ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 10
श्लोक १० में ध्यान के लिए एकान्त, मनोनिग्रह और त्याग की आवश्यकता बताई गई है।
संस्कृत श्लोक
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १०॥
yogī yuñjīta satatam ātmānaṃ rahasi sthitaḥ | ekākī yata-cittātmā nirāśīr aparigrahaḥ ||10||
पदच्छेद / शब्दार्थ
योगी: योगी; युञ्जीत: योग में लगाए; सततम्: निरन्तर; आत्मानम्: अपने आपको; रहसि: एकान्त में; स्थितः: स्थित हुआ; एकाकी: अकेला; यतचित्तात्मा: चित्त और शरीर को वश में किए हुए; निराशीः: आशारहित; अपरिग्रहः: संग्रह रहित।
हिंदी अनुवाद
योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान में रहता हुआ निरन्तर अपने चित्त को योग में लगाए। वह अकेला, मन और शरीर को वश में किए हुए, आशारहित और संग्रहरहित हो।
English Translation
The yogi should constantly engage his mind in meditation, remaining in a solitary place, alone, with mind and body controlled, free from desires and without any sense of possessiveness.
टीका / Commentary
ध्यान के लिए आवश्यक शर्तें: एकान्त, एकाकीपन, चित्त और इन्द्रियों पर नियंत्रण, आशा और परिग्रह का त्याग।