिक विज्ञान के 'लॉ ऑफ कंजर्वेशन ऑफ एनर्जी' (ऊर्जा के संरक्षण का नियम) और 'बिग बैंग' तथा 'बिग क्रंच' के सिद्धांत इस श्लोक के दार्शनिक आधार से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाते हैं। यह श्लोक हमें संकीर्ण भौतिकवादी दृष्टिकोण से ऊपर उठाकर उस अनंत, अविनाशी परम चेतना की ओर उन्मुख करता है, जो इस पूरे चक्र से परे है।

इस श्लोक की महत्ता इस बात में भी है कि यह हमें काल (Time) की उस विशालता से परिचित कराता है, जिसके सामने मानव जीवन का अस्तित्व एक क्षण मात्र प्रतीत होता है। यह विशाल दृष्टिकोण साधक को सांसारिक चिंताओं और तात्कालिक संकटों से ऊपर उठने की शक्ति प्रदान करता है, जिससे वह जीवन को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देख पाता है और आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८॥

संस्कृत उच्चारण एवं पाठ विधि (Recitation Method):

इस श्लोक का पाठ अनुष्टुप छंद में किया जाता है। इसका सस्वर पाठ करने से शरीर के भीतर सकारात्मक स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं। पाठ करने की प्रामाणिक विधि निम्नलिखित है:

  • पवित्रता: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  • ध्यान: सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज रूप या सारथी रूप का हृदय में ध्यान करें।
  • प्राणायाम: तीन बार गहरे श्वास लें और छोड़ें (प्राणायाम) ताकि मन स्थिर हो सके।
  • जप संख्या: इस श्लोक का कम से कम ११, २१ या १०८ बार श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  • ध्वनि तरंगें: श्लोक का उच्चारण करते समय 'अव्यक्तात्' और 'प्रलीयन्ते' शब्दों पर विशेष बल दें, जिससे नाभि चक्र से कंठ चक्र तक ऊर्जा का प्रवाह सुचारू रूप से हो सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

श्लोक के प्रत्येक शब्द में भारतीय दर्शन का अमूल्य खजाना छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का सरल अर्थ और उसका गहरा आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अव्यक्तात् (avyaktāt) अव्यक्त से (अदृश्य कारण रूप से) वह सूक्ष्म अवस्था जहाँ प्रकृति त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) की साम्यावस्था में रहती है और कोई भौतिक रूप प्रकट नहीं होता।
व्यक्तयः (vyaktayaḥ) समस्त दृश्य जगत और जीव स्थूल रूप में प्रकट होने वाले नाम, रूप और आकार वाले सभी चर-अचर प्राणी तथा भौतिक पिंड।
सर्वाः (sarvāḥ) सभी, संपूर्ण रूप से ब्रह्मांड की छोटी से छोटी चींटी से लेकर विशालकाय तारों और आकाशगंगाओं तक सब कुछ इसमें समाहित है।
प्रभवन्ति (prabhavanti) उत्पन्न होते हैं, प्रकट होते हैं अदृश्य ऊर्जा का दृश्य पदार्थ में रूपांतरित होना; सृष्टि का प्रारंभ होना।
अहरागमे (ahar-āgame) दिन के आगमन पर (ब्रह्मा के दिन) ब्रह्मा के जागने के समय, जो कि अरबों वर्षों की एक विशाल अवधि (कल्प) को दर्शाता है।
रात्र्यागमे (rātry-āgame) रात्रि के आगमन पर ब्रह्मा के शयन का समय, जब सृष्टि की सक्रियता समाप्त हो जाती है और विश्राम काल प्रारंभ होता है।
प्रलीयन्ते (pralīyante) विलीन हो जाते हैं, लय होते हैं पदार्थ का पुनः अपनी मूल सूक्ष्म ऊर्जा अवस्था में लौट जाना; महाप्रलय की स्थिति।
tatra (तत्र) वहाँ, उसी में उसी मूल स्रोत या कारण शरीर में जहाँ से वे उत्पन्न हुए थे।
eva (एव) ही (निश्चित रूप से) यह दर्शाता है कि इस चक्र से बचने का कोई अन्य भौतिक मार्ग नहीं है; यह अनिवार्य नियम है।
अव्यक्त-संज्ञके (avyakta-sañjñake) अव्यक्त नाम वाले तत्व में वह परम कारण (प्रकृति या ब्रह्म की माया शक्ति) जो बुद्धि और इंद्रियों की सीमा से परे है।
गूढ़ भावार्थ विश्लेषण:

इस श्लोक का केंद्रीय भाव यह है कि यह संपूर्ण भौतिक जगत एक चक्रीय प्रक्रिया से गुजरता है। जब ब्रह्मा का दिन उदय होता है, तब अव्यक्त (Unmanifested) से व्यक्त (Manifested) सृष्टि का प्राकट्य होता है। इसके विपरीत, जब ब्रह्मा की रात्रि आती है, तब यह संपूर्ण व्यक्त सृष्टि पुनः उसी अव्यक्त में विलीन हो जाती है। यह चक्र अनंत काल से चल रहा है और चलता रहेगा। जीव इस चक्र में अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता और मरता रहता है, जब तक कि वह उस परम पुरुषोत्तम को प्राप्त नहीं कर लेता जो इस अव्यक्त से भी परे है।

दार्शनिक रूप से, यहाँ 'अव्यक्त' शब्द के दो अर्थ ग्रहण किए जाते हैं। पहला अर्थ है 'प्रकृति' या 'प्रधान', जो त्रिगुणात्मक माया शक्ति है। दूसरा अर्थ है 'अक्षर ब्रह्म' या 'परमेश्वर', जो इस प्रकृति का भी अधिष्ठान है। भगवान श्रीकृष्ण आगे के श्लोकों में स्पष्ट करेंगे कि इस अव्यक्त प्रकृति से भी परे एक अन्य सनातन अव्यक्त भाव है, जिसका कभी विनाश नहीं होता। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को दृश्यमान जगत की नश्वरता दिखाकर उसे उस अदृश्य, अविनाशी परम तत्व की खोज करने के लिए प्रेरित करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें वैदिक काल-गणना (Vedic Cosmology) और पुराणों में वर्णित काल के चक्र को समझना होगा। सनातन धर्म में समय को रैखिक (Linear) नहीं, बल्कि चक्रीय (Cyclic) माना गया है। इस काल-गणना के अनुसार, ब्रह्मा का एक दिन (जिसे 'कल्प' कहा जाता है) मनुष्यों के ४ अरब ३२ करोड़ वर्षों के बराबर होता है। इतनी ही लंबी उनकी एक रात्रि भी होती है।

श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में इस प्रक्रिया का अत्यंत विस्तार से वर्णन मिलता है। जब ब्रह्मा जी जागते हैं, तो वे अपनी योगमाया से सृष्टि की रचना की इच्छा करते हैं। इस समय, पूर्व कल्पों में संचित जीवों के कर्मों के अनुसार, प्रकृति के गर्भ से महत्तत्व, अहंकार, पंचतन्मात्राएं और पंचमहाभूत प्रकट होते हैं। यही 'अहरागमे प्रभवन्ति' की अवस्था है। इसके विपरीत, जब ब्रह्मा का दिन समाप्त होता है, तो 'नैमित्तिक प्रलय' होता है। इस प्रलय में तीनों लोक (भूः, भुवः, स्वः) अव्यक्त में समा जाते हैं। जीव अपने सूक्ष्म शरीरों के साथ सुषुप्ति की अवस्था में चले जाते हैं, जैसे हम रात को सोते समय अपनी चेतना को समेट लेते हैं।

महाभारत के युद्ध क्षेत्र में अर्जुन जब अपनों को खोने के भय और मोह से ग्रस्त थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह विराट सत्य समझाया। उन्होंने अर्जुन को यह अनुभव कराया कि जिन भीष्म, द्रोण और अन्य योद्धाओं की मृत्यु पर वे शोक कर रहे हैं, वे सभी इस शाश्वत चक्र के अधीन हैं। वे पहले भी अव्यक्त थे, आज व्यक्त हैं, और कल पुनः अव्यक्त हो जाएंगे। इसलिए, ज्ञानी पुरुष को इस परिवर्तनशील भौतिक जगत के लिए शोक नहीं करना चाहिए, बल्कि उस अविनाशी तत्व की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए जो इस उत्पत्ति और प्रलय के चक्र से सर्वथा परे है।

ऋग्वेद के 'नासदीय सूक्त' में भी इसी अव्यक्त अवस्था का वर्णन मिलता है, जहाँ कहा गया है कि सृष्टि के प्रारंभ से पूर्व न सत् था, न असत् था, केवल अंधकार से ढका हुआ अंधकार था। वही अव्यक्त अवस्था इस श्लोक में वर्णित है, जो ईश्वर की अचिंत्य शक्ति का परिचायक है।

इस प्रकार, यह श्लोक केवल एक आध्यात्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म के उस वैज्ञानिक और खगोलीय ज्ञान का प्रमाण है, जो आधुनिक विज्ञान के विकसित होने से हजारों वर्ष पूर्व ही हमारे ऋषियों द्वारा समाधि की अवस्था में साक्षात्कृत किया गया था। यह हमें सिखाता है कि सृष्टि का कोई भी कण नष्ट नहीं होता, वह केवल अपना रूप बदलता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित मनन और जप केवल दार्शनिक ज्ञान नहीं देता, बल्कि साधक के व्यावहारिक जीवन में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

१. मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति

यह श्लोक हमें सिखाता है कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं। इस सत्य को स्वीकार करने से जीवन के उतार-चढ़ाव में मानसिक संतुलन और गहरी शांति प्राप्त होती है।

२. मृत्यु के भय का समूल नाश

जब साधक यह समझ जाता है कि मृत्यु केवल 'अव्यक्त' में लौटने की एक प्रक्रिया है, न कि पूर्ण विनाश, तो उसका मृत्यु के प्रति भय समाप्त हो जाता है।

३. वैराग्य और अनासक्ति का उदय

संसार की अनित्यता का बोध होने से भौतिक वस्तुओं और संबंधों के प्रति अत्यधिक मोह और आसक्ति कम होती है, जो दुखों का मूल कारण है।

४. ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि

इस श्लोक के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से मन अंतर्मुखी होता है, जिससे ध्यान (Meditation) की गहराई में उतरना अत्यंत सरल हो जाता है।

५. सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Aura) का विकास

इस श्लोक के संस्कृत अक्षरों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को सक्रिय करती हैं और शरीर के चारों ओर एक सुरक्षात्मक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करती हैं।

६. कर्म बंधनों के प्रति जागरूकता

यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हमारे कर्म ही अगले कल्प या जन्म की रूपरेखा तय करते हैं, जिससे साधक दुष्कर्मों से बचकर सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है।

७. ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) से जुड़ाव

साधक स्वयं को एक संकीर्ण शरीर न मानकर उस विराट ब्रह्मांडीय योजना का एक हिस्सा मानने लगता है, जिससे उसका दृष्टिकोण अत्यंत विशाल हो जाता है।

८. विवेक और प्रज्ञा की जागृति

नियमित पाठ से बुद्धि कुशाग्र होती है और सत्य तथा असत्य, नित्य तथा अनित्य के बीच भेद करने की विवेक शक्ति (Discretionary Power) जागृत होती है।

९. अवसाद (Depression) से मुक्ति

यह श्लोक जीवन की किसी भी बड़ी हानि या असफलता के समय मानसिक संबल प्रदान करता है, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि सब कुछ परिवर्तनशील है।

१०. ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण (Sharanagati)

सृष्टि के इस विशाल चक्र को देखकर साधक के भीतर नम्रता का भाव जागृत होता है, जिससे वह अपनी इच्छाओं को ईश्वर की इच्छा में विलीन कर देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह विश्लेषण श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों जैसे आदि शंकराचार्य कृत 'शारीरिक भाष्य', रामानुजाचार्य कृत 'गीता भाष्य', और आधुनिक युग के महान संतों के विचारों के समन्वय पर आधारित संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस श्लोक की प्रामाणिकता और इसकी दार्शनिक व्याख्या उपनिषदों (विशेषकर कठोपनिषद और श्वेताश्वतरोपनिषद) के सिद्धांतों से पूर्णतः मेल खाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण से, यह श्लोक हमें पलायनवाद नहीं सिखाता, बल्कि यह हमें जीवन के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराकर अधिक कर्तव्यनिष्ठ और साहसी बनाता है। जब हम यह जान जाते हैं कि यह संसार एक रंगमंच है जहाँ दृश्य बदलते रहते हैं, तो हम अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी तनाव या अवसाद के कर पाते हैं। यह श्लोक ज्ञानयोग और भक्तियोग का एक सुंदर सेतु है, जो हमें कर्मफल की चिंता किए बिना ईश्वर के प्रति समर्पित होने की प्रेरणा देता है।

संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ८, श्लोक १८), विष्णु पुराण (अंश ६), श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध ३, अध्याय ११), कठोपनिषद (अध्याय १, वल्ली ३)।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यहाँ 'अव्यक्त' का अर्थ प्रकृति की वह सूक्ष्म, अप्रकट और कारण अवस्था है जिसमें तीनों गुण (सत्व, रज, तम) संतुलित रहते हैं। यह वह अवस्था है जहाँ सृष्टि का कोई नाम या रूप नहीं होता। इसे ईश्वर की 'माया शक्ति' या 'प्रधान' भी कहा जाता है, जिससे संपूर्ण भौतिक जगत की उत्पत्ति होती है और प्रलय के समय सब कुछ इसी में विलीन हो जाता है।

वैदिक काल-गणना के अनुसार, ब्रह्मा का एक दिन (कल्प) १,००० महायुगों के बराबर होता है। एक महायुग (चतुर्युग) में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग शामिल हैं, जिनकी कुल अवधि ४३,२०,००० मानव वर्ष होती है। अतः ब्रह्मा का एक दिन ४ अरब ३२ करोड़ मानव वर्षों का होता है, और उनकी रात्रि भी इतनी ही लंबी होती है।

नहीं, आत्मा कभी नष्ट नहीं होती क्योंकि वह अजर-अमर है। प्रलय के समय केवल भौतिक शरीर और ब्रह्मांड का स्थूल रूप नष्ट होता है। मुक्त न होने वाली आत्माएं अपने संचित कर्मों और सूक्ष्म शरीर के साथ 'अव्यक्त' में सुषुप्ति (गहरी नींद) जैसी अवस्था में चली जाती हैं। जब पुनः नया कल्प (ब्रह्मा का दिन) प्रारंभ होता है, तो वे अपने पूर्व कर्मों के अनुसार पुनः शरीर धारण करती हैं।

इस ज्ञान को जीवन में उतारने का अर्थ है 'समत्व भाव' में रहना। जब हम यह जान जाते हैं कि सुख-दुख, सफलता-असफलता, और परिस्थितियां सब अस्थायी हैं और समय के साथ विलीन हो जाएंगी, तो हम अत्यधिक हर्ष या शोक से बच जाते हैं। यह हमें वर्तमान क्षण में जीने, अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन करने और मानसिक रूप से शांत रहने की प्रेरणा देता है।

हाँ, इस चक्र से बाहर निकलने को ही 'मोक्ष' या 'मुक्ति' कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण गीता के इसी अध्याय के अगले श्लोकों में बताते हैं कि जो मनुष्य इस अव्यक्त जगत से भी परे उस परम दिव्य पुरुष (परमेश्वर) को अनन्य भक्ति, ज्ञान और निष्काम कर्म द्वारा प्राप्त कर लेता है, वह पुनः इस दुखमय और क्षणभंगुर संसार के जन्म-मरण के चक्र में वापस नहीं आता।

हाँ, आधुनिक भौतिक विज्ञान का 'ऊर्जा संरक्षण का नियम' (Law of Conservation of Energy) कहता है कि ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। यह श्लोक भी यही कहता है कि सृष्टि नष्ट नहीं होती, बल्कि 'व्यक्त' से 'अव्यक्त' और 'अव्यक्त' से 'व्यक्त' रूप में परिवर्तित होती रहती है।

॥ श्री कृष्णार्पणमस्तु ॥

यह ज्ञान आपके जीवन में विवेक, शांति और भक्ति का संचार करे।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कृष्ण कहते हैं: ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में सभी व्यक्त (प्रकट) पदार्थ अव्यक्त (अप्रकट) से उत्पन्न होते हैं; और रात्रि के आरम्भ में उसी अव्यक्त (नाम वाले) में लीन हो जाते हैं। Krishna says: At the approach of Brahma's day, all manifestations come forth from the unmanifest; at the approach of night, they dissolve into that same unmanifest, called the avyakta.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह चक्र बताता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी सृष्टि और प्रलय के अधीन है। केवल परमात्मा ही इनसे परे है। This cycle shows that even the entire universe is subject to creation and dissolution. Only the Supreme Lord transcends them.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/28 64% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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