ध्यान योग (Dhyan Yoga) – श्लोक 11
श्लोक ११ में ध्यान के लिए उपयुक्त आसन का वर्णन है।
संस्कृत श्लोक
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११॥
śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ | nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājina-kuśottaram ||11||
पदच्छेद / शब्दार्थ
शुचौ: पवित्र; देशे: स्थान में; प्रतिष्ठाप्य: स्थापित करके; स्थिरम्: स्थिर; आसनम्: आसन; आत्मनः: अपने लिए; न: नहीं; अत्युच्छ्रितम्: बहुत ऊँचा; न: नहीं; अतिनीचम्: बहुत नीचा; चैल-अजिन-कुशोत्तरम्: वस्त्र, मृगचर्म और कुश के आसनों से युक्त (या उनसे बना हुआ)।
हिंदी अनुवाद
किसी पवित्र स्थान में अपने लिए एक स्थिर आसन स्थापित करे, न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा हो।
English Translation
Having established a firm seat in a clean place, neither too high nor too low, with cloth, deerskin and kuśa grass spread over it, one upon the other.
टीका / Commentary
ध्यान के लिए आसन की विधि: पवित्र स्थान, स्थिर आसन, न ऊँचा न नीचा, तीन परतें (कुश, चर्म, वस्त्र)।