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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 10

अध्याय 6 · श्लोक 10

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १०॥

yogī yuñjīta satatam ātmānaṃ rahasi sthitaḥ | ekākī yata-cittātmā nirāśīr aparigrahaḥ ||10||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

योगी: योगी; युञ्जीत: योग में लगाए; सततम्: निरन्तर; आत्मानम्: अपने आपको; रहसि: एकान्त में; स्थितः: स्थित हुआ; एकाकी: अकेला; यतचित्तात्मा: चित्त और शरीर को वश में किए हुए; निराशीः: आशारहित; अपरिग्रहः: संग्रह रहित।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान में रहता हुआ निरन्तर अपने चित्त को योग में लगाए। वह अकेला, मन और शरीर को वश में किए हुए, आशारहित और संग्रहरहित हो।

English Translation

The yogi should constantly engage his mind in meditation, remaining in a solitary place, alone, with mind and body controlled, free from desires and without any sense of possessiveness.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ध्यान के लिए आवश्यक शर्तें: एकान्त, एकाकीपन, चित्त और इन्द्रियों पर नियंत्रण, आशा और परिग्रह का त्याग।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।