ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 9
श्लोक ९ में कहा गया है कि सबमें समान बुद्धि रखने वाला योगी श्रेष्ठ है।
संस्कृत श्लोक
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९॥
suhṛn-mitrāry-udāsīna-madhyastha-dveṣya-bandhuṣu | sādhuṣv api ca pāpeṣu sama-buddhir viśiṣyate ||9||
पदच्छेद / शब्दार्थ
सुहृत्: हितैषी; मित्र: मित्र; अरि: शत्रु; उदासीन: तटस्थ; मध्यस्थ: मध्यस्थ; द्वेष्य: द्वेष करने योग्य; बन्धुषु: बन्धुओं में; साधुषु: सज्जनों में; अपि: भी; च: और; पापेषु: पापियों में; समबुद्धिः: समान बुद्धि वाला; विशिष्यते: अधिक श्रेष्ठ है।
हिंदी अनुवाद
जो हितैषी, मित्र, शत्रु, तटस्थ, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, सज्जन और पापियों में समान भाव रखता है, वह (योगियों में) अधिक श्रेष्ठ है।
English Translation
One who is of equal mind towards benefactors, friends, foes, neutrals, mediators, the hateful, relatives, the righteous and the unrighteous – such a person is superior.
टीका / Commentary
यहाँ योगी की समदृष्टि को और भी व्यापक बताया गया है – सभी प्रकार के लोगों (मित्र, शत्रु, सज्जन, दुर्जन) के प्रति समान भाव रखने वाला योगी विशेष रूप से श्रेष्ठ है।