श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 8 (अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga))

अध्याय 8 · श्लोक 10

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 40 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
प्रयाणकाले
at the time of death
मनसा
with mind
अचलेन
unmoving
भक्त्या
with devotion
युक्तः
endowed
योगबलेन
by the power of yoga
च
and
एव
indeed
भ्रुवोः
of the eyebrows
मध्ये
in the space between
प्राणम्
the life force
आवेश्य
having placed
सम्यक्
properly
सः
he
तम्
that
परम्
Supreme
पुरुषम्
Person
उपैति
attains
दिव्यम्
divine.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अन्तकाल में अचल मन से, भक्ति और योगबल से युक्त होकर, भौंहों के मध्य प्राण को सम्यक् रूप से स्थापित करके, वह योगी उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय (अक्षरब्रह्मयोग) का यह दसवां श्लोक मानव जीवन की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण यात्रा—'प्रयाणकाल' (मृत्यु के क्षण)—की वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और योगिक प्रक्रिया का उद्घाटन करता है। भारतीय सनातन दर्शन में मृत्यु को अंत नहीं, अपितु आत्मा का एक नए और दिव्य आयाम में संक्रमण माना गया है। यह श्लोक केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह चेतना के रूपांतरण का एक व्यावहारिक विज्ञान है। जब मनुष्य इस नश्वर संसार को त्यागता है, तब उसकी मानसिक स्थिति, उसकी संचित ऊर्जा और उसके प्राणों की दिशा ही यह निर्धारित करती है कि उसका अगला गंतव्य क्या होगा। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह समझा रहे हैं कि कैसे जीवन भर की साधना, भक्ति और योगबल के संचय से मृत्यु के उस अत्यंत संवेदनशील क्षण में भी मन को विचलित होने से बचाया जा सकता है। इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें जीवन जीने की कला के साथ-साथ गरिमापूर्ण और मुक्तियुक्त मृत्यु प्राप्त करने की कला भी सिखाता है। यह चेतना को भौतिकता के संकीर्ण दायरे से उठाकर 'परम पुरुष' के दिव्य और शाश्वत धाम में विलीन करने का महामार्ग प्रशस्त करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।

भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १०॥"

संस्कृत उच्चारण एवं संधि-विच्छेद:

संधि-विच्छेद: प्रयाण-काले | मनसा | अचलेन | भक्त्या | युक्तः | योग-बलेन | च | एव | भ्रुवोः | मध्ये | प्राणम् | आवेश्य | सम्यक् | सः | तम् | परम् | पुरुषम् | उपैति | दिव्यम् ||

उच्चारण निर्देश: इस श्लोक का पाठ करते समय 'मनसाचलेन' और 'भ्रुवोर्मध्ये' के संयुक्त अक्षरों पर विशेष ध्यान दें। 'प्राणमावेश्य' का उच्चारण अत्यंत शांत और लयबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए ताकि शरीर के भीतर प्राणिक स्पंदन जागृत हो सके।

सरल हिंदी भावानुवाद:

जो साधक मृत्यु के समय (प्रयाणकाल में) निश्चल मन से, अटूट भक्ति से युक्त होकर तथा योगबल के द्वारा अपने प्राणों को दोनों भौहों के बीच (आज्ञा चक्र में) भली-भांति स्थापित कर लेता है, वह उस परम दिव्य पुरुष (परमात्मा) को ही प्राप्त होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
प्रयाणकाले मृत्यु के समय / प्रस्थान काल में यह वह क्षण है जब जीवात्मा स्थूल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ यात्रा पर निकलती है। इस समय चेतना का अत्यंत संवेदनशील होना अनिवार्य है।
मनसा अचलेन निश्चल, स्थिर और विचलित न होने वाले मन से मृत्यु के समय शारीरिक पीड़ा और मानसिक व्याकुलता के कारण मन अशांत हो जाता है। 'अचल मन' का अर्थ है कि संसार के प्रति कोई आसक्ति या भय न रहे, केवल ईश्वर में ध्यान केंद्रित हो।
भक्त्या युक्तो परम प्रेम और अनन्य भक्ति से परिपूर्ण होकर केवल यांत्रिक योग क्रिया पर्याप्त नहीं है; हृदय में परमात्मा के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और शरणागति का भाव होना अनिवार्य है। भक्ति ही मन को कोमलता और स्थिरता प्रदान करती है।
योगबलेन योग की शक्ति या साधना के बल से यह बल रातों-रात नहीं आता। जीवन भर किए गए प्राणायाम, ध्यान, और अष्टांग योग के अभ्यास से संचित हुई वह आंतरिक ऊर्जा, जो प्राणों को नियंत्रित करने की क्षमता देती है।
चैव (च + एव) और निश्चित रूप से यह इस बात पर बल देता है कि भक्ति और योगबल दोनों का समन्वय ही इस परम गति को प्राप्त करने का एकमात्र अचूक साधन है।
भ्रुवोर्मध्ये दोनों भौहों के बीच (आज्ञा चक्र में) यह शरीर का छठा चक्र है, जिसे 'तृतीय नेत्र' भी कहा जाता है। यह मन और बुद्धि का मिलन स्थल है, जहाँ से प्राणों को ऊर्ध्वगामी दिशा मिलती है।
प्राणमावेश्य प्राण वायु को भली-भांति स्थापित करके प्राणों को शरीर के निचले द्वारों से समेटकर सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से आज्ञा चक्र में केंद्रित करना। यह प्राणों के विसर्जन की सर्वोच्च योगिक विधि है।
सम्यक् पूर्ण रूप से, बिना किसी त्रुटि के बिना किसी घबराहट या संशय के, अत्यंत शांत और व्यवस्थित तरीके से की गई क्रिया। यह पूर्ण परिपक्वता को दर्शाती है।
तं परं पुरुषं उस परम दिव्य पुरुष (परमात्मा) को वह परमेश्वर जो सृष्टि का नियंता है, जो सगुण और निर्गुण दोनों रूपों से परे, सच्चिदानंद स्वरूप है।
उपैति दिव्यम् दिव्य रूप से प्राप्त होता है / विलीन हो जाता है जीवात्मा का परमात्मा में ऐसा मिलन जिससे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है और वह शाश्वत आनंद को प्राप्त करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के भीषण युद्ध क्षेत्र, कुरुक्षेत्र से जुड़ी है। अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई थी कि जो साधक जीवन भर साधना करते हैं, वे अंत समय में भगवान को किस प्रकार याद रख पाते हैं? और मृत्यु के समय भगवान का स्मरण करने की वास्तविक विधि क्या है? इसी के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने 'अक्षरब्रह्मयोग' के अंतर्गत इस परम गोपनीय ज्ञान का उद्घाटन किया।

वैदिक और उपनिषदिक साहित्य में, विशेष रूप से कठोपनिषद और प्रश्न उपनिषद में, शरीर से प्राणों के उत्क्रमण (बाहर निकलने) की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है। उपनिषदों के अनुसार, हृदय से १०१ मुख्य नाड़ियाँ निकलती हैं, जिनमें से केवल एक नाड़ी—'सुषुम्ना'—मस्तिष्क के शीर्ष (ब्रह्मरंध्र) की ओर जाती है। मृत्यु के समय यदि प्राण इस सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य) और फिर ब्रह्मरंध्र से बाहर निकलते हैं, तो जीवात्मा को मोक्ष या परम गति प्राप्त होती है।

पौराणिक संदर्भों में, पितामह भीष्म का उदाहरण इस श्लोक की सबसे जीवंत प्रस्तुति है। भीष्म पितामह को 'इच्छा मृत्यु' का वरदान प्राप्त था। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद, जब वे शरशय्या पर लेटे थे, तब उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। उत्तरायण काल के आते ही, उन्होंने अपनी संपूर्ण इंद्रियों को समेटकर, मन को भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप में स्थिर किया, अपने प्राणों को योगबल से आज्ञा चक्र में स्थापित किया और अत्यंत शांतिपूर्वक अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया। भीष्म की यह मुक्ति इसी श्लोक में वर्णित 'योगबलेन चैव' और 'भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य' की साक्षात सिद्धि थी। महर्षि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि अंत समय की यह समाधि अचानक घटित नहीं होती; इसके लिए जीवन भर के सतत अभ्यास, वैराग्य और ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण की आवश्यकता होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • १
    मृत्यु के भय से मुक्ति: इस श्लोक के नियमित चिंतन और पाठ से साधक के भीतर से मृत्यु का अचेतन भय समाप्त हो जाता है और वह जीवन को अधिक साहस के साथ जीता है।
  • २
    आज्ञा चक्र का जागरण: 'भ्रुवोर्मध्ये' पर ध्यान केंद्रित करने से आज्ञा चक्र सक्रिय होता है, जिससे मानसिक स्पष्टता, अंतर्ज्ञान (Intuition) और एकाग्रता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
  • ३
    प्राणिक ऊर्जा का संतुलन: योगबल और प्राणायाम के अभ्यास से शरीर की पंचप्राण वायु संतुलित होती है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  • ४
    मानसिक शांति और स्थिरता: 'मनसा अचलेन' का अभ्यास दैनिक जीवन के तनाव, अवसाद और व्याकुलता को दूर कर मन को एक गहरी शांति प्रदान करता है।
  • ५
    अनन्य भक्ति का उदय: भगवान के प्रति समर्पण भाव सुदृढ़ होता है, जिससे साधक का हृदय अहंकार से मुक्त होकर दिव्य प्रेम से भर जाता है।
  • ६
    सकारात्मक आभा मंडल (Aura): इस श्लोक के स्पंदन से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।
  • ७
    कर्मों का शुद्धिकरण: अंत समय में परमात्मा का ध्यान संचित पाप कर्मों के प्रभाव को क्षीण कर देता है और आत्मा को उच्च लोकों की यात्रा के योग्य बनाता है।
  • ८
    इंद्रिय निग्रह की क्षमता: नियमित अभ्यास से साधक अपनी इंद्रियों को वश में करने में सफल होता है, जिससे वासनाओं और सांसारिक आसक्तियों का शमन होता है।
  • ९
    दिव्य चेतना से जुड़ाव: यह श्लोक साधक को यह स्मरण कराता रहता है कि उसका वास्तविक स्वरूप भौतिक शरीर नहीं, बल्कि वह दिव्य पुरुष (परमात्मा) का ही एक अंश है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण Bhaktilok.in के विद्वान मंडल द्वारा तैयार की गई संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस व्याख्या का आधार प्रस्थानत्रयी (श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र) के प्रामाणिक भाष्य हैं, जिनमें आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और ज्ञानेश्वर महाराज की टीकाओं को मुख्य संदर्भ माना गया है। इस श्लोक में वर्णित 'योगबल' और 'प्राण' की अवधारणाएं पतंजलि योगसूत्र के अष्टांग योग (विशेषकर धारणा, ध्यान और समाधि) के सिद्धांतों के पूर्णतः अनुकूल हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, विशुद्ध दार्शनिक और व्यावहारिक आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचाना है, ताकि वे अपने दैनिक जीवन में योग और भक्ति के इस अद्भुत समन्वय को उतार सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'प्रयाणकाल' का अर्थ है वह समय जब जीवात्मा इस भौतिक शरीर को छोड़कर प्रस्थान करती है, जिसे सामान्य भाषा में मृत्यु का क्षण कहा जाता है। गीता के अनुसार, अंत समय में मनुष्य का मन जिस भाव या विचार में लीन रहता है, उसे अपने अगले जन्म में वैसी ही योनि या गति प्राप्त होती है। इसलिए, इस क्षण में मन का स्थिर और ईश्वर में केंद्रित होना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही आत्मा की अंतिम मुक्ति या पुनर्जन्म का मार्ग तय करता है।

दोनों भौहों के बीच का स्थान 'आज्ञा चक्र' (Ajna Chakra) कहलाता है। यह शरीर का वह ऊर्जा केंद्र है जहाँ मन, बुद्धि और प्राण का मिलन होता है। योग शास्त्र के अनुसार, जब प्राणों को इस चक्र में सम्यक् रूप से स्थापित किया जाता है, तो सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुल जाता है। इस मार्ग से प्राणों का विसर्जन होने पर जीवात्मा सीधे उच्च लोकों या मोक्ष (परम पुरुष की प्राप्ति) को प्राप्त होती है, और वह निचले, अंधकारमय लोकों में जाने से बच जाती है।

हाँ, यह संभव है, परंतु इसके लिए जीवन भर के सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में 'अभ्यासयोग' पर बल दिया है। यदि कोई गृहस्थ व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में नियमित रूप से ध्यान, प्राणायाम और भगवान के नाम का जप करता है, तो धीरे-धीरे उसका मन वश में होने लगता है। अंत समय में वही संस्कार उभर कर आते हैं जिनका अभ्यास जीवन भर किया गया हो। इसलिए, गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी अनासक्ति और भक्ति के द्वारा इस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

यह गीता के समन्वयवादी दृष्टिकोण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। केवल 'योगबल' (प्राणायाम और चक्र ध्यान) से मन को नियंत्रित करना कठिन और शुष्क हो सकता है, और केवल 'भक्ति' के बिना योग अधूरा है। भक्ति हृदय को कोमल बनाती है और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण लाती है, जबकि योगबल मन को एकाग्र करने और प्राणों को नियंत्रित करने की तकनीकी शक्ति प्रदान करता है। जब ये दोनों मिलते हैं, तो साधक के लिए परमात्मा को प्राप्त करना अत्यंत सुगम और सुनिश्चित हो जाता है।

'परं पुरुषमुपैति दिव्यम्' का अर्थ है उस परम दिव्य पुरुष (परमात्मा) में लीन हो जाना या उनके सायुज्य मोक्ष को प्राप्त करना। यहाँ 'पुरुष' का अर्थ किसी भौतिक पुरुष से नहीं, बल्कि उस सर्वव्यापी चेतना से है जो इस ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है (पुरि शयनात् पुरुषः - जो इस ब्रह्मांड रूपी पुरी में शयन करता है)। 'दिव्यम्' शब्द यह दर्शाता है कि वह परमात्मा प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे, स्वयंप्रकाशित और शाश्वत आनंद स्वरूप है। उसे प्राप्त करने के बाद जीवात्मा पुनः इस संसार के दुखों और जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं लौटती।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कृष्ण कहते हैं: अन्तकाल में अचल मन से, भक्ति और योगबल से युक्त होकर, भौंहों के मध्य प्राण को सम्यक् रूप से स्थापित करके, वह योगी उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है। Krishna says: At the time of death, with an unmoving mind, endowed with devotion and the power of yoga, fixing the life force properly between the eyebrows, one attains that Supreme Divine Person.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यहाँ योग और भक्ति का समन्वय है। योग के माध्यम से प्राण को नियंत्रित करना और भक्ति से मन को भगवान में लगाना - यह दोनों मिलकर मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। Here yoga and devotion are combined. Controlling the prana through yoga and fixing the mind on the Lord through devotion together pave the way to liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/28 36% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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