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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 9

अध्याय 6 · श्लोक 9

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९॥

suhṛn-mitrāry-udāsīna-madhyastha-dveṣya-bandhuṣu | sādhuṣv api ca pāpeṣu sama-buddhir viśiṣyate ||9||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सुहृत्: हितैषी; मित्र: मित्र; अरि: शत्रु; उदासीन: तटस्थ; मध्यस्थ: मध्यस्थ; द्वेष्य: द्वेष करने योग्य; बन्धुषु: बन्धुओं में; साधुषु: सज्जनों में; अपि: भी; च: और; पापेषु: पापियों में; समबुद्धिः: समान बुद्धि वाला; विशिष्यते: अधिक श्रेष्ठ है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में समान भाव रखता है, वह (योगियों में) अधिक श्रेष्ठ है।

English Translation

One who is of equal mind towards benefactors, friends, foes, neutrals, mediators, the hateful, relatives, the righteous and the unrighteous – such a person is superior.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ योगी की समदृष्टि को और भी व्यापक बताया गया है – सभी प्रकार के लोगों (मित्र, शत्रु, सज्जन, दुर्जन) के प्रति समान भाव रखने वाला योगी विशेष रूप से श्रेष्ठ है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।