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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 11

अध्याय 6 · श्लोक 11

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११॥

śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ | nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājina-kuśottaram ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

शुचौ: पवित्र; देशे: स्थान में; प्रतिष्ठाप्य: स्थापित करके; स्थिरम्: स्थिर; आसनम्: आसन; आत्मनः: अपने लिए; न: नहीं; अत्युच्छ्रितम्: बहुत ऊँचा; न: नहीं; अतिनीचम्: बहुत नीचा; चैल-अजिन-कुशोत्तरम्: वस्त्र, मृगचर्म और कुश के आसनों से युक्त (या उनसे बना हुआ)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

किसी पवित्र स्थान में अपने लिए एक स्थिर आसन स्थापित करे, न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा हो।

English Translation

Having established a firm seat in a clean place, neither too high nor too low, with cloth, deerskin and kuśa grass spread over it, one upon the other.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ध्यान के लिए आसन की विधि: पवित्र स्थान, स्थिर आसन, न ऊँचा न नीचा, तीन परतें (कुश, चर्म, वस्त्र)।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।