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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 8 · श्लोक 10

अध्याय 8 · श्लोक 10

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १०॥

prayāṇa-kāle manasācalena bhaktyā yukto yoga-balena caiva | bhruvor madhye prāṇam āveśya samyak sa taṃ paraṃ puruṣam upaiti divyam ||10||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

प्रयाणकाले: at the time of death; मनसा: with mind; अचलेन: unmoving; भक्त्या: with devotion; युक्तः: endowed; योगबलेन: by the power of yoga; च: and; एव: indeed; भ्रुवोः: of the eyebrows; मध्ये: in the space between; प्राणम्: the life force; आवेश्य: having placed; सम्यक्: properly; सः: he; तम्: that; परम्: Supreme; पुरुषम्: Person; उपैति: attains; दिव्यम्: divine.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अन्तकाल में अचल मन से, भक्ति और योगबल से युक्त होकर, भौंहों के मध्य प्राण को सम्यक् रूप से स्थापित करके, वह योगी उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

English Translation

At the time of death, with an unmoving mind, endowed with devotion and the power of yoga, fixing the life force properly between the eyebrows, one attains that Supreme Divine Person.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक मृत्यु के समय ध्यान की विधि बताता है: मन को स्थिर कर, भक्ति और योगबल से प्राण को आज्ञाचक्र में लगाकर, भगवान को प्राप्त होता है। This verse describes the method of meditation at death: with a steady mind, devotion, and yogic power, fixing the prana between the eyebrows, one attains the Lord.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।