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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 · श्लोक 12

अध्याय 6 · श्लोक 12

ध्यान योग (Dhyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२॥

tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yata-cittendriya-kriyaḥ | upaviśyāsane yuñjyād yogam ātma-viśuddhaye ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तत्र: वहाँ; एकाग्रम्: एकाग्र; मनः: मन को; कृत्वा: करके; यतचित्तेन्द्रियक्रियः: चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को रोककर; उपविश्य: बैठकर; आसने: आसन पर; युञ्ज्यात्: योग का अभ्यास करे; योगम्: योग; आत्मविशुद्धये: आत्मा की शुद्धि के लिए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वहाँ आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करके, आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

English Translation

There, sitting on the seat, making the mind one-pointed, controlling the thoughts and the activities of the senses, one should practice yoga for self-purification.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ध्यान की प्रक्रिया: आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों को वश में करते हुए, आत्मशुद्धि के लिए योगाभ्यास करें।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।